गली गली, कूचा कूचा

पङ्कज नरुला जी ने हमें न्यौता दिया कि अक्षरग्राम में आ के कुछ मटरगश्ती करें। पर हुआ यूँ कि पिछले कुछ दिनों मैं नज़रबन्द था। यानी जाल से अलग थलग। तो अब आया हूँ। देरी के लिए मुआफ़ी। तमन्ना यह है कि यह इलाका हल्का फ़ुल्का रहे। कम से कम मेरी तो यही कोशिश रहेगी। कुछ उस तरह, जैसे गली के छोकरे व छोकरियाँ आपस में गप्पबाज़ी करते हैं। तो सबसे पहले अर्ज़ करना चाहूँगा कि ये जो चिट्ठाकार हिन्दी वाले हैं, इतने दिन कहाँ घास चर रहे थे? शायद उन बगीचों की घास खत्म हो गई, या फिर ऊब गए वही हरी दूब खा खा के, अब अङ्ग्रेज़ी में तो वह बात नहीं आ सकती जो अपनी ज़ुबान में। भई आपको कोई अङ्ग्रेज़ी में बास्टर्ड कहे तो उसका वही असर थोड़ी होगा जो हिन्दी में होगा! तो एक विस्फोटक चिट्ठा मिला है, मटरगश्ती की बदौलत, जिसको अपनी चिट्ठा सूची में शामिल करने की हिम्मत शायद ही कोई करे। अब ये मिला कैसे, न पूछें, जाल की गली गली, कूचा कूचा छान मारने की कला में महारत तो तो गूगल भइया और डीमॉज़ दीदी को ही हासिल है। अपने जैसे टुच्चे लोग तो बस उनके आगे पानी भरते हैं, वह भी बिना ऍक्वागार्ड का। तो यह चिट्ठा है कौन सा? पर उससे क्या, ऐसे कई और मिलेंगे मुझे तो लगता है।
एक और एक तो वैसे ग्यारह होता है, वह इस बात से पता चला कि जो काम उँगलियाँ घिस घिस के साल भर से नहीं हो पाया वह इतने सारे लोगों के मिलने से इतनी आसानी से हो गया। हाँ कोई शक नहीं कि आप लोग बहुत मेहनत करते हैं, इसे पञ्जाबी में बोलते हैं कीड़ा, यानी ख़ुराफ़ाती कीड़ा। पर हिन्दुस्तानी इंसान को यह बात तो समझ में नहीं आती कि समुदाय के लिए कुछ कर दें तो खुद को भी फ़ायदा होगा। और अग़र कर दे तो लोग पूछेंगे कि भइया तुमको क्या फ़ायदा हो रहा है इससे?
तो जनाब मैं तो बकता ही चला जाऊँगा पर ज़रूरी नहीं कि आप सुनते रहें, जब चाहें नौ दो ग्यारह हो सकते हैं। यह समझ नहीं आया कि प्रविष्टि के लिए तीन तीन बक्से यहाँ क्यों हैं, शायद कुछ लक्की सॅवन जैसा चक्कर होगा, कि सही बक्से में लिख दिया तो इनाम मिलेगा।

6 Responses to “गली गली, कूचा कूचा”

  1. जय हो आलोक जी। मज़ा आया आप की प्रविष्टि पढ़ कर। और आपने तो “जैसे गली के छोकरे व छोकरियाँ आपस में गप्पबाज़ी करते हैं” कह कर यहाँ का समा बांध दिया है। कहें तो इस चिट्ठे का नाम भी “खुराफाती कीड़ा-खुरक हिन्दी चिट्ठों की” रख दें।

  2. हाँ क्यों नहीं, अच्छा नाम है! वैसे सबसे अनुरोध है कि कम से कम मुझे तो इस चिट्ठे पर ‘आप’ कह के न बुलाएँ। ‘तुम’ ही बढ़िया है, इतनी दोस्ती तो हो ही चुकी है, वह भी बिना मिले!

  3. अक्षरग्राम में खुराफाती कीड़ा
    आलोक ने पिछली प्रविष्टि में खुराफाती कीड़े के बारे में लिखा तो एक बार दिल में आया की अक्षरग्राम म..

  4. उस विस्फोटक चिट्ठे का पता बता देते आलोक तो आपका चिट्ठा भी विस्फोटक बन जाता :)

  5. मेरी तरफ से सबको राम राम !
    काम से फुर्सत पाने के बाद जब चौपाल मे आए तो पाया कि यहाँ अच्छी खासी बैठक जमी हुई है.आलोक ने शुरूआत ம.

  6. मंत्र है। आलोक जी जो कि खो गए हैं कि पंक्तियाँ याद आती हैं “जैसे गली के छ […]

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