इसकी सज़ा ज़रूर मिलेगी
यह क्या, चिट्ठा विश्व चिट्ठा विश्व को बनाने वाले के बारे में एक शब्द भी नहीं? चलो माना कि देबाशीष भद्र मनुष्य हैं और अपनी तारीफ़ के पुल खुद नहीं बाँधेंगे, लेकिन हम लोग इस काम में क्यों पीछे रहें? मैं तो एक बात कहता हूँ कि, पद्मजा और देबाशीष ने मिल कर जो कमाल किया है, मानने लायक है। काश कि मैं ऐसे जालस्थल बना पता।
पर अफ़सोस। यह भी एक कला है। कलात्मक आइटमों में अपन पीछे ही रहते हैं। देबाशीष को मैं तकरीबन 2 साल से जानता हूँ। जानता यानी, मिला तो कभी नहीं, पर मिला तो बातचीत शुरू करने में मुझे नहीं लगता कि ज़्यादा दिक्कत होगी। और होगी तो चलती ही रहेगी। पहली मुलाकात हुई डीमॉज़ पर जहाँ मुझे लगा कि ऐसे तेज़ मिज़ाज़ वाले जोशीले लोग और क्यों नहीं पैदा होते हिन्दुस्तान में। वैसे पैदा तो बहुत होते हैं न? तो जनाब कुछ करने की सोच लेते हैं तो पीछा नहीं छोड़ते हैं यह मैंने देख लिया है। पर यह डीमॉज़ के अन्दर की बात है, इसलिए इतना ही। मैंने नहीं सोचा था कि चिट्ठों को ले कर इतने जुगाड़ लगाए जा सकते हैं, मेरे लिए तो यह बस एक सरल तरीका था जाल पर अपने विचार व्यक्त करने का। आर ऍस ऍस, ऍटम, और पता नहीं क्या क्या इन पचड़ों में पड़ने की हिम्मत रखते हैं देबाशीष। हाँ, दुनिया में ऐसे लोग भी कम हैं जो प्रोग्रामिङ्ग को निकृष्ट कर्म न मानते हों। कूट लेखन व प्रबन्धन में देबाशीष जी की दिलचस्पी देख कर मैं भरोसे से कह सकता हूँ कि वे इनमें से हैं। उनके राजनीतिक विचार भी काफ़ी स्पष्ट और तीखे हैं, वैसे तीखापन और तीखा लग सकता है, उन लोगों को जो उनके विचारों से सहमत न हों
पर इससे लगता है कि उन्हें देश के राजनीतिज्ञों से कुछ आशा है। मैं तो मण्डल कमीशन के दिनों के बाद से ही राजनीति के प्रति उदासीन हो चुका हूँ।
असली राजनीति अब जानकारी, सूचना से सम्बन्धित है, क्योंकि सूचना ही शक्ति है। क्या हम हिन्दुस्तानियों को और सशक्त बनाने में एक छोटा सा, टुन्ना सा योगदान देने में सफल हो पाएँगे? मैं समझता हूँ कि देबाशीष जी तो अपना नाम उस फ़ेरहिस्त में डाल चुके हैं। सत्यमेव जयते, नानृतम् , यह वेद वचन है, और जाल इस दिशा में ही एक कदम है। प्राचीन काल से लोग कहते आए हैं कि ज्ञान एक ऐसी चीज़ है जिसे बाँटने से वह बढ़ता है। ज्ञान बाँटने के साधनों को विकसित करने वाले देबाशीष जैसे व्यक्ति को तो फिर आप देवता ही कहेंगे न?
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




देब बाबू मेरे साथ वर्डप्रैस के हिन्दी स्थानीयकरण पर भी हाथ बंटा रहे हैं और उनका हिन्दी शब्दावली ज्ञान भी ग्रेट है