परदेस
Posted on सितम्बर 5th, 2004 द्वारा आलोक
हूँ। तो मैं भी परदेस में हूँ। उन हज़ारों लाखों की तरह जो नोट छापने के लिए अपने घर से निकलते हैं। हाँ मज़ा भी आता है, पर काम बहुत,बहुत है। इस चक्कर में मेरा चिट्ठा कोरा रह जाता है। तो क्या हो जुगाड़ इसके लिए?
काम, और घर के बाद ही चिट्ठा आता है, तो वही छूट जाता है। लेकिन एड़ी चोटी का ज़ोर भी मैंने नहीं लगाया है, यह बात भी मैं मानता हूँ। तो अब ज़ोर लगा के देखता हूँ।
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 



