परदेस

हूँ। तो मैं भी परदेस में हूँ। उन हज़ारों लाखों की तरह जो नोट छापने के लिए अपने घर से निकलते हैं। हाँ मज़ा भी आता है, पर काम बहुत,बहुत है। इस चक्कर में मेरा चिट्ठा कोरा रह जाता है। तो क्या हो जुगाड़ इसके लिए?
काम, और घर के बाद ही चिट्ठा आता है, तो वही छूट जाता है। लेकिन एड़ी चोटी का ज़ोर भी मैंने नहीं लगाया है, यह बात भी मैं मानता हूँ। तो अब ज़ोर लगा के देखता हूँ।

Leave a Reply