क्यूँ हो गया ना…

काफी मेहनत और विभिन्न प्रयासों के बात आखिर अक्षरग्राम को वर्डप्रैस में लाने में सफल हो ही गया। आप सभी को पासवर्ड वगैरह भेज दिए हैं यदि कुछ कठिनाई आए तो लिखिएगा। यदि कोई भद्रजन इस परिवर्तन से आए बदलाव की अच्छाईयों बुराईयों की समीक्षा कर सके तो बहुत बढिया होगा। क्यूँकि हम तो कुछ नहीं कह सकते। अपनी पंजाबी में एक कहावत है ” अपनी माँ नूँ कोई डायन नहीं कैंदा”। साथ ही अगर किसी के पास ब्लागडिग्गर वाली हिन्दी चिट्ठों की xml फाईल पड़ी हो तो भेजने की कृपा करे । ब्लागडिग्गर को पता नहीं क्या हुआ है, जिस वजह से चिट्ठा विश्व की भी लगी पड़ी है। कोई नहीं ये तो चलता ही रहता है।

कल रात को टीवी पर मनमोहन सिंह का चार्ली रोज़ से वार्तालाप आ रहा था। वार्तालाप में भारत पाक दोंनो के आणविक शक्ति होते हुए और हर समय तनाव के माहौल के बारे में सिंह साहब का जवाब सुन कर बड़ा मजा आया - जवाब था कि भारत एक जिम्मेवार आणविक शक्ति है और इसका आणविक पदार्थों के आयात निर्यात पर कड़ा नियंत्रण है।

4 Responses to “क्यूँ हो गया ना…”

  1. वाह पंकज बाबू,नया रंग,नया रूप,नया अंदाज बढिया है(खराब कहने की किसकी हिम्मतहै?).

    सिंह साहब कह सकते थे कि स्थिति तनावपूर्ण किंतु नियंत्रण मे है.किसकेनियंत्रण मे है यह कौन पूछता?

  2. रंग रूप के अलावा मेरा अभीप्राय ये भी था कि - प्रयोग करने मे कैसा है, लोग बाग आसानी से काम कर लेते हैं या प्रश्न रहते हैं कि ये काम कैसे होगा और ये काम कैसे होगा। फुरसतिया बाबू को कुछ कठिनाई आ रही थी - उनकी कल्पवृक्ष प्रविष्टि तो जैसे गुम ही हो गई। आशा है कि अब सब ठीक है।

  3. Xenical.

    Xenical.

  4. bet mazier sarl

    terrier seedy confederacy

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