हां, हो तो गया है लगता है
अमेरिका में डुगडुगी पिट चुकी है चुनाव की.चुनाव में जो भी हो चुनाव के बाद की कथा मैं सुनाता हूं.अक्षरग्राम की चौपाल पर फैले आतंकवादी सन्नाटे के समूल नाश और श्रम को भुलाने के लिये सुनें:-
एक बार देखादेखी जंगल के जानवरों को भी चुनाव का चस्का लग गया.वहां भी जनता कीकी बेहद मांग पर चुनाव कराये गये.वोट पडे.संयोग कुछ ऐसा कि सबसे ज्यादा वोट बंदर को मिले.लिहाजा बंदरराजा बन गया.शेर ने बंदर को चार्ज दे दिया.
एक दिन बंदर के पास एक बकरी आयी.बोली —महाराज शेर मेरे बच्चे को उठा ले गया है .आप कुछ करो नहीम तो मेरा बच्चा मारा जायेगा.
बंदर बोला—शेर की यह हिम्मत?ऐसा कैसे किया उसने?अब वो कोई राजा तो है नहीं कि जो मन आये करता रहे.राजा तो मैं हूं.बताओ कहां है शेर ?मैं अभी उसे देखता हूं.
बकरी उसको ले के गयी शेर के पास.शेर एक पेड के नीचे मेमने को अपने पंजे में दबोचे बैठा था.खाने की तैयारी में.
बकरी ने कहा–महाराज बचाइये मेरे बच्चे को.
बंदर ने त्वरित निर्णय लिया और उसी पेड के ऊपर चढ गया जिसके नीचे शेर बैठा था.वह एक डाल से दूसरी डाल,दूसरी से तीसरी डाल कूदता.पसीने -पसीने हो गया पर कूदना जारी रखा.
काफी देर हो जाने पर बकरी बोली —महाराज, कुछ करिये नही तो मेरा बच्चा मारा जायेगा.
इस पर बंदर हांफते हुये बोला–”देखो ,तुम्हारा बच्चा रहे या मारा जाये.हमारी दौड-धूप में कोई कमी हो तो बताओ.”
यह सत्यकथा मुझे लखनऊ के कवि सर्वेश अस्थाना ने सुनायी थी.उन्होंने कहां से सुनी यह नहीं बताया.
यह दौड-धूप वाली बात इसलिये भी बतायी कि पंकज पूंछ रहे हैं कोई बता ही नहीं रहा है कि कैसा लग रहा है नया स्वरूप अक्षरग्राम का?
मैने एक बार तारीफ की पर लगता है उनको तकनीकी तारीफ चाहिये.बहरहाल पंकज की दौड-धूप में मुझे तो कोई कमी नहीं लगती.
मुझे अब कोई तकलीफ भी नहीं है इसमें लिखने में.लिहाजा फिर से बधाई
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




अरे अनूप दादा
क्या बात पकड़े हो, बहुत संभल के बात करना पड़ेगी आगे से। कहाँ हम मनमोहन को बंदर समझ रहे थे और आप हमें ही ऊस्तरा पकड़ाऐ दिए
पहली कमप्लीट प्रविष्टि पर बधाई।
पंकज
[…] (अक्षरग्राम में पूर्व प्रकाशित) […]
[…] कटना एक नाक का कई-कई बार:-सर्वेश अस्थाना हमारे साथ करीब तीन घंटे रहे रात ८ बजे से ११ बजे तक। इस संक्षिप्त अवधि में कई बार उनकी नाक कटी और कई बार बेइज्जती (खराब) हुयी। हुआ यह कि बकौल सर्वेश अस्थाना यह उनकी ही बदौलत है कि आजकल मोहन होटल इतना चलता है। उन्होंने ही इसे कवियों वगैरह के ठहरने की शुरुआत करायी ।इसके बावजूद उनकी मौजूदगी में ही होटल की सर्विस खराब थी। ठीक से चाय नहीं लाना,बीयर के साथ सीयर लाने में देरी करना और आर्डर लेने आने में देरी होना। इन तीन वाकयों को उन्होंने अपनी नाक कटना बताया और बेइज्जती तो कई बार हुई उनकी। सर्वेश जी ने दैनिक जागरण के एक स्थानीय संवाददाता को भी बुला लिया। उसने बीयर पीते हुये सर्वेश अस्थाना के सहयोग से अनूप भार्गव का साक्षात्कार लिया जिसे हम ठंडा बोले तो कोकाकोला पीते हुये सुनते रहे। बीच में एक आध बार फुरसतिया का जिक्र भी आया जिसे हमने रोकने की कोशिश नहीं की ,करने दी तारीफ अनूप जी को (इतना अधिकार तो देना पड़ता है भाई)। सर्वेश अस्थाना ने अपने खास बंदर वाले चुटकुले को सुनाते हुये बताया कि लाफ्टर चैलेंज के राजू श्रीवास्तव का गजोधर उनकी सलाह पर पैदा किया राजू श्रीवास्तव ने। चूंकि राजू वहां थे नहीं अत: इसे सच मानने के सिवा हम कुछ और मानने की हालत में नहीं थे। […]
कमाल का संयोग है आज सुबह ही यह चुटकुला हरियाणवी मखौल में अपने चिट्ठे पर छापा था जो कि कुछ समय पहले ‘दैनिक जागरण’ के स्थानीय संस्करण में छपा था और आज ही इसका हिन्दी संस्करण यहाँ देखने को मिल गया।
इसीलिए कहते हैं - “दुनिया गोल है”
(टाइम मशीन में भविष्य से आया हूँ, अक्षरग्राम-भ्रमण पर हूँ)
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