फुरसतिया जी की देह

सभी का ध्यान शुक्ला जी के रसीले अंदाज में लिखे “क्या देह ही है सब कुछ?” की तरफ भी दिलाना चाहुँगा। उनके दिमाग की उड़ानें पढ़कर कतई लगता है कि चौक की लाला की दूकान पर खड़े मित्रों से बतिया रहे हैं। इससे आधी उड़ानें भी गर मेरा दिमाग भरता होता तो गूगल में नौकरी कर पैसा बना के हिमाचल में किसी हिल स्टेशन पर घर बनाके रह रहे होते।

पहले तो उन्होंने अपनी ही देह टटोली

मैं कई बार अपनी देह को घूर निहार चुका हूं-दर्पण में.बेदर्दी आईना हर बार बोला निष्ठुरता से-नहीं,कुछ नहीं है(तुम्हारी)देह.मुझे लगा शायद यह दर्पण पसीजेगा नहीं.

बिल्कुल सही गाँधी बाबा ने भी कहा है कि दुनिया में खोट निकालने से पहने अपने को जाँच लो। देह प्रदर्शन की विभिन्न श्रेणियों के बारे उनके विचार

दुनिया में पांच अरब देहें विचरती हैं.नखशिख-आवृता से लेकर दिगंबरा तक.मजबूरन नंगी देह से लेकर शौकिया नंगई तक पसरा है देह का साम्राज्य.इन दो पाटों के बीच ब्रिटेनिका(5०:5०)बिस्कुट की तरह बिचरती हैं-मध्यमार्गी देह.

अब किस किस के बारे में लिखें राजा ययाति, असम के आंतकवादी, केशव बाबा ( इनके बारे में बिल्कुल नहीं जानता), ग्लोबल वार्मिंग, विश्वसुन्दरी मंच, ऐश्वर्या राय। खुद ही जाके पढ़िए। आखिर में जो तत्व की बात कही वह थी

युवा का देह के प्रति आर्कषण कतई बुरा नहीं है.बुरा है उसका मजनूपना ,लुच्चई.कमजोर होना…….

7 Responses to “फुरसतिया जी की देह”

  1. बंधुवर,आज पहले तुम्हारा लेख पढा फिर नीरव.सारे लेख पढने में अच्छे लगे.तुमनें नाहक इतना लिख मारा हमारे लेख के बारे में .हम खुशफहमी के शिकार हो गये.अब हफ्ता हमारा बरबाद हो जायेगा इसी खुशफहमी को ढोते-ढोते.इसकी जिम्मेंवारी कौन लेगा- बताओ?फिर नीरव से एक और चिट्ठे, आशीष का चिट्ठा, का जिक्र छूट गया जो कि एक नवंबर को ही छप गया था.इनका जिक्र छूटने का कारण पता नहीं क्या रहा पर मुझे एक वजह यह भी लगती है कि शायद हमनें ‘ड्रेसकोड’ का पालन नहीं किया (अनुगूंज का लोगो नहीं लगाया)इसलिये जिक्र की अर्हता नहीं हासिल कर पाये(पैकिंग फिर हावी हो गयी).अब हम कैसे बतायें कि हम संगणक तकनीकी के मामले में अनपढ हैं और हर बाजीगरी हमें बूझती नही है. बहरहाल आयोजन मजेदार रहा.बधाई.
    दिमाग की उङान तो खैर क्या, पर रमानाथ अवस्थी की एक कविता याद आती है
    मेरे पंख कट गये हैं,वर्ना मैं गगन को गाता.

  2. दादा केशव बाबा कौन थे थोड़ा खुलासा करो। कहने को हम भी अपने को पौराणिक कथाओं का ज्ञाता समझते हैं पर इनके बारे में बिल्कुल नहीं जानते।

  3. बंधुवर,जिन केशवदास का जिक्र यहां हुआ है उनका पुराण से कुछ संबंध नहीं है.संक्षेप में केशवदास के बारे में जानकारी यह है(संदर्भ:आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखित हिन्दी साहित्य का इतिहास):-

    केशवदास(1555 से 1617)भक्तिकाल की सगुण भक्तिधारा के कवि थे.ओरछानरेश के भाई इंद्रजीतसिंह
    की सभा में रहते थे, जहां इनका बहुत मान था.खानदानी संस्कृत कवि थे.केशव को कविहृदय नहीं मिला था.वे संस्कृत साहित्य से सामग्री लेकर(जैसे ब्लाग लिखने वाले इधर-उधर से लिंक जोडते हैं)अपने पांडित्य और रचनाकौशल की धाक जमाना चाहते थे,पर इस कार्य के लिये जैसा अधिकार भाषा पर चाहिये वैसा उनका नहीं था.संस्कृत की उक्तियों,पदों और वाक्यों की न्यूनता ,अशक्त फालतू शब्दों
    के प्रयोग और संबंध के अभाव आदि के कारण भी उनकी अप्रांजल और उबङ-खाबङ हो गयी है.कठिन कविताओं के कारण केशव को कठिन काव्य का प्रेत कहा जाता है.उनकी लिखी सात रचनाओं में ‘रामचंद्रिका’ सबसे प्रसिद्ध है.

    केशव रसिक जीव थे.रसिकता बुढापे तक रही.एक दिन (बूढे)केशव किसी कुएं पर बैठे थे.वहां महिलाओं ने
    उन्हें ‘बाबा’ कहकर संबोधित किया.इस पर केशव के मुंह से दोहा निकला:-

    केशव केशन अस करी जस अरिहूं न कराहिं,
    चंद्रवदन मृगलोचनी ‘बाबा’कहि-कहि जाहिं.

    (केशव के बालों ने जो बुरा किया वैसा शत्रु भी नहीं करते .इन (सफेद)बालों के कारण चंद्रमा के समान मुख वाली और हिरन के नेत्रों जैसी आंखों वाली सुंदरियां मुझे बाबा कहकर जा रहीं हैं)

  4. Anup no hard feelings man. I had reminded Nirav os this, by the time your’s and Ashish’s post appeared he had alreay written the curtain raiser post. Please excuse this. Many of us have very limited access to the net so it is not possible to update often. I would request Nirav to edit the post again. BTW no body replied to my earlier question, who’s hosting the next Anugunj?

  5. अनूप भाई,
    अब गुस्सा थूक भी दो यार… गलतिया इन्सानो से ही होती है.
    वैसे भी यह पहला आयोजन था… बात बनते बनते बनती है.
    और अनूप भाई, इतनी कठिन हिन्दी लिखते हो कि कभी कभी ऊपर से निकल जाती है, कम से कम,साथ मे, शब्दों के अर्थ ही लिख दिया करो, बहुत मगजमारी करनी पड़ती है. अब बन्धुवर मेरे से नाराज ना हो जाना.

    देवाशीषजी, इस समस्या का समाधान यही है, कि जो अनुगूंज मे भाग लेना चाहते हो, अनूगूंज की घोषणा वाली पोस्ट की टिप्पणी मे अपनी अपनी स्वीकृति दे दे.जैसे ब्लाग मेला मे होता है, तो फिर आयोजक को अपना ब्लाग लिखने मे कोई भूल चूक नही होगी.

    मै चाहता हूँ कि अभी इसका आयोजन बुजुर्गवार लोग ही करे.. जैसे आप, पंकजजी, अतुलजी.
    बुजुर्गवार से मेरा मतलब अनुभवी, इस शब्द को दिल पर मत ले.

  6. शुक्ला जी,

    अच्छा होता केशव जी के समय में हिन्दूस्तान लीवर होती। कम से कम केस काला लगा कर तरुणियाँ तो रिझा लेते।

  7. बंधुवर बुरा मानने, गुस्सा करने की आदत हम बहुत पहले छोङ चुके हैं. ले - देकर
    एक आदत बचा पाये हैं ,मौज लेने की ,सो भी तुम(देबू / जीतू)छुङाना चाहते हो. आप लोगों की इस दादागीरी से कोई बचाने वाला कोई नहीं क्या यहां चौपाल में ?न मैंने किसी बात का बुरा न ही कोई गुस्सा है जो कहीं थूक दें.इस तरह के आयोजन भानुमती के कुनबे होते हैं जिसमें कुछ न कुछ रह ही जाता है मौज लेने को सो हम लेते हैं.अब इसमें इतना औपचारिक माहौल बना के मजा किरकिरा काहे करते हो? कोई तो न्याय के पक्ष में खङा हो.

    जो मैं लिखता हूं उसमें से कुछ जीतेन्द्र के सर के ऊपर से निकल जाता है. देखता हूं कितना सुधार कर पाता हूं मैं आगे. पर सरल और पठनीय लिखना मुश्किल काम है.मैं तो अभी सीख रहा हूं.पर जिन शब्दों में तकलीफ हो उन्हें पूछ लिया करो.इसी बहाने मुझे भी उनके अर्थ पता चल चल जायेंगे(जैसे पंकज के पूछने मुझे केशव के बारे में जानकारी हुई).

    चलो इसी बहाने अक्षरग्राम चौपाल पर चहल-पहल बढी.बधाई आमतौर पर सबको -खासकर पंकज को.और भइया पंकज, बाबा केशवदास तो हमेशा तैयार रहते थे रिझने
    को पर वो सुंदरिया ही कुछ ज्यादा अनुदार थीं हिंदुस्तान लीवर के उत्पादन न उपलब्ध होने के कारण.

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