भारतीय संस्कृति - चिट्ठाकारों की नजर से
जितेन्द्र का दुखड़ा पढ़ कर आज हाईवे वन औ वन के शाम के युद्धसरीखे ट्रैफिक में प्रण कर लिया था कि अब चाहे जो हो जाए - प्रविष्टि हो कर रहेगी। घर आकर चाय पी और नोटबुक को हाथ ही लगाया था कि बीवी ने कहा कि - अगर कम्पयूटर पर कुछ करना है तो कल की बजाए आज ही खरीदारी करनी होगी। लगे हाथों 40 की चपत मॉल में और 20 की चपत कबाब कॉरनर पर लग गई। अतानु जी देश मे करपशन पर रोते रहते हैं यहाँ अमरीका में मेरे घर में ही धाँधलेबाजी हो रही है।
पर यहाँ बात दूसरी अनुगूँज की हो रही है जो कि अक्षरग्राम की 100वीं प्रविष्टि भी थी। कुल जमा 5 प्रविष्टियाँ ब्लॉगमंडल में उतरी हैं। सबसे पहले फुरसतिया जी ने फुरसत से अपनी राय समय रहते रख दी। बड़े ही सुलझे शब्दों में अनूप कहते हैं
मनुष्य केवल बाहरी सुख-साधनों से संतुष्ट नहीं होता.वह मंगलमय जीवन मूल्यों को ग्रहण करना चाहता है.दया,प्रेम,सहानुभूति तथा दूसरे की मंगलकामना है.यह उदात्त है .इसमें सौन्दर्य की चाह है.यह संस्कृति है.
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समन्वय की प्रवत्ति ही भारतीय संस्कृति का मूल तत्व है.यह वास्तव में लोक संस्कृति है.वह लोक में पैदा होती है और लोक में व्याप्त होती है.यह सामान्य जन की संस्कृति होती है-मुट्ठी भर अभिजात वर्ग की दिखावट नहीं.
फिर आए कानपुर के नए चिट्ठाकार आशीष गर्ग। लगता है हिन्दी चिट्ठाकारों एक किला इंदौर के बाद कानपुर हो गया है। आशीष जी ने सरल शब्दों संस्कृति के बारे में लिखते हुए चिन्ता भी प्रकट की कि
भारतीय संस्कृति की अच्छाइयां हैं कि वो सबको अपने में आत्मसात कर लेती है, वहीं बुराई इसमें हैं कि यहां के आपसी भाई चारे और सद्भाव के कारण भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद बढ़ा है, लोगों की भावना देश और समाज के प्रति कम रह कर परिवार और मित्रों के लिये ज़्यादा रही है। पहले के युग में शायद भारतीय संस्कृति का रूप अच्छा रहा होगा, लेकिन आज तो केवल विकृत रूप ही सामने आता है।
इतनी देर में जितेन्द्र बाबु को लगा समय कम रह गया है और अब या तो दिवाली की मिठाईयाँ और ईद की सेविंयाँ जीम लो या फिर चिट्ठा लिख लो। सेविंयों की जीत हूई। खैर इतनें में अतुल जी ने “1000 शब्दों से एक फोटू अच्छी” को चरितार्थ करते हुए अपनी बात एक फोटू से कही
तब तक जीतेन्द्र सेविंया और मिठाईयाँ जीम कर आनंदपुर्वक अपनी लेखनी लेकर अपने पन्ने पर जम चुके थे। उनकी कलम कटारि कुछ ऐसी गूँजी
यदि हम देश को शरीर माने तो, संस्कृति उसकी आत्मा होती है, या शरीर मे दौड़ने वाला रक्त होता है या फिर सांस…..जो शरीर को चलाने के लिये अतिआवश्यक है. किसी भी संस्कृति में अनेक आदर्श रहते हैं, आदर्श मूल्य है, और मूल्यों का मुख्य संवाहक संस्कृति होती है.
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भारत की अन्य परम्परायें जैसे अतिथि देवो भवः, सामाजिक आचार व्यवहार,शरणागत रक्षा,सर्वधर्म समभाव,वसुधैव कुटुम्बकम,अनेकता मे एकता जैसी प्रमुख है.
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भारत ही केवल एक ऐसा देश है जहाँ सर्वधर्म समभाव का पूरा पूरा ध्यान रखा गया है, जितनी इज्जत हम अपने धर्म की करते है, उतनी ही इज्जत हमे दूसरो के धर्म की करनी चाहिये.
इस कलम कटारि ने कईयों को आहत भी किया और गाँव वालों ने उसका जबरजस्त जवाब देते हुए गाँव की इज्जत को बरकरार रखा। धन्य हैं ग्रामवासी
आखिर में इस बार के तथाकथित मॉनीटर ने अपनी राय कुछ पहलुओं के जरिए रखी और मानक, परिवार केंद्रित समाज, आयु को नम्रता से स्वीकारना, सहिष्णुता, विद्या सर्वोपरि को भारत की संस्कृति के गुणसूत्र बताया।
कुल मिला कर पहली अनुगूँज से दूसरी अनुगूँज का सफर मजेदार रहा। रजिया गुँडों में फँस गई थी एक नए योद्धा विजय ठाकुर तत्काल सेवा लेकर ठलुआई करने आए हैं स्वागतम्।
अगली अनुगूँज कौन आयोजित कर रहा है या करना चाहेगा - टिप्पणी की इन्वेस्मेंट से लिखें। हो सकता है रिंग मास्टर देबाशीष जी किसी से कह ही चुके हों।
Filed under: अनुगूँज

अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 





यहाँ रिंगमास्टर की ना चलने वाली
अनुगूँज की आयोजनावली मैं यहाँ (http://hindi.pnarula.com/akshargram/2004/10/24/88/) अपडेट करता रहुँगा ताकि सनद रहे। वैसे अगली बारी मेरी ही है, बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी।
My earlier comment in Hindi refuses to appear so I go for this one. The calendar for Anugunj is gradually taking shape and would be displayed/updated at the location http://hindi.pnarula.com/akshargram/2004/10/24/88/.
BTW the next host is me, couldn’t have escaped for long
we have schedule till Jan 2005, but we would need volunteers for hosting the event February 2005 onwards. Seems I will have to repost a plea at the Chitthakar group.
देबाशीष जी किसी वजह से आप की टिप्पणी सीधे प्रकाशित नहीं हुई। मुझे जाकर स्वीकार करना पड़ा। एक बार दुबारा से कोशिश कीजिए।
संयोजन के लिये बधाई देर से ही सही स्वीकार करें.अपनी पोस्ट के बारे में थोङा यहां भी लिखते तो अच्छा रहता.
अक्षरग्राम के सैकङे के लिये भी बधाई.यह अपने में उपलब्धि है.
शुक्ला जी,
बधाई के लिए शुक्रिया। अपने बारे में या अपनी प्रविष्टियों के बारे में लिखना मुश्किल होता है। इसीलिए जितना समझ में आया लिख दिया।
बङी बढिया समझ है.फिर से बधाई.