मैं और मेरा रुममेट अकसर ये बातें करते हैं – कभी कभी

कॉलेज के बाद और शादी से पहले का दौर नौजवानों के लिए बड़ा मस्त होता है। कईयों ने इस गुण गाए हैं। जगजीत सिंह का एक पंजाबी गाना भी है – छड़याँ दी जून बुरी यानि कि कुँवारों की जात ही बुरी होती है। इसकी कुछ पंक्तियाँ है –

जे किसी छड़े दी माँ मर जावे
कल्ला बैठा सोक मनावे
ते महल्ले दी कोई जनानी डरदी
औहदे घर पिट्टण न आवे

इसी दौर की एक कविता अमित गर्ग के ब्लॉग पर मिली अच्छी लगी तो सोचा देवनागरी में रुपांतर कर देते हैं। वैसे भी बाजार में हवा गरम है कि बालाओं की कविताओं को लोग बहुत भाव देते हैं -

मैं और मेरे रुममेट्स
अकसर ये बातें करते हैं
घर साफ होता तो कैसा होता
मैं किचन साफ करता, तुम बाथरुम धोते
मैं हाल साफ करता, तुम बालकनी देखते
लोग इस बात पे हैरान होते
और उस बाक पे हस्ते…

मैं और मेरे रुममेट्स
अकसर ये बातें करते हैं

ये हरा भरा सिंक है
या बरतनों की जंग छिडी हुई है
मसालों ने होली खेली है
है फरश की नई डिज़ाइन
या दूध बीयर से धुली हुई है
ये सेल फोन है या ढक्कन,
स्लीपिंग बैग या किसका आंचल,
ये ऐयरफ्रेशनर का नया फ्लेवर है,
या ट्रैशबैग से आती बदबू
ये पत्तियों की है सरसराहट
के हीटर फिरसे खराब हुआ है

ये सोचता रुममेट कब से है गुमसुम
के जब से उसको भी ये खबर है
के मच्छर नहीं है, कहीं नहीं है
मगर उसका दिल है के कह रहा है
मच्छर यहीं है, यहीं कहीं है !
तोंद की ये हालत, मेरी भी है, उसकी भी,
दिल में इक तस्वीर इधर भी है, उधर भी
करने को बहुत कुछ है मगर कब करें हम
दिल कहता है वालमार्ट से कोई वैक्यूम क्लीनर ला दे
ये कारपेट जो जीने की जुझ रहा है, फिकवा दे

हम साफ रह सकते हैं, लोगों को बता दें,
हाँ हम रुममेट्स हैं - रुममेट्स है - रुममेट्स हैं
अब दिल में यही बात, इधर भी है इधर भी..
सबको बता दें..

एक और बात ये अमित जी आलोक की तरह मेरे पुराने कॉलेज PEC से ही हैं और बस नेट पर घूमते हुए मिल गये। इस बारें में मेरे चिट्ठे पर पढ़ें

3 Responses to “मैं और मेरा रुममेट अकसर ये बातें करते हैं – कभी कभी”

  1. त गर्ग जी की कविता पढ़ी – जिसे फौरन अक्षरग्राम पर चीपा और उसके बाद क्या […]

  2. जबरदस्त हिट! सुपर डुपर हिट!
    पंकज भाई, बहुत मजा आया….

    ये हरा भरा सिंक है
    या बरतनों की जंग छिडी हुई है

    ये ऐयरफ्रेशनर का नया फ्लेवर है,
    या ट्रैशबैग से आती बदबू

    ये पत्तियों की है सरसराहट
    के हीटर फिरसे खराब हुआ है

    ये सोचता रुममेट कब से है गुमसुम
    के जब से उसको भी ये खबर है
    के मच्छर नहीं है, कहीं नहीं है
    मगर उसका दिल है के कह रहा है
    मच्छर यहीं है, यहीं कहीं है !

    (इन पंक्तियों मे तो मजा आ गया, पुराने दिन याद आ गये…जाने कहाँ गये वो दिन
    मेरी तरफ से आपके मित्र को बहुत बहुत बधाइयो और आपको बहुत बहुत धन्यवाद
    ऐसी जबरदस्त कविता हमारे सामने लाने के लिये.)

  3. […] वारा.. अक्षरग्राम पर समय समय पर छड़ेपन पर चर्चा होती रहती है। शादीशुदा […]

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