नया घर - क्या नाम हो
सज्जनों एवं देवियों
ओह अभी देवी तो कोई है ही नहीं सभी देव हैं
चलिए कोई बात नहीं पते की बात पर आते हैं। पहले भी इस बात पर चर्चा हो चुकी है विषय है
1. नीरव अतुल द्वारा प्रस्तावित ब्लॉगजीन
2. अपना डोमेन नेम
तो वेब पर उपस्थिति के लिए दो चीज़ो की आवश्यकता होती है। पहली है वेब पर आप की जमीन , प्लॉट या फिर वेब स्पेस। यह मासिक किराए पर भी मिलती है। जैसे कि pnarula.com की जमीन मैंने hostforweb.com वालों से ली हुई है। इस जमीन पर आप काफी मकान व कमरे यानि की वेबसाइट डाल सकते हो। pnarula.com पर मेरे पास करीब 500 MB जगह है। इतनी जगह में हाँ भाई, अक्षरग्राम मजे से चल रहे हैं। जहाँ तक मेरा ख्याल है नीरव अतुल द्वारा प्रस्तावीत ब्लॉगजीन के लिए काफी जगह है। मुझ इस ब्लॉगजीन का मकान डालने में कोई गुरेज़ नहीं है अपितु खुशी होगी। चलिए यह कहानी तो सेट हो गई।
अब आते हैं दूसरी बात पर वह है पता यानि कि डोमेन नेम। आजकल के जमाने में पते भी किराए पर मिलते हैं। ये पते सालाना किराए पर मिलते हैं। अभी तक तो अक्षरग्राम मेरे साथ मेरे hindi.pnarula.com वाले मकान में ही रह रहा था। पर लगता है कि अब यह बड़ा हो गया है और इसे इसका अपना पता मिलना चाहिए। जमीन का फैसला को ऊपर हो ही चुका है। पते का किराया चुंकि सालाना है इसलिए मुझे उसे भी भरने में कोई परेशानी नहीं है। तो फिर मैं यह बक बक क्यूँ कर रहा हूँ। धैर्य रखो बंधुवर। मुझ नाम रजिस्टर कराने के लिए सुझाव चाहिएं। वैसे तो akshargram.com से सकते हैं पर कुछ मनन करना चाहिए।
कुछ इस प्रकार से सैंटिग सोच रहा हूँ
http://www.akshargram.com/blog - for the present akshargram
http://www.akshargram.com/blogzine - for Nirav’s zine idea
यहाँ akshargram, blog, blogzine सभी के लिए सुझाव आमंत्रित हैं। सबसे जरुरी है डोमेन नेम। akshargram.com से मुझे तकलीफ यह है कि यह चाणक्य सरीखी शुद्ध हिंदी के जैसा लगता है जबकि नाम ऐसा होना चाहिए कि एक बार सुनो तो याद रहे। उदाहरण के तौर पर किताबों की दुकान fatbrain.com या फिर एयरलाइन jetblue.com तो जनाब खूब बादाम खाइए और .सोच कर बताईए कोई नाम। नहीं तो अक्षरग्राम तो है ही।
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




पंकज जी,
मै वैसे ही सोच रहा हूँ, अपने डोमेन नेम के बारे मे,
यदि आप लोगा आज्ञा दे तो मै थोड़ा ज्यादा स्पेस लेकर अक्षरग्राम और चिट्ठा विश्व को वहाँ पर होस्ट कर दूँ.
डोमेन नेम के लिये मेरे दिमाग मे कुछ नाम है, शाम तक सोच कर बताता हुँ.
I think the blogzine idea attribution is a bit wrong, it’s our good old Atul and not Nirva perhaps
जितेन्द्र जी,
जगह की तो बात नहीं है। वैसे भी ठीया ठीक ही चल रहा है। इसलिए अंग्रेजी उक्ति If it ain’t broke के रहते अभी यहीं चलने देते हैं। भविष्य में कुछ विपदा आई तो फिर विचार करेंगे। क्या कहते हो गाँव वालो।
पंकज
अक्षरग्राम के लिये कुछ नाम हैः
महफिल
दीवान ए खास
गुफ्तगु
बैठक
हम तुम
यूं ही
नायाब
हमजोली
हमसफर
ये आपके ऊपर है, कि आप पसन्द करे या रिजेक्ट करें.
I think and since we have been using it often, “Chaupal” sounds great for Akshargram.
घूमते घामते यहाँ आ पहुंचा, माहौल देख कर अच्छा लगा.
यदि हम डोमेन का नाम खोज रहे हैं तो नाम सुझाने के साथ यह भी आवश्यक है कि नाम उपलब्ध है या नहीं यह देखा जाए. सुझाए नामों में से अधिकतर उपलब्ध नहीं हैं. हाँ, akshargram.com और hamjoli.com उपलब्ध हैं (इस क्षण). humjoli.com उपलब्ध नहीं है. और कुछ सुझाव, जो उपलब्ध हैं:
hindi-mehfil.com
hindi-kona.com
hindi-nukkad.com
vartalaap.com
बंधुवर, अक्षरग्राम नाम प्रचलित हो गया है.सबको पता है.खाली नाम बदलने के लिये नाम बदलना ठीक नहीं लगता.कोई नाम इसकी जगह नहीं लेने लायक है.जिस नाम ने इतने दिन साथ निभाया ,सबको जोङा उस नाम को बदल दोगे ?बङे तोता चश्म हो यार.नाम किठन नहीं है.लगाव हो गया है हमें इससे.काहे को मायावती बनते हो जो हर अगले दिन जिलों का नाम बदलती रहीं.कहा भी है:-
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
इन्हें शिकन नहीं आती बस्ती उजाङने मे.
हाँ बात सही है, नाम अक्षरग्राम भी अच्छा है।
मुआफ़ करें, तोता चश्म क्या होता है?
‘तोताचश्म’ उन लोगों को कहते हैं जो अपना काम निकल जाने पर तोते की तरह आंखें फेर लेते हैं.मतलबी यार टाइप के लोग (मतलबी यार किसके–खाये पिये खिसके) तो यह नाम अक्षरग्राम जिसनें इतने दिन हमारा साथ दिया ,जोङा हम सबको उसका नाम बदल देना मुझे तो नहीं जमता भाई .बाकी जैसा पंच तय करें.
छोटे मुँह बड़ी बात न हो तो मुझे भी अक्षरग्राम डाट काम बढ़िया जम रहा है. वैसे भी, चूँकि अभी यह नाम उपलब्ध है, इसको पंजीकृत कर लेना चाहिए, चाहे प्रयोग करें न करें (इस से पहले कि कोई और हथिया ले). नहीं तो बाद में डाट आर्ग और डाट नेट को लिए बैठे रहिएगा. आठ दस रुपए ($) की ही तो बात है.
कलकत्ते में इस तरह के परिवेश के लिये प्रचलित शब्द है अड्डा. ऐसा करने वाले अड्डेबाज और ऐसा करना अड्डेबाजी कहलाता है.अड्डेबाज लोग बहुधा चौराहों पर चाय, चारमीनार और चादर के साथ पाये जाते हैं. इनके पास सारी बातें होती हैं बस काम को छोड़ कर, सारी समस्याओं का समाधान होता है इनकी समस्याओं को छोड़कर.
उत्तर प्रदेश में इन सबके लिये ‘पान की दुकान’ उपयुक्त स्थान होती है, उसे संबंधित नाम भी रखा जा सकता है.
बाकी माहौल को सूट करता हुआ मुझे श्रीलाल शुक्ल की किताब का शीर्षक भी उपयुक्त लगता है -
‘रागदरबारी’
अड्डेबाजी तो भारतियों का पुराना शगल है
आड्डा के परिप्रेक्ष्य में मैंने नुक्ताचीनी का बैनर पहले ऐसा ही कुछ रखा था, टेम्पलेट बदलाव ने हटवा दिया। ये छवि यहाँ देख सकते हैं।
रे में अधिक जानकारी के लिए अपनी एक पुरानी प्रविष्टि से कैसे करें कुँजी बना […]
[…] हिन्दी के लिए अन्तर्जाल को खंगालते रहना तो पहले से चल ही रहा था। फिर चिट्ठे दिखे तो पढ़ने लगा। मैं जब 2004 के अन्त में चिट्ठाकारी की दुनिया में आया तो करीब 15-16 चिट्ठाकार थे। सब से पहले कौन सा पढ़ा, ठीक से याद नहीं - फुरसतिया, नौ दो ग्यारह, नुक्ताचीनी, हाँ भाई (जो अब मिर्चीसेठ बन गया है), मेरा पन्ना या रोजनामचा। या शायद सभी एक ही दिन मिले। अक्षरग्राम का आरंभ कुछ माह पहले हो चुका था। अक्षरग्राम पर, या किसी भी ब्लाग पर मेरी पहली टिप्पणी शायद यह थी। फिर मेरे प्रिय विषय कश्मीर का ज़िक्र आया तो अक्षरग्राम पर यह टिप्पणी की, जिस के जवाब में जीतू ने अपना चिट्ठा लिखने को उकसाया (मेरी हर टिप्पणी में वर्तनी की मीन मेख निकालने की भी बीमारी मिलेगी आप को, ..यह अलग बात है कि कई बार मुँह की भी खाई है)। बस फिर क्या था, कुछ ही दिनों में ब्लॉगस्पॉट पर चिट्ठा शुरू किया, जिसे बाद में वर्डप्रेस द्वारा अपने सर्वर पर डाल दिया। […]
[…] यहां साफ कर दूं कि नारद पर आम ब्लागर के सिवाय किसी का आधिपत्य नहीं है। इसके संचालन का काम फिलहाल जीतेंन्द्र देखते हैं लेकिन वह सबके प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं- किसी स्वयंभू के हैसियत से नहीं। लोगों को शायद पता न हो कि पहले अक्षरग्राम, जो कि हमारे बीच चौपाल के रूप में मशहूर थी, पर विचार विमर्श हुआ करते थे। साइट पंकज नरूला की थी लेकिन नवीनीकरण में नाम अक्षरग्राम ही रखा जाये या कुछ और यह हम लोग तय करते थे। फिर पंकज नरुला यानि मिर्ची सेठ ने नारद शुरू किया। बाद में उसे जीतेंन्द्र को सौप दिया। फिर ब्लाग बढ़ने के साथ नारद के संचालन में बाधा आयी। इसके बाद तमाम ब्लागर साथियों ने चंदा (करीब पचास हजार रुपये) करके अक्षरग्राम, नारद आदि के लिये नयी व्यव्स्था की। हमने पैसे अभी तक नहीं दिये लेकिन हम अपना उतना ही अधिकार नारद पर समझते हैं जितना चंदा दे चुके साथी। पैसा तो हाथ का मैल है कभी भी दे देंगे। […]
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कुछ नाम सुझाव मेरी ओर से भी:
जाने क्या तूने कही.
बारादरी
शब्द-वेग
शब्द-प्रवाह
बतकही