तीसरी अनुगूँज: आतंक से मुख्यधारा की राह क्या हो?
तृतीय अनुगूँज के आयोजन पर भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही। लगभग सभी प्रविष्टियों से एक बात साफ रूप से उभरी कि हथियार डाले आतंकियों को मुख्यधारा में शामिल करना अलग बात है और उन्हें सरकारी तंत्र से जुड़े पदों विशेषकर संवेदनशील पदों पर जगह देना अलग बात। नज़र डालते हैं विभिन्न विचारों परः
हथियार डाले आतंकियों को सामरिक से महत्वपूर्ण पद सौंपे जाने के सवाल पर कश्मीर में पले बढ़े रमण ने चीख कर कहा, “नहींऽऽऽ”। पूर्व आतंकियों, जिन्हें वे “आस्तीन के साँप” मानते हैं, के साथ किसी तरह की रियायती व्यवहार के वे पक्षधर नहीं। रमण दो टूक कहते हैं
मुख्य धारा की बात हो भी तो सज़ा काटने के बाद। जिन आतंकियों ने असंख्य हत्याएँ की हों उनके साथ मुख्य धारा की बात क्यों हो? यों तो मुन्ना भाई ने भी डाक्टरी की एक से बढ़ के एक परीक्षा टॉप करी थी, यह तो उनसे आपरेशन करवाने वाली बात हो गई।
आशीष ने अपने चिट्ठे में पूर्व आतंकियों के पुर्नवास के तरीकों पर विचार किया
यदि उनको समाजिक समर्थन मिले और रोज़गार का जुगाड़ हो जाये तो स्थिति बहुत सुधर सकती है। काफ़ी कुछ समाज पर भी निर्भर करता है, क्या समाज ऐसे लोगों को दोबारा से स्वीकार कर सकेगा, क्या उनके परिवार वालों को शान्ति से जीने देगा, ये सवाल तो हमको और आपको अपने आप से पूछने होंगे।
अनूप के चिट्ठे में चर्चा हुई आदर्श की।
किसी व्यक्ति की काबिलियत एक पहलू है..अपराध की सजा दूसरा पहलू…दोनों में घालमेल नहीं होना चाहिये। नहीं (तो) लोग कहेंगे, अरे भाई हमने अपराध किया है मानते हैं पर हमारी काबिलियत भी तो देखो। काबिलियत के हिसाब से तो हमको सजा मिलनी ही नहीं चाहिये। पहले भी हुआ है ऐसा, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की पेंशन पाने वालों में बहुत सारे लुटियाचोर भी थे। किसी अपराध में पकड़े गये, प्रमाणपत्र जेल का ले आये, दरख्वास्त दे दी..और पेंशन पाकर मौज की। जबकि बहुत से लोग, जो वाकई बलिदानी थे, उन्होंने यह माना यह तो हमारा कर्तव्य था, इसके लिये पेंशन कैसी?
उन्होंने माना कि आतंकवाद का गणितीय समाधान नहीं निकाला जा सकता पर मुख्याधारा में शुमार करते वक्त कितनी उदारता दिखाई जाए यह ध्यान रखना ज़रूरी है।
पूर्व आतंकवादियों को मुख्यधारा में लाने के उपाय खोजते समय यह देखने की जरूरत है कि कहीं हम इतने उदार न बन जायें कि लोग सोंचे, यार काश हम भी पूर्व आतंकवादी होते। ये बहके हुये लोग रहे हैं, तब अपनी जान हथेली पर लेकर आतंक की दुनिया में कूदे होंगे..जब इनको सामरिक महत्व के पद सौंपे जायेंगे तब वे नहीं बहकेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं। कुछ लोग होंगे जो अपवाद होंगे और कभी न बहकेंगे। अपवाद का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता।
नितिन ने नुक्ताचीनी पर अपने अतिथि चिट्ठे में समस्या की जड़ पर वार करते हुए ईशारा किया दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद के आरोपियों के साथ किए व्यवहार की ओर। हालाँकि जिस समस्या का मूल सीमा पार आतंकवाद जैसी दिक्कत हो वहाँ समाधान के ऐसे तरीके कितने कारगर हो सकेंगे यह तो बहस का विषय है।
इस समस्या का पूरा हल आसान नही है। सरकार की आर्थिक मदद तो ज़रूरी है ही पर आतंक का पूर्ण रूप से रुकना उस से भी ज़्यादा ज़रूरी है। यह दक्षिण अफ़्रीका की ‘सत्य और समाधान‘ समिति ने कर दिखाया है। अगर आम आतंकवादी अपनी हिंसा को पूरी तरह से त्याग कर अपने किये अपराधों को मान ले तो सरकार उन्हें माफ़ कर सकती है। इसके बाद पहला कदम है समाज में उनकी वापसी और दूसरा कदम, आर्थिक अनुकलन।
जितेन्द्र ने अपनी दो टूक राय में कहा
सरकार के दोहरे मापदण्ड हैं, चम्बल के डाकुओं का पुनर्वास तो बड़े ही सही तरीके से किया जाता है, उन्हें ज़मीन,सुविधायें और सामान्य जीवन जीने की आजा़दी दी जाती है, लेकिन आतंकवादियों के साथ ऐसा व्यवहार नही किया जाता। मेरे हिसाब से समर्पण किये आतंकवादियो के साथ भी कुछ ऐसा ही व्यवहार होने चाहिये, ताकि वो भी सामान्य जिन्दगी की तरफ लौट सकें….लेकिन इसका मतलब यह कतई नही है कि उन्हें देश की रखवाली या दूसरे संवेदनशील कामों मे लगाया जाये…. यदि ऐसा होता है तो यह एक बहुत बड़ी राजनैतिक भूल होगी।
अंततः मेरे अपने चिट्ठे में मैंने कहा
यह तो एक दिवास्वप्न ही होगा कि हम यह मानें कि कश्मीर की समस्या तो सुलझती रहेगी, पूर्व आतंकियों को पुर्नस्थापन का लॉलीपॉप देने भर से आतंक का वीभत्स खेल स्वतः ही बंद हो जाएगा। सीमा पार आतंक से समस्या उपजी, पर इसे बंद कराने के लिए वैश्विक जनमत बनाने तक में हमारा राजनैतिक नेतृत्व नाकामयाब रहा है।
तृतीय अनुगूँज के सभी प्रतिभागियों का धन्यवाद! अगली अनुगूँज की मेज़बानी कर रहे हैं अतुल।
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




अरे भाई,जीतेन्द्र की कापी भी जांच दो.यहां तो उन्होंने
वही लिखा जो कहा गया.आयोजन की बधाई.धन्यवाद.
आजकल हमको क्लास से बाहर ही बिठाया जाता है.
क्यों देबाशीष जी….सही है ना?
अरे जितेन्द्र भाई, आप ने क्लास के नोट तो लिखे, मैं तो इस बार कुछ लिख ही नहीं पाया। लगता है किसी ढंग के विषय पर दिमाग काम करना बंद कर देता है। ठलुआई ही रह गई है बस की
हमने तो टीप टाप कर नोट्स भी लिख डाले, और परीक्षा मे बैठे भी…
अब एक्जामिनर महोदय ने मेरी कापी को रद्दी की टोकरी मे डाल दिया तो मै क्या करूँ.
देबाशीष भाई किसी पत्रिका के एडीटर की कुर्सी के सबसे सही उम्मीदवार है, उन्हे पता है, कि किसको कहाँ पहुँचाना है.
चलो ये भी दिन देखने थे….इसी बात पर एक शेर सुनिये….
अब किसी से क्या कहें ‘इक़बाल’ अपनी दास्तां
बस ख़ुदा का शुक्र है जो भी हुआ अच्छा हुआ
जितेन्द्र क्षमाप्रार्थी हूँ
मुझे दुख है कि ब्लॉग मेला कि तरह ऐसा दूसरी बार यह अन्याय मुझसे हुआ है। दरअसल अवलोकनी चिट्ठा लिखने में देर हो गई थी, मेरे अपने चिट्ठे पर भी “जल्द आ रहा है” लिख कर मैंने २५ को प्रेषित करने का प्लान बना रखा था। फिर अवलोकनी चिट्ठा लिखने कि जल्दी में मैंने बस वही चिट्ठे शामिल कर लिए जिनका ज़िक्र अक्षरग्राम के आमंत्रण चिट्ठे की टिप्पणियों में था। आशा है मुझे छोटा भाई समझ कर माफ करेंगे।
अरे देबाशीष भाई,
हम तो बस अपनी व्यथा कह रहे थे, आप तो इसे सीरियसली ले रहे है.
अरे भाई, हमको भी पता है कि आप काफी बिजी है, और ये छोटी मोटी भूलचूक तो होती रहती है, इसी बहाने हमे कुछ शेरो शायरी करने का मौका मिलता है.आपने वो मौका दिया इसके लिये धन्यवाद
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