पाँचवी अनूगूँज का निमन्त्रण

इस बार अनूगूँज के आयोजन की शमा हमारे सामने रखी गयी है, सो हम सबसे पहले तो शुक्रिया अदा करते है देबाशीष जी का, जिन्होने हमे इस लायक समझा. साथ ही मै बधाई देना चाहूँगा भाई अतुल अरोरा को पिछले अनूगूँज के सफल आयोजक के लिये. दरअसल अनूगूँज के आयोजन का उद्देश्य बहुत साफ था, समाज मे होने वाले परिवर्तनो और घटनाओ के प्रति हमारे हिन्दी चिट्ठाकारो की एकसाथ प्रतिक्रिया…….. लेकिन शायद हमारे चिट्ठाकार भाइयो ने इसकी अहमियत को नही समझा और इस अनुगूँजी अवसर को एक निबन्ध लेखन प्रतियोगिता की तरह ही अपने ऊपर भार समझा और येन केन प्रकारेन, लोग अनूगून्ज से बिदकते गये….. क्यों ये मै नही जानता, शायद विषय गम्भीर दिये गये थे….. …….सो जनाब मै अपनी तरफ से आपको बहुत ही सरल और हल्का विषय देता हूँ
Akshargram Anugunj

तुम ना मानो…मगर हकीकत है….
इश्क इन्सान की जरूरत है.

प्यार…..एक शब्द….जिसके जीवन मे आने से दुनिया हसीन लगने लगती है, पतझड़ मे भी सावन दिखने लगता है. और अगर बात पहले प्यार की हो रही हो तो….क्या कहने ……. प्यार का पहला पहला इजहार, वो रूठना और वो मनाना, सो सुनना और वो सुनाना……..कुछ अपनी कहना, कुछ उसकी सुनना, अपने आप से बाते करना, तनहाई मे रहना, गजले सुनना, अकेले मे रोना……………..अब क्या क्या गिनाये. जिसने प्यार नही किया, उसने जिन्दगीं को नही जिया.

तो जनाब, इस बार का विषय है प्यार, वो भी पहला प्यार……आप झट से लिख दीजिये अपनी आपबीती….अब आप कहेंगे, कि काहे घर मे जूते खिलवाते हो…अच्छी खासी पारिवारिक जिन्दगी चल रही है, पुराने गड़े मुर्दे उखाड़ कर, काहे पिटवाने का इन्तजाम करते हो………….जो जनाब इसका जवाब ये है, कि लिख डालिये…पुरानी बाते लिखकर आपको जो सकून मिलेगा……………….वो पिटाई के घावों मे मरहम का काम करेगा. अब भी कोई जनाब ना लिखना चाहे, या बोले कि मैने तो कभी प्यार ही नही किया है, कैसे लिखूं………………उसके लिये मेरी हार्दिक सहानूभूति है. लिखने की आखिरी तारीख है, १२ जनवरी,२००५…मै अपना अनुगूंजी चिट्ठा लेकर आपके सामने इसी जगह पर १४ जनवरी,२००५ को प्रस्तुत होंउंगा……यदि किसी के इस सम्बन्ध मे कोई प्रश्न है या तारीख के साथ कुछ समस्या है, तो मुझे जरूर लिखें. अनुगूँज के नियमो के लिये यहाँ देखें.

अब पता चलेगा कि कितने लोगों ने जीवन मे प्यार किया है……………….

3 Responses to “पाँचवी अनूगूँज का निमन्त्रण”

  1. पहली प्रविष्टि पेशे खिदमत है:-

    http://tatkaal.blogspot.com/2005/01/blog-post_08.html

  2. […] पहले प्यार की बात चल पड़ी तो मुझे भी पहला प्यार याद आ गया। परिणती तक भले न पहुँचा हो पर मन में किसी कोने में यादों की महक तो बाक़ी है। किस्सा चुंकि नितांत निजी है इसलिए सुना कर बोर नहीं करूँगा। पर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ उन दिनों लिखा एक गीत। कॉलेज के समय तो पूरा जीवन ही मेलोड्रामा से लबरेज़ रहता है, लिहाज़ा यह गीत भी काफी हद तक फ़िल्मी है। विनयजी बता पायेंगे कि मीटर ठीक ठाक है या नहीं। उन दिनों इस गीत के सस्वर पाठ करने की मेरे मित्र बड़ी गुजारिश करते थे खास तौर पर वो जिन्हें इश्क का नया नया रोग लगा था। तो प्रस्तुत है यह गीत “मित्र मान लो”। मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो! मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो! […]

  3. […] विजय ठाकुर का सब्से बेहतरीन लेख जो मुझे लगता है वह था पुटुष के फूल। जीतेंद्र केआवाहन पर अपने प्यार के किस्से बताते हुये विजय ठाकुर ने लिखा ये बात उस वक्त की है जब मेरी मूछों की पिनकी का भी कोई अता पता नहीं था । जब मैं अपनी छठी-सातवीं कक्षा (यानी अभी बाली उमिर दस्तक दे रही थी) में था तो साथ पढनेवाली लड़कियाँ जरा वक्त मिला नहीं कि स्कूल के पीछे उगी जंगली झाड़ियों की ओर टूट पड़ती थीं। मेरे लिये ये कौतूहल का विषय बन गया था। बाद में उनके अदभुत खजाने का पता मुझे तब लगा जब उनमें से एक मुझे वहाँ ले गयी । पता चला कि सारी की सारी उन झाड़ियों पर उगने वाले छोटे-छोटे पीले और लाल फ़लों की दीवानी थीं। उस फ़ल का स्वाद उनके सिर चढकर बोलता था। झारखंड के आदिवासी उस फ़ल को ‘पुटुष’ कहते हैं। उस पुटुष का अपूर्व स्वाद मेरी ज़ुबान पर भी ऐसा छाया कि मैं भी मास्साब की नज़र चूकते ही अक्सर उनके साथ हो लिया करता। […]

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