ध्यान दें

मान्यवर,
इस हलचल के बारे में कुछ कहना चाहूँगा।
यह बहुत ज़रूरी है कि कुछ बातों पर ध्यान दिया जाए।
यहाँ मैं जो कुछ भी पढ़ रहा हूँ , उसके आधार पर कुछ विचार:
1) दुनिया में ऐसे लोग हैं जिनको हिन्दी नहीं आती, या आती भी है तो हिन्दी के मुकाबले अन्य भाषाओं को पसन्द करते हैं।
2) दुनिया में ऐसे लोग हैं जिनको अङ्ग्रेज़ी नहीं आती, या आती भी है तो अङ्ग्रेज़ी के मुकाबले अन्य भाषाओं को पसन्द करते हैं।
3) दुनिया में ऐसे लोग हैं जिनको तमिळ नहीं आती, या आती भी है तो तमिळ के मुकाबले अन्य भाषाओं को पसन्द करते हैं।
4) दुनिया में ऐसे लोग हैं जिनको < भाषा प्रविष्ट करें> नहीं आती, या आती भी है तो < भाषा प्रविष्ट करें> के मुकाबले अन्य भाषाओं को पसन्द करते हैं।
1) से 4) के बीच की कोई भी स्थिति लोगों की परिस्थितियों की वजह से आती है, और इन परिस्थितियों पर इन लोगों का खुद का नियन्त्रण नहीं होता है। लोग ऐसे हैं अपनी परिस्थितियों की वजह से। इन लोगों में हम भी शामिल हैं।

तो मेरे सवाल ये हैं:
जब लोगों ने यह प्रस्ताव दिया कि सिर्फ़ हिन्दी में ही क्यों, अन्य भारतीय भाषाओं में नामाङ्कन क्यों नहीं, तो इस गाँव के किसी भी सदस्य ने इस प्रस्ताव का अनुमोदन क्यों नहीं किया? अपनी भाषा से सभी को प्यार होता है। लोगों का दिल जीतने के बजाय उन्हें भड़काया क्यों गया?
जब लोगों ने यह प्रस्ताव किया कि वे हिन्दी के चिट्ठे अपने आयोजन में नहीं देखना चाहते, तो भड़कना क्यों? क्या आप अपने अक्षरग्राम में तमिळ प्रविष्टियाँ पसन्द करेंगे? (हाँ मैं करूँगा, पर अक्षरग्राम पर नहीं)।
यदि आपके पास बाङ्ग्ला चिट्ठों का नामाङ्कन करेंगे, और आपको बाङ्ग्ला पढ़नी नहीं आती है, तो आप उन नामाङ्कनों का क्या करेंगे?

मूलतः अहिन्दी स्थलों पर आयोजित कार्यक्रम को हिन्दी का सर्वोच्च सम्मान मञ्च मानने का अर्थ यह है कि आप यह मान रहे हैं कि जो भी हिन्दी लिख पढ़ रहे हैं उन्हें अङ्ग्रेज़ी आती है। कई लोगों को तेलुगु आती है, और हिन्दी आती है, कोई अन्य भाषा नहीं। अन्यों को पश्तो आती है और हिन्दी आती है, अन्य कोई भाषा नहीं। या फ़्रांसीसी आती है, और हिन्दी आती है, अन्य कोई भाषा नहीं। और, कइयों को सिर्फ़ हिन्दी आती है। क्या किसी रूसी स्थल पर जापानी के चिट्ठों पर टीका टिप्पणी के बारे में आप सोच सकते हैं?

यदि किसी को देवनागरी लिपि की शक्ल पसन्द नहीं आती और वह उसपर टिप्पणी करता है, तो हमें प्रतिक्रिया करने की क्या ज़रूरूत है? क्या हम चीनी जापानी की लिपि को चील बिलौटों के बराबर नहीं मानते हैं।

हम लोग हिन्दी के चिट्ठों पर अङ्ग्रेज़ी में टिप्पणी लिखते हैं, क्यों? समय का अभाव? तकनीकी कमियाँ? हम यह कैसे मान सकते हैं कि जिसने हिन्दी में चिट्ठे लिखें हैं उसे अङ्ग्रेज़ी आती है? मुझे आती है, पर वह अलग बात है। आपके अङ्ग्रेज़ी चिट्ठे पर कोई फ़ारसी में टिप्पणी लिख दे तो आप क्या समझेंगे?

यह सब मैंने इसलिए लिखा ताकि हमारे सोचने का परिपेक्ष्य बदले। हिन्दी भाषी लोगों की आदत है कि सब कुछ हिन्दी बनाम अङ्ग्रेज़ी के काले चश्मे से देखते हैं। यह ध्यान रखें कि अन्य भारतीय भाषाओं की भी वही समस्याएँ हैं जो हिन्दी की हैं। अन्य भाषा भाषियों से दोस्ती बढ़ाइए, हिन्दी की बड़ाई और अङ्ग्रेज़ी की बुराई करके नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहन दे के। ध्यान दें कि अन्य भारतीय भाषाओं के सङ्गणन विकास से हिन्दी में भी यही विकास होगा।

यह भी ध्यान रखें कि एक समय आएगा कि आपकी सामग्री पढ़ने वाले ऐसे कई लोग होंगे जो अङ्ग्रेज़ी नहीं जानते होंगे, सिर्फ़ हिन्दी जानते होंगे। क्या आप उन्हें घृणा की नज़र से देखेंगे? क्या आप उनको नीचे दिखाने की कोशिश करेंगे? यदि नहीं तो ऐसे लोगों से भी न उलझें जो कि अपने अङ्ग्रेज़ी के अड्डों पर केवल अङ्ग्रेज़ी पसन्द करते हैं।

यह भी ध्यान रखें कि आपके स्थल का अन्तर्जाल में जब भी वर्णन होता है, आपके स्थल की कड़ी और लोगों तक पहुँचती है। भले ही आपकी बुराई ही क्यों न हो रही हो। बुराई तो केवल उसने की है जिसने लिखा है, अन्य चटका लगाने वालों को आपकी बात दिलचस्प भी लग सकती है। जो भी आपके स्थल की बुराई करता है या सामग्री की बुराई करता है, और ऐसा करते हुए आपके स्थल की कड़ी अपने स्थल पर डालता है, उसे शुक्रिया अदा करें। लोगों को पता ही नहीं है कि हिन्दी में भी लिखा जा सकता है।

अन्तर्जाल पर जो भी आपकी बुराई करता है, वह आप तक पहुँच तो सकता नहीं है, न ही आपको या आपके परिवार को तङ्ग कर सकता है। दिल पे मत लें।

एक बात और यह कि जैसे जैसे हिन्दी पर लेखन बढ़ता जाएगा, हिन्दी लेखकों में विचारों की समानता बढ़ भी सकती है, घट भी सकती है। इस बात को मद्देनज़र रखें।

जब भी आप किसी मञ्च पर हिन्दी की सिफ़ारिश करें तो कृपया हिन्दी के बजाय भारतीय भाषाओं की सिफ़ारिश करें। आप फ़र्क देखेंगे।
यह सब मैं बिना उत्तेजित हुए, ठण्डे दिमाग़ से इसलिए लिख रहा हूँ कि मैंने प्रण किया था कि कम से कम एक साल मैं हिन्दी में लिखूँगा ही, चाहे जो हो जाए। इस पहले एक साल को पार करने के लिए मुझे बहुत अपमान के घूँट पीने पड़े, तारीफ़ भी मिली, तकनीकी मुश्किलें आई, पर मेरा लक्ष्य था कि जोश ठण्डा न पड़े। इसलिए मुझे अपने आपको इन सब से अलग थलग करना पड़ा। और अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

आप सबके विचार आमन्त्रित करता हूँ। मेरा मक़सद यह है कि इस फ़ालतू के युद्ध में हम में से कोई शहीद न हो। यह मुद्दा इस लायक है ही नहीं।

12 Responses to “ध्यान दें”

  1. बहुत सही।

  2. सही है, यह बात मैं अपने अनुभव से बता सकता हूं. हिन्दि को नापसन्द करने वाले भारतीय हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप मे नही देखते बल्की अपनी क्षेत्रीय भाषा का प्रतियोगी मानते हैं. चलिये उनकी मर्ज़ी. सो आप अपने आप सिर्फ अंग्रेज़ी ही नही क्षेत्रीय भाषा वालों से उलझ जाओगे. उससे बचने की ज़रूरत है, उनको अपना दोस्त बनने की ज़रूरत है.

    मेरा बस चले तो हिन्दी कप्यूटर की मूल भाषा बन जाये शून्य और एक वाली द्विअंकीय भाषा से ज़रा उपर. संस्कृत इतनी वैज्ञानिक लिपि है - ये सम्भव है. मगर वहीं ये मुश्किल इस लिये है की आप एक क्षेत्रीय भाषा के पक्षधर को ये आएडिया नही दे सकते - बिदक जायेगा बोलेगा पहले अपनी भाषा मे बनाउंगा - हो गई ना देसि वाली सो पहले बोलो कि चल तु बना मैं मदद करता हूं फिर मेरि मदद करना, जमे तो, नही तो मेरि बिवी को पता है मेरा शगल, मुझे तो मरना ही है या कोई और मिलेगा दर्दी.
    एक बात और चलते चलते - कुछ पुराने खिलडी नए खिलाडी पे छाने कि ट्राई मारते हैं, हमारे समूह अभी इस बुराई से बचे हुए हैं, हमीं को ये जिम्मेवारी लेनी है की नया-पुराना सब साथ मे एक जिताना सम्मन पयें और योगदान दें नही तो कुकुर्मुत्तों की अगली फसल नही होगी. काश सभी अच्छे बच्चे मेरे जैसे राम भरोसे हईस्कूल के अखडे मे ट्रेन हुए होते. ये इस लिये लिखा की अपने कहने पर कुछ नए बन्दे जल्दी ही कूदेंगे, कोडिन्ग के उस्ताद नही हैं पर लिखते सही हैं जिनको ब्लागिन्ग का अनुभव है मार्ग-दर्शन करवाना होगा.

  3. Pankaj,

    (Its a long one, sorry I got carried away)

    I am learning about these issues. Writing this comment in English due to the time constraint (technical issues I can handle).

    For me this issue should be tackled more at the level where this is taken as an issue of effective language for the media. If blogging is a media tool then lets take this topic in that context.

    Why we blog -

    To express our opinions (don’t care who reads, =who-cares guys)
    To reach out to audience with opinions (=agenda-guys)
    To reach out to audiences with masti (=chill-guys)

    Ok this nicely falls into “duniya main teen tarah ke log hain”. So lets put the issue of hindi blogging in each of those categories.

    If you write in hindi to express your opinions then you dont want active audience. You just hope that after your death some JNU guy will write a thesis on your ramblings by digging into archive.org.

    For second type , If you want to reach out to the audience THEN LISTEN VERY CAREFULLY TO THEM. They have all the right to expect lot of things from you

    - easy font download link (not just easy super easy!, sniff the encoding and stop before you show the actual page),
    - use simple words (not everybody reads Harivansh Rai Bachchan),
    - and write about the things which interests audience
    - and stay away from self-indulgence

    If the guy sitting in cybercafe sees squares instead of letters then it should be the responsiblity of the writer to make sure that he is communicating the problem beforehand to the user(Is there any database of most of cybercafes in the Hindi-speaking area where we can communicate to them and fund this upgrade in a collaborative fashion ? It may sound ambitious but then we care about the problem don’t we ?). If he is seeing squares and fails to see the reason then its too late.

    Provide easy machine translated version in english as well by building parallel texts. ( lets work along these lines - http://due-diligence.typepad.com/blog/2005/01/a_minimal_step_.html , I think we should seriously learn/follow/contribute to his research - http://due-diligence.typepad.com/). Lets have a post-post triggers which checks for simple words, parallel text generation checks before publishing it for the general audience. This simple word theory sounds like a good check on over-intellectualization. Saala har hindustani to Mark Tully hai, do we need more intellectuals ?

    Lastly for the chill-guys there is no problem. Since their objective is to chill they will use what is convenient for it - hindi, hinglish, english, college-hindi(thelu, pelu,mundu,chilka etc), flickr-based pictures, podcasting, ishare whatever works. Go for ek dooje key liye ! Whatever works to get your message across. Who cares for the awards !

    “Hindi hamaare matra bhasha hai” ka naara theek hai, magar uske aage kya ? Since this is a topic every ganga-teere has to deal once in his life this time lets tackle this using digital technology.

    Personally I am against those who push hindi to non-hindi guys, and more against those who sit high and think reading/speaking hindi is something which will lower their social rank. What matters most is the new connections across cultures, languages. Just see how far our hindi movies go.

    I wish I can find a technology which connects mandarin-to-hindi. I will dip in Ganga if in this lifetime I get to see this. Thats a whole new wonderful world ! What was that song which somebody in China sang to Vikram Seth ? I think it was Raj Kapoor’s movie song. It was in Hindi. When was the last time somebody uttered mandarin in Banaras ?

    Keep the debate on. Would love to participate in whatever capacity I can.

    Brij

    PS: I get the impression that I got strayed somewhere and didnt tackle the award issue properly. Maybe next time

  4. मैने सभी गुणीजनों की बाते सुनी और उस पर गौर किया है.
    कुछ बाते सामने निकलकर आयी है कि

    १. हिन्दी चिट्ठाकारी और इन्टरनेट पर हिन्दी के मूलभूत ढांचे को और मजबूत किया जाय.
    २. अन्य भाषी और हिन्दी पढने वाले लोगो को हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे मे जानकारी दी जाय.
    ३.हिन्दी फोन्ट के सम्बंध मे कुछ क्रान्तिकारी परिवर्तन हो, जो पेज के खुलते ही अपने आप फोन्ट किसी भी जगह से यूनिकोड को उठाकर लोड कर ले.
    ४. देश मे सभी साइबर कैफे वालो से सम्पर्क किया जाय और उन्हे हिन्दी और अन्यभाषी फोन्ट डाउनलोड करने के लिये प्रेरित किया जाय.
    ५. किसी भी फालतू झगड़े मे अपनी ऊर्जा खर्च ना करके, उसे अपने चिट्ठो को बेहतर बनाने मे इस्तेमाल किया जाय.
    ६.अन्य भाषी चिट्ठाकारो से सम्पर्क स्थापित किया जाय और उनसे संवाद का रिश्ता कायम किया जाय. कभी कभी सम्मिलित चिट्ठा मेला का आयोजन भी किया जाय.
    ७. हो सके तो हर महीने हिन्दी चिट्ठाकरी पर एक अवलोकनी चिट्ठा लिखा जाय, जो हिन्दी के साथ साथ अन्य भाषाओ(अग्रेजी,बांग्ला,मराठी,सिन्धी,कश्मीरी और अन्य) मे भी हो, और इस पर महीने भर के बेहतरीन हिन्दी चिट्ठो पर प्रकाश डाला जाय, साथ ही इसमे इन चिट्ठो का लिंक भी दिया जाय. इसके लिये मै सिन्धी भाषा मे लिखने का उत्तरदायित्व लेता हूँ. इससे हमे और भी पाठको तक पहुँचने की उम्मीद है.
    ८.हिन्दी मे लिखने का एक आनलाइन ट्यूटोरियल बनाया जाय, और सभी हिन्दी चिट्ठाकारो के पन्ने पर उसका लिंक हो….हो सके तो इसको फ्लैश मे बनाया जाय.
    ९.हिन्दी के साथ साथ अन्य भाषाओ के चिट्ठो के बीच बैनर एक्सचेन्ज प्रोग्राम बनाया जाय और एक दूसरे के लिंक का आदान प्रदान किये जाय. साथ ही हिन्दी की वैब पत्रिकाओ और अन्य हिन्दी जालस्थलो के साथ भी बैनर विनिमय का प्रोग्राम शुरु किया जाय.
    १०. आटोमेटिक ट्रान्सलेशन की विधि विकसित करने की तरफ कुछ कदम उठाये जाये.
    ११. तकनीकी लोगो का एक समूह बनाया जाय, जो पाठको के तकनीकी सवालो के जवाब दे सके.अक्सर पाठको की शिकायत रहती है, हिन्दी की जगह बक्से दिखते है, हिन्दी मे कैसे लिखें वगैरहा वगैरहा.

    इस तरह से हम एक एक कदम चलते हुए अपने पाठको के समूहो तक अपनी पहुँच बनाये और हिन्दी को और आगे बढायें.एक बात हमे हमेशा ध्यान रखनी पड़ेगी, हमे दूसरी भाषाओ को हिन्दी के अधीन ना मानकर, वरन उन्हे अपना सहयोगी मानना पड़ेगा. भले ही इसके लिये हमे अपनी मानसिकता मे आमूल परिवर्तन करना पड़े.

    यदि कोई बार छूट गयी हो तो गुणीजन मार्गदर्शन करें.

  5. मित्रों, क्यों ना हम हर महीने एक भारतीय भाषा के चिठ्ठे को अवलोकनार्थ “चिठ्ठा विश्व” पर रखें? अगर संभव हो सके तो उसका अनुवाद भी हिंदी (प्रथम चुनाव) या इंग्लिश (अगर सही अनुवादक ना मिल सके तो) मे रखें.

  6. जीतू भाई,

    ये आपके ग्यारहवें बिन्दू के सन्दर्भ में

    १) मुझे जावास्क्रिप्ट के एक बन्दे की और पीएचपी / एक्सएमएल / एक्सएसएलटी के जानकार बन्दों (एक या एक से ज्यादा) की ज़रूरत है. छोटे-बडे दोनो तरह के काम हैं, निष्काम कर्मयोगी, श्रमदानी, निस्वार्थ कारज को कृपा कर आगे आएं.

    २) अक्षरग्राम की टूटी-फ़ूटी लिंको की मरम्मत करी जाए, लिविन्ग रूम में टूटी टांग वाली कुरसी से साफ़ दरी/चटाई भली. एक सुन्दर का काम प्रगती पे है का बोर्ड ही टांग दो, कम से कम ४०४ का आंकडा तो ना दिखे.

    ३) बहुत सारे फ़ोरम हैं जहां हिन्दी प्रेमी भटकते हैं - बहुत सारे ब्लागर हैं जो नए मित्रों, पाठकों को ब्लागिंग के लिए प्रेरित करना चहेंगे - ऐसे अवसरों का उपयोग खतरनाक तरीके से किया जाए.

    आप सब ने मुझे इतने प्रेम से पढा, आप सब का बहुत भयंकर धन्यवाद.

  7. स्वामी जी,

    आप किस कड़ी की बात कर रहैं है। जरा बताईए अभी मरम्मत किए देते हैं। यदि आप के अक्षरग्राम के प्रति और भी विचार/सुझाव हों तो बताईए। बढिया रहेंगे।

    पंकज

  8. Pankaj ji,

    Under shreNiyaan every link other than Anugoonj does not work. OnClick I get Error 404.

    Thanks for asking more feedback about akshargram :

    I read your reply to my ‘nivedan’. I believe that the HUG tool or some similar script can be inserted to Akshargram.com and if we modify the tempelates on blogspot atleast it can be provided as a popup.

    The Blogs hosted by providers other than blogspot can benefit from these kind of efforts.

    Many hindi lovers and I made a small effort to make an hindi section on an otherwise english forum (echarcha.com) and the other languages may follow.

    If you want to go overboard, There are many telented programmers who love hindi and they may like to contribute to the cause, a programmer’s section on akshargram may become a place for them to get together - it will help info exchange and help develop design and test new tools.

    eswami

  9. कज भाई,
    शायद आपने कुछ बदला है, अभी रीसेन्टली, अक्षरग्राम की श्रेणिया नही चल रही है.
    दूसरा मैने आपको बताया था कि मेरे पास अक्षरग्राम की टिप्पणिया भी यूनिकोड मे नही आ रही है. जरा देखियेगा.

    ईस्वामी भाई, अपना टूल मेरे को भेजो, बिना किसी फोरम वाले टैम्पलेट के. मै अपने फोरम पर चैक करता हूँ. और भइया अपना हिन्दी का भी फोरम है, कभी टहलते हुए आ जाओ.
    http://jitu.info/forum

  10. जीतू पेलवान,

    ओफ़-लाईन वर्शन इधर है - जवास्क्रीप्ट का कोड है मलाई जैस्सा उपर उपर - चुरा लो.

    http://www.echarcha.com/forum/showthread.php?s=410995f9623504ec4c9c4cb850ef4fe4&threadid=18904

    अपने फ़ोरम मे घुसेडने के लिए मदद इधर से लो -

    http://www.echarcha.com/forum/showthread.php?s=410995f9623504ec4c9c4cb850ef4fe4&threadid=18934

    आपको में इस कडियों को पढने के लिए भी कहुंगा. आपके फ़ोरम पे अभी बहुत सन्नाटा है, फ़िलहाल इस को टेस्टिंग के लिए सही मानो पर अपने टूल घुसेडने के बाद इसका प्रचार कर दे‍गे. क्या आप इसको हिन्दी मात्र का फ़ोरम रखना चाहते हो या बाकी भाषाए भी घुसाने का मूड है - वो भी किया जा सकता है - कोई मुद्दा नही है.

    मेरी मदद कैसे चहिए वो बताओ. अभी मेरी खोपडी में और भी घातक कीडे वल्वला रहे हैं - इसीलिए आदमी मांगे.

    बग्स को ठीक करना करवाना होगा, फ़ाईनल कट में २-३ धुआंधार परिवर्तन डालने है‍. वो आगे आगे.

  11. […] ब्लागिंग मेरे लिये शुरू में अभिव्यक्ति का माध्यम बनी। अपना सारा पहले का लिखा कूड़ा कबाड़ हमने अपने ब्लाग पर डाल दिया, डालते गये। अनुगूंज शुरुआती दिनों में अभिव्यक्ति का अच्छा माध्यम बना। अनुगूंज के जरिये हमने कुछ नये लेख बहुत मन लगाकर लिखे। उनमें मेरा सबसे पहला लेख -क्या देह ही है सब कुछ मुझे अभी भी लुभाता है। अनुगूंज की दुबारा अविलम्ब शुरुआत होनी चाहिये। अनुगूंज के साथ ही हम लोग उन दिनों अंग्रेजी ब्लागरों द्वारा आयोजित ‘ भारतीय ब्लाग मेला‘ प्रतियोगिता में भी कुछ दिन उचक-उचक कर हिंदी के ब्लाग नामांकित किये। एक बार जब हिंदी के कई ब्लाग वहां चर्चित हुये तो अतुल की ‘डांसिग-मेल’ आयी- हिंदी ब्लाग मेला में छा गयी। उसमें होना-हवाना कुछ नहीं था लेकिन कुछ चर्चा होती थी हम उसी में निहाल हो जाते थे। एकाध बार अतुल, जीतेन्द्र से पंगा हुआ। कुछ लोगों ने अपने ब्लाग में कलाकारी पूर्ण फोटो लगाये उसको अतुल और जीतेंन्द्र ने करमचंद जासूस बनकर फ्राड बताया। फिर बाद में उन लोगों ने हम लोगों के ब्लाग की चर्चा बन्द कर दी। इसपर बड़ा वबाल हुआ। हम सब लोगों ने मैडमैन नामक ब्लागर के यहां इतनी टिप्पणियां कीं कि बेचारा पगला गया और उसने अपने ब्लाग पर कमेंट बन्द कर दिये। फिर उसी समय अक्षरग्राम पर तमामबहसे हुयीं। निरंतर का प्रकाशन शुरू हुआ। उसी समय चिट्ठाचर्चा शुरू किया गया। चिट्ठाचर्चा शुरू करने के पीछे ‘ब्लाग मेला’ में कुछ अंग्रेजी ब्लागरों द्वारा हिंदी ब्लाग से बिदकने के कारण अपना मंच बना था। वे हिंदी से बिदकते थे। हमने कहा हम दुनिया की किसी भी भाषा की चर्चा करेंगे। कुछ दिन इसे मैं अकेले लिखता रहा। अंग्रेजी ब्लाग्स के बारे में भी लिखने के कारण इसे वे भी पढ़ते थे। लेकिन समय के अभाव के कारण इसे बाद में स्थगित करना पड़ा। बाद में हमें अंदाजा लगा कि हमारा तरीका गलत था। फिर हमने अपने और साथियों से अनुरोध किया और अब मेरे ख्याल में चिट्ठाचर्चा हमारे ब्लाग जगत की एक उपलब्धि है। आगे मेरा मन है कि हम इसे इसके मोटो ‘दुनिया की किसी भी भाषा के चिट्ठे का चर्चा’ के अनुरूप बना सकें तो क्या कहने! […]

  12. जितेन्द्र चौधरी जी की ये बाद बहुत जोरदार है।
    ८.हिन्दी मे लिखने का एक आनलाइन ट्यूटोरियल बनाया जाय, और सभी हिन्दी चिट्ठाकारो के पन्ने पर उसका लिंक हो….हो सके तो इसको फ्लैश मे बनाया जाय.

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