कारवाँ बढ़ता गया

प्रतिभास - http://pratibhaas.blogspot.com
हिन्दी पर अनुनाद सिंह जी की पकड़ देखकर मजा आ गया। आज ही संचायी शब्द का पता चला। मैं हिन्दी ब्लॉग पढ़ते पढ़ते पक्का समझदार हो जाउँगा। अनुनाद जी इन्दौर से हैं जो कि हिन्दी चिट्ठों का पहला गढ़ था अब तो कानपुर वाले भी आके भसड मचा चुके हैं।

ई-लेखा - एक चिट्ठा अपने मोहाली से भी शुरु हुआ है और पता लगता रहता है कि पिकाडली पे कौन सी फिल्म लगी है। भाई कुछ फिल्म के साथ सिन्धी के भडूरों का इंतजाम भी हो जाता तो :D जीतेन्द्र बाबू यहाँ सिन्धी चंडीगढ़ के 17 सैक्टर के हलवाई की बात हो रही है पर गर आप की श्रद्धा हो तो आप भी भेज सकते हैं।

कुछ बतकही - http://linhin.blogspot.com/
धनंजय जी के बारे क्या लिखें मेरी बोली में कहेंगे - औ भरावा दिल खुश कीता इ आ मतलब भाई दिल खुश किया आपने। लिनक्स मेरा पहला प्यार था शायद इसीलिए पाँचवीं अनुगूँज के लिए लिख नहीं पाया कि पता नहीं लोग मेरे और लिनक्स के इतने व्यक्तिगत रिशते को समझेंगे कि नहीं फिर इस रिश्ते का कोई नाम भी पूछेंगें। पर कोई तो है जो इस के बारे में लिखता है और अपना योगदान भी देता है। धनंजय जी आने दीजिए अपने लेखों का धाराप्रवाह हम भी सर्दियों में बिना गर्म किए नहाएंगे।

जाते जाते उक्ति - आज पिनक में कुछ ज्यादा ही बोल गया, भूल चूक लेनी देनी। भाई मिर्ची सेठ हूँ जिंदगी बीत गई मिर्चों की क्रय-विक्रय रसीद पर यह नुक्ता देखते देखते तो यहाँ इस से बढ़िया क्या हो सकता है लेकिन अब मैं चुप।

2 Responses to “कारवाँ बढ़ता गया”

  1. अनुनाद तथा आशीष का फिर से स्वागत.पंकज अब लिख डालो अपने तथाकथित प्यार की कहानी.जो होगा देखा जायेगा.

  2. लिखेंगे और अपनी ही कहानी लिखेंगे, देखते रहिए।

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