महारथियों, क्या ये संभव है?
कल्पना कीजिये कि आप जो भी अपने ब्लाग पे पेलते हैं वो आपने एक .mp3 मे भी रेकार्ड किया.
अब ऐसी सभी recorded .mp3 की स्ट्रीमिन्ग ठीक उसी तरह आन-लाईन रेडियो के रूप मे कर दो, जैसे हम नये ताज़े RSS Feed दिखा देते हैं चिट्ठा विश्व के माध्यम से. इस के लिये पहले .MP3s को किसि भी सर्वर पे चढा दो और उसकी लिन्क के साथ कुछ “RSS Feedनुमा” करो, या जो भी बेहतर उपाय हो ऐसा करने का!
Streamer कि लिन्क दे दो, जो रेडिओ जैसा बजेगा आपके प्लेयर पे, सबसे ताज़ा
updated .mp3 सबसे पहले! तो आपका हिन्दी ब्लाग रेडिओ बन गया. Headphones लगाओ और पीला वासन्ती चाँद अनूपजी की आवाज मे सुन लो - आवाज़ का उतार-चढाव भावनाऒ का बेहतर संप्रेशन. अगली .mp3 नरुलाजी की!
शुरु मे टिप्पणी चाहे मत दो मगर बाद मे कुछ ऐसी जुगत के टिप्पणियां भी घुसती जाऎ, “इस पर पहली टिप्पणी फलाने जी की..” + टिप्पणी, वगैरह.
हां ऐसे काम को करने के लिए एकाधिक लोगों के पिछवाडे सुलेमानी कीडों द्वारा एक साथ काटा जाना आवश्यक है - परन्तु ये असंभव नही है.
आईडिया खुराफाती लगा की नही?
Filed under: तकनीकी

अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




पंकज जी सब कुछ सम्भव है,
लेकिन मै अभी ढूँढ रहा हूँ कि किसी तरह से mp3 फाइल की स्ट्रीमिंग हो सके… जैसे अपना www.musicindiaonline.com चलता है. ठीक उसी तरह से. इससे तो अव्वल फाइलसाइज छोटी होगी, जिससे लोडिंग फास्ट होगी और दूसरा किसी को भी mp3 player की आवश्यकता नही पड़ेगी. रियलआडियो का तो आपशन मौजूद है लेकिन दूसरे के लिये सही नही दिख रहा.
फिर भी हिम्मत ए मर्दा, मदद ए खुदा
सवाल पूछा स्वामी ने जवाव मिला पंकज को!
यार स्ट्रीमिग करने के १७६०(सत्रह सौ साठ) तरीके हैं
उदाहरण के लिए ये देखो
और ये -
ye bhee
फन्डू स्वामीजी,
साइट तो अच्छी बतायी है, जुगाड़ू हो.
लेकिन कोई फ्री का माल डाट काम नही है क्या?
अभी हम भी नये, अपने बन्दे भी नये…कंही सीखते सिखाते ही ना पैसे खर्च हो जाये.
और तुम्हारी तो समस्याये थी, उनका जवाब मिल गया?
कुछ और पूछना हो तो पंकज गुरूजी है.
ye lo ji
14 din free
company link
OS compatibility etc waalee baate baad me - I’ll find more solutions!
I need more input about how the feeds will get automated! wo sawaal coders ke liye managers ke liye nahee … hee hee .. joking !
बेटा मैनेजर के बिना कोडर बेकाबू हो जाता है.
इसलिये मैनेजर जरूरी है.
ज़ीतु पेलवान,
गलती से दूसरे उत्पाद कि कडी डाल दी जल्द-बाज़ी मे!
ये सही कडी लो -
ye rahee
I am sure something of this sort will help.
I don’t know if this has a trial version but this supports 4-5 different databases.
कोडर-मेनेजर वाला पन्गा पेन्डिन्ग रहा!
बहुत सही है, लेकिन पैसा हर जगह लगेगा. फिर भी ट्राई मारेंगे.
इसके अलावा देखता हूँ, यार कि कोई प्रोजेक्ट www.sf,net पर है क्या.
भइया हम तो माल ए मुफ्त और दिल ए बेरहम वाले है.
अभी तक मैने जितनी भी कडियां दी वो सब बस उदाहरण हैं. हमारी सस्ति-सुन्दर-टिकाऊ जरूरत के लिए इन मे से कोई भी पूरी तरह उपयुक्त नही है.
मगर इस का कोई रामबाण नुस्खा होना चहिये - फीड भी आटोमेटिक हो जाये ऐसा वाला! नही तो भाड मे गई स्ट्रीमिंग सीधे <.mp3> की लिन्क दो और बस!
स्वामी जी
आप बेशक तकनीकि प्रतिभा के धनी है| एक से एक नूतन विचार सामने लाते हैं| उसके लिए साधुवाद| मैं इससे भी सहमत हूँ कि हास परिहास बना रहना चाहिए, पर अपने इस कथन पर फिर दृष्टिपात करिए|
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हां ऐसे काम को करने के लिए एकाधिक लोगों के पिछवाडे सुलेमानी कीडों द्वारा एक साथ काटा जाना आवश्यक है - परन्तु ये असंभव नही है.
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क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि हमारे हिंदी ब्लागमंडल पर देवताओं के अलावा देवियों की सक्रियता में ईस तरह की भाषा काली बिल्ली की तरह रास्ता काट सकती है?
ठीक है, भाव समझ गया, स्वीकारा भी, दोहराव के ना होने का वादा रहा.
भविष्य के लिए, क्या ये उक्ती स्विकारणीय है?
“इस के लिए एकाधिक लोगों को वहां सुलेमानी कीडे काटनें चहिये जहां सूर्य भी नही चमकता”
य़ा
“इस भगिरथ प्रयत्न हेतु एकाधिक महनुभावों का अपूर्व सहयोग आवश्यक होगा!”
आधुनिक ” देवियां ” आज आम माध्यम मे जो देखती कहती सुनती है उसका ब्यौरा दिया बिना बस ये निवेदन करुंगा कि -
अगर पहला तरीका स्वीकारणीय है तो आभार और अगर दूसरा तरीका अपेक्षित है तो सदैव के लिये आभार.
अतिसंवेदनशील आत्म-मोहिताऒ (यहां बोरिंग पढें) के लिया अपन हमेशा से स्थान खाली करने और भाग निकलने को उद्यत रहे हैं - ज़रा एलर्जी सी है! यहां किस प्रकार वाली विचरतीं हैं नया होने की वजह से अनभिज्ञ्य हूं!
बिलावजह टांग अड़ाने और छोटा मुँह बड़ी बात कहने के लिये माफ़ी चाहता हूं.
मेरे ख्याल है कि क्या लिखना सही है और क्या लिखना ग़लत है इस बारे में न ही सोचा जाय तो ज्यादा अच्छा है.
वैसे भी नेट और ब्लाग जैसे आज़ाद माध्यम में हर तरीके की धारायें बहती ही रहेंगी.
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