जय राम जी की
Posted on जनवरी 31st, 2005 द्वारा विजय ठाकुर
पंकज जी का शुक्रिया गाँव के चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाने का मौका देने का। अब हुक्का तो अपना ही रहेगा पर तमाखू माँगता रहूँगा भाइयों, क्यों क्या खयाल है। अरे हाँ वो क्या कहते हैं मिर्ची सेठ और आलोक भाई ने पूछा था प्रारंभ के छात्रों की हिन्दी में मीन मेख के बारे में, हाँ तो खिंचाई कीजिए जरूर लेकिन देखियेगा घोड़ी बिदक न जाये, डराइयेगा मत छात्रों को और जहाँ तक हो सके सरल हिन्दी के माध्यम से ही, “हस्त-प्रक्षालन” की तरह नहीं
क्या पता कल इन्हीं में से एक और मार्क टली पैदा हो जाये।
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




ठाकुर सा थारो स्वागत हैं।
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