छठी अनुगूँज का निमन्त्रण

अभी हम लोगों ने बुनो-कहानी पर “मृत्युञ्जय” की तीन किस्तें बुनी और पढ़ीं। विषय था - आस्तिकता की नास्तिकता से और वैज्ञानिक विचारधारा की अन्धविश्वास से टक्कर। मैं कहानी के मुख्य पात्र मृत्युञ्जय की तरह सोचना पसन्द करता हूँ, पर कई बार अमर जैसे मंझे हुए विचारकों के साथ बहस में घुटने भी टेकने पड़ जाते हैं। अपने पिता जी के साथ मेरी बहस होती है तो वे कहते हैं, “तुम दूसरों के विचारों को अन्धविश्वास कहते हो, पर स्वयं अन्ध-विश्वासी हो। जितना बुरा अन्धविश्वास है, उतना ही अन्ध-अविश्वास। बिना धार्मिक ग्रन्थों को पूरा पढ़े या बिना किसी अलौकिक अनुभव के तुम कैसे इन चीज़ों को नकार सकते हो?”

Akshargram Anugunjक्या आप लोगों के साथ व्यक्तिगत रूप से ऐसा कोई अनुभव हुआ है, जिसने आप को बाध्य किया हो यह सोचने पर कि किसी अलौकिक शक्ति का आप की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में दखल है? चान्द सितारों की मिसाल न दें, और न ही कुदरत के करिश्मों की। क्या आप ने कभी ऐसा देखा है कि सेब पेड़ से ज़मीन पर न गिर कर ऊपर गया हो, या किसी चित्र से भभूति निकली हो, या कोई विचित्र भविष्यवाणी बिल्कुल सच साबित हुई हो? यानी जाने माने प्राकृतिक नियमों की अवहेलना। सुने सुनाए किस्से तो बहुत मिलते हैं, पर क्या आप के साथ ऐसी कुछ बीती है? किसी ऐसे परिजन का भी अनुभव आप सुना सकते हैं जो आप को यकीन है कि नमक मिर्च के साथ आप तक न पहुँचा हो। यदि आप को ऐसे किसी किस्से का अनुभव नहीं है, तब भी इस विषय पर कुछ कहना हो तो कहें। यही है छठी अनुगूँज का विषय — “मेरा चमत्कारी अनुभव”

मेरे निमन्त्रण में देर हो गई है, पर आप आने में देर न करें। पहली मार्च को सातवीं अनुगूँज के लिए जगह खाली करनी है, फरवरी का महीना भी छोटा है, इसलिए अपनी “विचार टोपी” पहनें और लिख ड़ालें कुछ हफ्ते भर में। लिखना आप को अपने ब्लॉग पर ही है, बस अनुगूँज का लोगो चिपकाना न भूलें। अनुगूँज के नियम यहाँ देखें।‍
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अपडेट १ मार्च २००५:
अभी तक निम्न चिट्ठों पर प्रविष्टियाँ आ चुकी हैं
- मेरा पन्ना
- मेरा चिट्ठा
- रोज़नामचा
- हाँ भाई
- इधर उधर की
- ई-स्वामी
- अपनी बात
- नुक्ता चीनी
- फ़ुरसतिया
- रवि रतलामी
- अभिव्यक्ति
- प्रेमपीयूष
छठी अनुगूँज का अवलोकनी चिट्ठा यहाँ देखें।

9 Responses to “छठी अनुगूँज का निमन्त्रण”

  1. Thinking cap = विचार टोपी। रमण भाई लगे रहो। शायद इस नुक्ते का हिन्दी में प्रयोग पहली बार देख रहा हूँ।

  2. रमण भाई,
    हम तो अपनी अनुगूँज की प्रविष्टि कल ही लिख दिया हूँ, ऊ का है, कहते है ना “कल करै सो आज कर ,आज करै से अभी”….सो इस नाते हमका राजा बेटा वाली शाबासी दिया जाना चाहिये.

    अब छड़ै और परिवारवाले लोग भी जल्द से जल्द अपनी प्रविष्टि अपने ब्लाग पर लगावे.

    हमरी प्रविष्टि यहाँ पर देखें.
    http://www.jitu.info/merapanna/?p=272

  3. I am missing from the list. http://rojnamcha.blogspot.com/2005/02/blog-post_22.html

  4. क्षमा करें अतुल, भूल हो गई। अब जोड़ दिया हूँ। ब्लागडिगर से देखता हूँ पर वह सो सो कर जागता है, अब जा कर आप की प्रविष्टि दिखी है उस में। जीतू का ब्लागफीडर लगता है उस से तेज़ है।

  5. लो भाई ,डर के हम भी लिख दिये
    http://fursatiya.blogspot.com/2005/02/blog-post_25.html#comments

  6. मेरी प्रविष्टि है - http://abhivyakti.blogspot.com/2005/02/blog-post_26.html

  7. मेरी प्रविष्टि की कङी भेज रहा हूँ । http://www.prempiyushhindi.blogspot.com .

  8. […] “मेरा चमत्कारी अनुभव” - मैंने अनुगूंज का यह विषय चुन कर स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। स्वयं का कोई ढ़ंग का अनुभव है नहीं, लिखूँ तो क्या लिखूँ? यही होता है जब नौसिखियों को कोई ज़िम्मेवारी का काम दिया जाता है। समस्या यह है कि जब तक मैं स्वयं न लिखूँ तब तक न तो जीतेन्द्र और आशीष को “राजा बेटा वाली शाबासी” दे सकता हूँ, न औरों को अनुगूँज के एक नए आयोजक की लाज रखने की गुहार कर सकता हूँ। इसलिए, चलिए कोशिश करता हूँ थोड़ा कुछ कहने की। पते की बात कुछ छोटी है इसलिए घुमा फिरा कर कहूँगा। […]

  9. […] अनुगूंज ६: चमत्कार या संयोग? February 25th, 2005 अनुगूँज श्रेणी में प्रकाशित Tags: anugunj, अनुगूंज. वैसे तो मैं सर्टिफाईड नास्तिक हूँ पर मेट्रिक्स देखने के बाद से मैं इसकी थ्योरी का कायल भी हो गया। कई दफा जीवन में ऐसा हो जाता है कि इस बात पर यकीन सा होने लगता है कि जीवन मानो कोई कंप्यूटर सिमुलेशन हो। एम.आई.बी के अंतिम हिस्से में मेरे इस विचार से मिलता जुलता दृश्य था जिसमें पृथ्वी पर से कैमरा ज़ूम आउट करता है और हमारी आकाशगंगा से होते हुए बाहर चलता ही जाता है। जान पड़ता है कि जो हमारे लिए विहंगम है, विराट है वो किसी और के लिए हैं महज़ खेलने की गोटियाँ। ये रिलेटिविटि मुझे बड़ा हैरान करती है। हाल ही मैं अपनी पुरानी कंपनी की प्रॉविडेन्ट फंड के बारे मे दरियाफ्त कर रहा था, रकम के अंक पर नज़र पड़ी १९४७८। बड़ा जाना पहचाना सा अंक लगा, पर हैरत भी हुई, दो चार अंक का मेल संयोग वश हो ही जाता है, ये तो पाँच अंक थे। दिमाग पर ज़ोर डाला तो याद आया कि ये तो किसी पूर्व नियोक्ता के यहाँ मेरी इम्प्लाई आई.डी थी। हूबहू वही नंबर! कैसा चमत्कार था यह? Share This […]

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