पिता-पुत्र अगल-बगल
Posted on फरवरी 22nd, 2005 द्वारा अनूप
बधाई अतुल को, उनके परिवार को .नयीअभिव्यक्ति (16.02.05) मे अतुल के संस्मरण की तीसरी किस्त तथा उनके पिताजी (श्री श्रीनाथजी) की कहानी उपहार छपी है.पिता-पुत्र का लिखा अगल-बगल छपा देखने का संयोग विरल होता है.धन्य हुई आंखें, तृप्त हुआ मन . बधाई.

अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




बधाई हो अतुल भाई, हम भी धन्य हुए यह जान कर कि कितनी ऊँची संगत में बैठे हैं।
बहुत बहुत शुक्रिया| मैने तो अभिव्यक्ति का होमपेज का चित्र ही संजो कर रख लिया है| रमण भाई हमने पहले ही ठाकुर साहब के यहाँ हिंदी ब्लागजगत के लेखको का वर्णन कर रखा है| करना तो स्वामी जी के यहाँ चाहता था पर भगवान जाने क्यों टिप्पणियों पर ताला ठोंक रखा है| वह पूरी टिप्पणी फिर से छापता हुँ|
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आपका और स्वामी जी का लेख दो बार पड़ने के बाद भी आधा समझ में आया| पहले देवाशीष , फिर रमण भाई,आप और अब स्वामी जी, लेखन में अनूप शुक्ला और ठलुआ नरेश जैसी गुरूतर अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं| अब शुरूआती कोहरा छटने के बाद साफ नजर आ रहा है कि कि ब्लागजगत में कुछ भारीभरकम लेखनियाँ भी मौजूद हैं| कोई भी यादि बुरा ना माने तो सीधी सच्ची राय यह है कि जीतू,पंकज,आलोक और रवि भाई के लेखन को मैं अपनी श्रेणी में रखता हूँ जो चाहे फटाफट लिखी जाये चाहे पूरे मूड में , पर बात एक ही बार में भेजे में घुस जाती है| जब्कि अगर देवाशीष ,रमण भाई,आप, स्वामी जी, अनूप शुक्ला और ठलुआ नरेश अगर पूरे मूड में लिखे तो मुझे अपने ईंटरमीडिएट में हिंदी साहित्य छोड़ देने का दुष्परिणाम स्पष्ट दिखने लगता है |
अतुल भाई,
आपको, आपके परिवार को और हमारे चिट्ठाजगत परिवार को हार्दिक बधाई!
अदना सा प्रोग्रामर हूं. आप नए खिलाडी को एक-आध तुक्का लग जाने पर बेट्टिंग ओर्डर मे उपर चढा दिये हो बंधू, कोई नही दो-चार फिसड्डी लेख के बाद ये बेट्टिन्ग ओर्डेर अपने आप ठीक हो जावेगा - चौके-छक्के आप लगा ही रहे हो, मैं पानी की बोतल ले कर तेज़ी से दौड लूंगा.
अक्षरग्राम के समान हिंदिनी पर भी स्पेम्मिन्ग का गन्द फैल गया था - पोकर वाले एड वगैरह सो स्पेम-कर्मा लगा कर टिप्पणी लिखने के लिए रजिस्तर करवाने की मजबूरी रही. अभी वर्डप्रेस से दोस्ती हो रही है तो नई नई चीजे समझ आ रही है. हिँदिनी पर तो आप स्वयँ लोगिन बना सकते हैँ नही तो आज मैं बना कर मेल भेजुन्गा.
अतुल भाई, बहुत बहुत बधाईया हो.
सबसे पहले तो बाऊजी(आशा है वो इस सम्बोधन का बुरा नही मानेंगे.) की कहानी “उपहार” की बातः वैसे तो मै अभिव्यक्ति पर कहानिया कम ही पढता हूँ, लेकिन बाऊजी की कहानी को शुरू करने के बाद, बीच मे खत्म करने की इच्छा ही नही हुई, एक बार पढना शुरू किया तो पढता ही चला गया.उनकी लेखन शैली का अन्दाज निराला है.बहुत ही मर्मस्पर्शी कहानी लिखी है उन्होने. मेरी शुभकामनाये उन तक जरूर पहुँचा दीजियेगा.
हर पिता का सपना होता है कि उसकी सन्तान उससे भी आगे जाये, जग मे खूब नाम कमाये.जब कभी भी पितापुत्र के काम को एक साथ देखा जाता है, तो जाने अनजाने मे तुलना हो ही जाती है. लेकिन यहाँ पर मामला ही कुछ दूसरा है, बाऊजी का लिखने का तरीका और अतुल भाई की शैली दोनो एकदम अलग अलग है, लेकिन फिर अगर गौर से देखा जाये तो दोनो ने जीवन के काफी करीब से जुड़े मसलो पर बात की है, तरीका भले ही अलग अलग हो. मेरी शुभकामनाये अतुल भाई के साथ है, और मै चाहूँगा कि बाऊजी का सपना जल्द से जल्द पूरा हो.
अतुल सरजी
म्हारी बधाई भी कबूल हो। रै भाई इब तो थारे बालक की बारी है कुछ लिखने की।
पंकज
जीतू भाई
पिताश्री की किताबें पड़ो तो साठोत्तरी दशक के पिसते मध्यमवर्ग की पीड़ा सामने आ जाती है| अनुप शुक्ला भी उनसे व्यक्तिगत रूप से मिल चुके हैं| उनकी बाल साहित्य की और लघु कथाओं का संकलन सोचता हूँ, धीरे धीरे विश्वजाल पर लाता हूँ|
पंकज भाई बधाई हेतू धन्यवाद , रही बात बांके बिहारी की तो उनकी रुचि फिलहाल थामस ट्रेन में ज्यादा है आगे किस क्षेत्र में होगी यह तो समय के साथ ही पता चलेगा|
I am having problem with Chhahari site. It does not accept any keyboard entry on the form. Instead it starts writing next to the title right above the form.
So my apologies, but it is really wonderful to see two generations together. I was talking to Anup Shukla the other day and he told me about Atul’s father. As Pankaj said, it is turn of the new generation to do the job aur hum gaayenge-
Jaadu daar gayo re mo pe baanke bihari
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