यह ब्लॉग है क्या बला?
Posted on फरवरी 24th, 2005 द्वारा पंकज
अनूप सेठी जी का वागर्थ में “हिन्दी का नया चैप्टर : ब्लॉग” यहाँ से जरुर पढ़े
यह ब्लॉग है क्या बला? एक तरह की वेबसाईट ही है। थोड़ी अनौपचारिक। थोड़ी अव्यवसायिक। थोड़ी निजी। थोड़ी सार्वजनिक। इसे बनाने और सर्वर पर रखने की झंझट नहीं है। फिलहाल तो जगह मुफ्त में मिल रही है। इसे एक तरह से प्रोत्साहनपरक माना जा सकता है। कोई भी अपना पन्ना आसानी से बना सकता है। यह एक अकेले की पत्रिका होती है। कोई देख ले तो भला, न देखे तो भी भला।
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




चलो अच्छा है,हिन्दी चिट्ठो की गूँज वागार्थ मे भी छा गयी.
मन प्रसन्न हो गया, इस तरह से हमे कई स्वयंसेवक चाहिये, जो हमारे चिट्ठो को जन जन तक पहुँचाये. कार्य मुश्किल है असम्भव नही.
अभी तो ये शुरुवात है, आगे आगे देखिये होता है क्या.
क्या ख्याल है, अनूप सेठी जी जैसे शुभचिंतको को सामूहिक रूप से निवेदन किया जाये, हिंदी ब्लाग बिरादरी में शामिल होने के लिए?
कई लोगो के लिए कोई चीज तब कर माईने नही रखती जब तक टाईम जैसे पत्रिका उस पर लेख ना लिख दे. टाईम वाले तब तक लेख नही लिखते जब तक वो चीज हिट ना हो ले! ब्लाग का महत्व और ये विधा त्सुनमि से पहले से हिट है ये बात टाईम को भी ना पता हो तो हम क्या करें, भई आम आदमी के सामने महत्व देने का ठेका तो पत्रिका वालो का है ना और ये नही जानते की आम आदमी क्या खास चीज होती है, जब तक ये घोन्घे कलम मे स्यही भरें इधर कीबोर्ड की कडकडाहट हो के सँजाल पे गूंज चुकती है.
इस से पहले हावर्ड डीन की अमेरेकी राष्ट्रपति बनने की दौड मे ब्लगिन्ग अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुकी थी, सँवाद सीधे-सीधे प्रत्याशी और आम आदमी के बीच था कोई पत्रिका या घोन्घा बीच मे नही था - रातो रात ये प्रत्याशी हिट हो गया था. त्सुनामी तक टाईम वाले जाग गए और एक - आध लेख छप गया. चलो कोई नही सेठीजी को पता ना हो कि इन्टर्नेट पर खबर मिनटो मे पुरानी हो जाती है! वैसे यार ये वागर्थ का मतलब क्या होता है? हिंन्दी वालों मे क्लिष्टता बौद्धिकता का पैमाना है और अपन ठहरे निपट गंवार!
गुप्त के गाने के पेरोडी -
ये ब्लाग क्या है किसि ने ना जाना
सबकी ज़ुबां पे मगर ये तराना
अई-यई-यई-यई-यई-यई-यई-याह
वाग माने वाणी होता है .सो वागर्थ माने वाणीका अर्थ होना चाहिये .लेख का अन्तिम पैरा बहुत अच्छा है:-
यहां गद्य गतिमान है। गैर लेखकों का गद्य। यह हिन्दी के लिए कम गर्व की बात नहीं है। जहां साहित्य के पाठक काफूर की तरह हो गए हैं, लेखक ही लेखक को और संपादक ही संपादक की फिरकी लेने में लगा है, वहां इन पढ़े-लिखे नौजवानों का गद्य लिखने में हाथ आजमाना कम आह्लादकारी नहीं है। वह भी मस्त मौला, निर्बंध लेकिन अपनी जड़ों की तलाश करता मुस्कुराता, हंसता, खिलखिलाता जीवन से सराबोर गद्य। देशज और अंतर्राष्ट्रीय। लोकल और ग्लोबल। यह गद्य खुद ही खुद का विकास कर रहा है, प्रौद्योगिकी को भी संवार रहा है। यह हिन्दी का नया चैप्टर है।