बचपन के मेरे मीत - सातवीं अनुगूँज का निमन्त्रण

व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न हो जाय उसके अंदर एक बच्चा हमेशा जीवित रहता है. बचपन की गलियाँ, बचपन की यादें मन के किसी एलबम में हम हमेशा संजोये रखे रहते हैं. इनको जीवंत बनाता है ‘रैता -पैता-मना -मनसुखा’ जैसे मित्रों का साथ जिनकी खातिर कृष्ण भी द्वारिका का वैभव छोड़कर ‘वृंदावन की कुंज गलिन’ में आने को आतुर रहते थे. तो आइये हम ज़रा अपनी इन यादों के इर्द-गिर्द पड़ी धूल झाड़ें-पोंछें, कुछ चित्रों को छुएँ, उन पर कोमलता से हाथ फेरें और एक बार भूल जायें कि हम अब क्या हैं. आँखों की नमी, होंठों की मुस्कराहट और हृदय के उल्लास को फिर उसी बालसुलभ मासूमियत से अपनी लेखनी में उतारें और इसी बहाने उन मित्रों का आभार व्यक्त करें और इसी के साथ हमें भी मौका दें अपनी ज़िंदगी में ताक-झाँक करने का. Akshargram Anugunj

तो दस मार्च तक अपनी प्रविष्टियाँ भेजिये ब्लाग पर.
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6 Responses to “बचपन के मेरे मीत - सातवीं अनुगूँज का निमन्त्रण”

  1. मै अपनी कङी भेज रहा हूँ । http://prempiyushhindi.blogspot.com/2005/03/7.html

  2. मेरी प्रविष्टि देखें: http://ashishkachittha.blogspot.com/2005/03/blog-post_05.html

  3. इंद्र भाई, क्या शीर्षक चुना है, बचपन की खुरापातों की याद दिला दी।

  4. […] करीब का विषय है यह। जैसे ही विषय की घोषणा हुई, मैंने सोचा कि अपनी प्रविष्टि […]

  5. मेरी प्रविष्टि देखें: http://rojnamcha.blogspot.com/2005/03/7_10.html

  6. […] बचपन के मीत — बड़ा ही भावुक और दिल के करीब का विषय है यह। जैसे ही विषय की घोषणा हुई, मैंने सोचा कि अपनी प्रविष्टि तो निश्चित है। पर अलाली का आलम यह है कि कोई बात तब तक नहीं होती जब तक उस की अन्तिम तिथि न आ जाए। अंकल सैम से टैक्स रिफंड के रूप में पैसे भी वापस लेने हों, तो उसकी कार्रवाई भी १५ अप्रैल से पहले नहीं होती। […]

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