आठवीं अनुगूंज का निमंत्रण

अनुगूंजदोस्तों, हांलांकि सातवीं अनुगूंज का अभी समापन नहीं हुआ है, फिर भी मैं समय के अनुसार इसको आगे बढ़ा रहा हूं। इसलिये असुविधा के लिये क्षमाप्रार्थी हूं।

शिक्षा का हमारे जीवन में जो महत्व है उससे हम सब बहुत अच्छी तरह से वाकिफ़ हैं। आज हम जो भी हैं या जो भी कर रहे हैं उसमें हमारी शिक्षा का बहुत महत्व है। लेकिन शिक्षा का मतलब केवल रोजगार या जीविका से नहीं है। शिक्षा एक ऐसा सशक्त माध्यम है जो कि समाज को एक दिशा देता है, समाज बनाता है, लोगों को एक साहस देता है आगे बढ़ने का और एक जज़्बा कुछ कर दिखाने का। शिक्षा प्रेरणा का श्रोत होती है, नये आविष्कारों की जननी है, संस्कार देती है और एक समाज की अच्छाइयों या बुराइयों का आधार भी होती है। शिक्षा के बिना मनुष्य अधूरा है, यहां तक कि कुछ भी नहीं है। पर शिक्षा क्या है? क्या केवल विज्ञान या अर्थशास्त्र का ज्ञान या केवल गणित का ज्ञान? नहीं, शिक्षा का मतलब केवल एक विषय या धारा नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण शिक्षा का दायरा इससे बहुत बड़ा है। घर पर जो संस्कार माता पिता से मिलते हैं वो भी शिक्षा का एक अभिन्न और बहुत ज़रूरी अंग हैं। समाज में आदमी जो भी सीखता है, वो भी शिक्षा ही तो है। पर आजकल के माहौल में शिक्षा के मायने कुछ बदलते से मालूम पड़ रहे हैं क्योंकि शायद आधुनिक मानव की प्राथमिकतायें बदल रही हैं या गयी हैं, समाज की तस्वीर बदल रही है, राष्ट्रों के बीच पासपोर्ट और राष्ट्रीयता रूपी दीवार खिंच चुकी है, लोग विभिन्न सम्प्रदायों में बंटे हुये हैं, और रोजगारपूरकता शिक्षा की मान्यता, यहां तक कि उसके अस्तित्व की एक कसौटी बन गयी है। । इन्हीं कुछ तथ्यों और सवालों से उपजा है इस आठवीं अनुगूंज का विषय।

दोस्तों, इस अनुगूंज का विषय है ‘शिक्षा: आज के परिपेक्ष्य में‘। इसके माध्यम हम आपके विचार जानना चाहेंगे, आपके सुझावों को समझना चाहेंगे । हम सब एक विकसित या विकासशील समाज के अंग हैं इसलिये इस संवेदनशील मुद्दे पर शायद आज सबकी जागरूकता और भागीदारी आवश्यक है। तो उठाइये अपनी कम्प्यूटर- कुंजीपटल रूपी आधुनिक कलम और लिख भेजिये अपने विचार।

मित्रों, २५ (पच्चीस) मार्च तक अपनी प्रविष्टियाँ भेजिये ब्लाग पर व अनुगूँज का लोगो चिपकाना न भूलें। अनुगूँज के नियम यहाँ देखें।‍ अपनी प्रविष्टि भेजने के बाद या मुझे प्रविष्टि के लिंक के साथ ईमेल करें या अक्षरग्राम पर टिप्पणी के द्वारा सूचित करें।

आशीष

11 Responses to “आठवीं अनुगूंज का निमंत्रण”

  1. मेरी प्रविष्टि की कङी भेज रहा हूँ । http://prempiyushhindi.blogspot.com/2005/03/8.html

  2. जियो प्रेम बाबू। आप की प्रविष्टि एक नया रिकार्ड बना रही है। मुबारक हो।

  3. मुझे विषय समझ नही आया.
    आज के किस परिपेक्ष्य में शिक्षा पर बात करना है?
    आर्थिक-सामाजिक? किस दृष्टीकोण से? शिक्षा पर समाज का प्रभाव या समाज पर शिक्षा का?
    या क्या प्रभाव हुआ उस पर या क्या होना चाहिए उस पर. भई निबंध लिखना है किताब नही!
    जरा साफ़ कर दो भाई! वैसे उस पर भी सटीक बात ही कह पाउंगा शक ही है - कठिन विषय है.

  4. स्वामी जी, आपकी असुविधा के लिये खेद है। आपको लिखना है शिक्षा का आज के परिपेक्ष्य में उद्देश्य क्या है और क्या होना चाहिये। यदि आपको कोई विसंगतियां नज़र आती हैं उनका उल्लेख कीजिये। आप सामाजिक या आर्थिक कोई भी् दॄष्टिकोण चुन सकते हैं जो आपको उचित लगे। पर इतना ध्यान रहे कि हमारा सम्बन्ध भारत में दी जा रही शिक्षा और शिक्षा प्रणाली से है।

    कोई और समस्या हो तो कृपया उल्लेख करें।

  5. आशीष भाई,

    मेरी प्रविष्टी इस बार हिंदिनी के कूटनीतिक घृष्ट कथन सी हो गई सो वहीं चेप दी-
    कडी प्रस्तुत है

  6. भाई साहब, आपने तो धमाकेदार लिखा है, मज़ा आ गया पढ़ के । एक दम भाव की प्राकृतिकता से परिपूर्ण है।

  7. मेरा लेख यहाँ देखिये http://abhivyakti.blogspot.com/2005/03/blog-post_24.html

  8. और मेरी प्रविष्टि यहाँ पर

    http://hindi.pnarula.com/haanbhai/archives/2005/03/24/शिक्षा

  9. लो भाई आशीष,हमारी भी कापी जमा कर लो.http://fursatiya.blogspot.com/2005/03/blog-post_23.html#comments

  10. आशीष भइया, हम भी आ गया हूँ, अबहि ट्रेन प्लेटफार्म नाही छोड़ी है, इसलिये हमरी सीट भी बुक किया जाय, ऊ का कहते है, देर आये दुरस्त आये.
    हमरी प्रविष्टि इहाँ देखी जाय.

    http://www.jitu.info/merapanna/?p=291,

  11. आशीष भइया, हम भी आ गया हूँ, अबहि ट्रेन प्लेटफार्म नाही छोड़ी है, इसलिये हमरी सीट भी बुक किया जाय, ऊ का कहते है, देर आये दुरस्त आये.
    हमरी प्रविष्टि इहाँ देखी जाय.

    http://www.jitu.info/merapanna/?p=291

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