हाय मैं रह गया कुंवारा..
Posted on मार्च 27th, 2005 द्वारा पंकज
अक्षरग्राम पर समय समय पर छड़ेपन पर चर्चा होती रहती है। शादीशुदा लोगों के छड़ेपन के बारे में भी कभी कभी सुनने को मिल जाता है। इसी श्रृंखला में एक नया रत्न है महावीर शर्मा जी कि कुँवारा, पढ़िए व रस लीजिए। सुरेन्द्र शर्मा जी की तर्ज पर चार लाईनें महावीर शर्मा जी कि कविता से
यदि कमरे में जा कर देखो तो , भेद पता चल जायेगा
झाङू कोने में सिसक रही , कूङे का शासन पायेगा
जा के रसोई में देखो सच चूहे दण्ड पेलते हैं
बर्तन आपस में मिल कर के, बस आंख मिचौनी खेलते हैं
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




पंकज भाई
सराहना के लिये धन्यवाद! आप पहले भी मुझे याद करते रहे हैं- उसके लिये भी धन्यवाद। हाँ, पहले अपना चिट्ठा अंग्रेजी में था पर हिन्दी के ब्लाग का नाम अंग्रेजी के अक्षरों में देख कर स्वयं को ही अजीब
सा लगा। आप महावीर का झंडा हिन्दी में ही है। पंकज भाई, आपके चिट्ठे की सूची में महावीर का नाम लगता है सफ़ेद स्याही से लिख गया है जो दिखाई नहीं दे रहा। भई, हमारे नाम पर भी नीली स्याही पोत दें तो दिखाई देने लगेगा।
सधन्यवाद
महावीर