हाय मैं रह गया कुंवारा..

अक्षरग्राम पर समय समय पर छड़ेपन पर चर्चा होती रहती है। शादीशुदा लोगों के छड़ेपन के बारे में भी कभी कभी सुनने को मिल जाता है। इसी श्रृंखला में एक नया रत्न है महावीर शर्मा जी कि कुँवारा, पढ़िए व रस लीजिए। सुरेन्द्र शर्मा जी की तर्ज पर चार लाईनें महावीर शर्मा जी कि कविता से

यदि कमरे में जा कर देखो तो , भेद पता चल जायेगा
झाङू कोने में सिसक रही , कूङे का शासन पायेगा
जा के रसोई में देखो सच चूहे दण्ड पेलते हैं
बर्तन आपस में मिल कर के, बस आंख मिचौनी खेलते हैं

One Response to “हाय मैं रह गया कुंवारा..”

  1. पंकज भाई
    सराहना के लिये धन्यवाद! आप पहले भी मुझे याद करते रहे हैं- उसके लिये भी धन्यवाद। हाँ, पहले अपना चिट्ठा अंग्रेजी में था पर हिन्दी के ब्लाग का नाम अंग्रेजी के अक्षरों में देख कर स्वयं को ही अजीब
    सा लगा। आप महावीर का झंडा हिन्दी में ही है। पंकज भाई, आपके चिट्ठे की सूची में महावीर का नाम लगता है सफ़ेद स्याही से लिख गया है जो दिखाई नहीं दे रहा। भई, हमारे नाम पर भी नीली स्याही पोत दें तो दिखाई देने लगेगा।
    सधन्यवाद
    महावीर

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