नवीं अनुगूँज का एकीकृत अवलोकन ( विषय : आशा ही जीवन है )
पहले कभी किसी मंच पर जाकर कुछ बोलना पडता था तो मैं गान्धी जी को याद कर लिया करता था । मैं मन ही मन लंगोटी पहने गन्धी जी को इंग्लैन्ड में गोल मेज सम्मेलन में दुर्दान्त साम्राज्यवादियों से लोहा लेते हुए देखता था और सारा डर फुर्र हो जाता था । आजकल राबडी और सोनिया को बडी-बडी सभाओं मे ” इ लोग हमरा सरकार के पीछे पडा है ” और ” राजनीति को रज-नीति ” कहते हुए कल्पना करना ही मेरा अभय-मंत्र है । इसी मंत्र के बल पर मै अवसर मिलते ही नवीं अनुगूँज का अयोजन करने के लिये आ खडा हुआ ।
फिर विषय सुझाने की बारी थी । बहुत से विषयों मे से ” आशा ही जीवन है ” पर जाकर बात पक्की हुई । मेरी इच्छा थी कि विषय ऐसा हो जिस पर मतैक्य की संभावना कम हो , लेकिन फिर भी चर्चा सार्थक सिद्ध हो । और आज मै कह सकता हूँ कि लगभग ऐसा ही हुआ है ।
इधर विषय की घोषणा हुई और उधर प्रेम जी की लेखनी ने तीव्र गति से चलना आरंभ कर दिया । नतीजा और क्या हो सकता था , इस बार भी प्रेम जी ने ही बाजी मारी । आशा की उपमा “तरूणी” से और निराशा की “बिन बुलायी भूतनी” से करके उन्होने “यथा नाम तथा उपमा” नामक एक नये सिद्धान्त को जन्म दिया है ।
एक औसत मनुष्य के लिए आशा अगर एक तरूणी है तो निराशा बिन बुलाई भुतनी । पर अजीब सी स्थिति होती है जब तरूणी का संग छुङाकर अचानक यह भुतनी लिपटकर शोकसागर में तैरती रहती है । निराशा अगर अधम है तो, आशा उत्तम। अगर निष्काम कर्म कर सकें तो इन दोनों से मुक्ति मिल जाएगी । मगर आशारूपी तरूणी की चाह को कोई भला छोङ पाया है क्या । क्या देवों ने भी समुद्रमंथन के दौरान अमृत की आशा नहीं की होगी ।
निम्नलिखित पक्तियों में प्रेम जी ने आशावादी व्यक्ति के मनोजगत का कैसा सुन्दर चित्रण किया है :
स्वपनद्रष्टा पुरूषार्थी भी आशान्वित होता है , उद्देश्य के प्रति । ऐसा नहीं कि उद्देश्य प्राप्ति की आशा और आनंद ही उसका ध्येय होता है । एक आशा की प्राप्ति या अप्राप्ति किसी दुसरे लघुतर या वृहत्तर किसी आशा का द्वार फिर खोलती है । असफलताओं के अंधकार में भी आशा के किसी दरवाजे को वह टटोलता रहता है । उसका विश्वास होता है कि ईश्वर सभी दरवाजे कभी नहीं बंद करता है । ऐसे व्यक्ति ही दूसरों के लिए आशा के किरण बनते हैं । आशा का एक दीपक दुसरे दीपों को भी प्रज्वलित करने में समर्थ होता है ।
आशा का सूचकांक अभी थोडा ही उपर गया था कि भिया कालीचरण ने उसे धराशायी कर दिया । भिया बुरा मत मानना , आप का नाम कालीचरण के बजाय “कलीचरण” ( कली को ही चर जाना ) होना चाहिये था । लेकिन अगर गंभीरता से विचार करें तो कुल मिलाकर यही कहना पडेगा कि भिया देश की वर्तमान दशा से बहुत व्यथित हैं ।
क्या है की परचा तो छाप दुँ की कैसे विषमतियों मे सन्घर्ध करें, आशावादी रहें पर दिल है की मानता नही देश का भविष्य काफी अन्घकारमय ही दिख रहा है ऍडस फैल रहा है आबादी दनादन बङे जा रही है सामाजिक चेतना जैसी कुछ चीज मैने भारतवर्ष में देखी नही अराजकता हर तरफ व्यापत है धर्म कर्म के नाम पर आशावादी बन जाऊँ पर अल्लाह और भगवान ने अमेरीका में तो दोसती कर ली किन्तु भारत में तकरार चालु है ऍक बार वो सुलह कर लें तो उनके नाम पर आशावादी हो जाऊँगा तब तक आशावाद पर ताला लगा कर चुपचाप विदेश में बैठा हुँ
भिया कालीचरण ! व्यथित होना किसी समस्या के हल की दिशा मे पहला चरण है , हल की आशा करना दूसरा चरण और प्रयास करना तीसरा चरण है । इसलिये ताला खोलिये , आशावाद को स्वतंत्र विचरण करने दीजिये ।
थमते थमते थमेंगे ये आंसू
रोना है ये , कोइ हँसना नही है ।
रवि भाई की प्रविष्टि जब मिली तो मैने सोचा कि कोई गद्य मे लिखता है , कोई पद्य मे अपनी बात कहता है , कोई व्यंग करता है ; रवि भाई ने कहानी से अपनी बात रखी है । किन्तु कहनी के अंत मे जाकर तो मै दंग रह गया । यह तो उनकी आत्म कथा है । उन्होने तो आशा को जीवन का रूप धारण करते हुऎ स्वयं देखा है ।
मरीज के पास दिन गिनने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. दिन – ब – दिन उसकी स्थिति खराब हो रही थी, और तब जब उसे महसूस हो रहा था कि मौत नित्य प्रति, आहिस्ता – आहिस्ता उसके करीब आ रही है. रोज रात्रि को वह सोचता सुबह होगी या नहीं और सुबह सोचता कि दिन कैसे शीघ्र बीते.
पर, मरीज ने आशा नहीं छोड़ी. जीवन के प्रति अपनी आशा को उसने बरकरार रखा. स्टीफ़न हॉकिंस जैसे उदाहरण उसके सामने थे. इस बीच मरीज ने मुम्बई, पुट्टपर्ती इत्यादि के कई उच्च सुविधायुक्त हृदयरोग संस्थानों की दौड़ लगाई. किसी ने सलाह दी कि वेल्लोर का हृदयरोग संस्थान भी अच्छा है – वहाँ दिखाओ. मरीज वहाँ दिखाने तो नहीं गया, हाँ, अपनी रपट की एक प्रति उसने वेल्लोर के हृदयरोग संस्थान में भेज दी.
कहाँ हैं निराश लोग ? इस सत्य कथा पर क्या कहेंगे ? है कोई जवाब ?
ऑपरेशन के पश्चात् एक दिन मरीज की हालत बहुत नाज़ुक थी. उसका हृदय धड़कने के बजाए सिर्फ वाइब्रेट कर रहा था, वह भी 200-300 प्रतिमिनट. दवाइयाँ भी असर नहीं कर रही थीं. बात डॉ. चेरियन तक पहुँचाई गई.
डॉ. चेरियन तत्काल मरीज के पास पहुँचे. मरीज से डॉ. चेरियन ने पूछा – “हाऊ आर यू?” मरीज के तमाम शरीर पर आधुनिक मशीनों, मॉनीटरों और दवाइयों-सीरमों के तार और इंजेक्शनों के पाइप लगे हुए थे. “वेरी बैड” - मरीज ने ऑक्सीजन मॉस्क के भीतर से अपनी टूटती साँसों के बीच, इशारों में कहा.
डॉ. चेरियन ने मरीज के पैरों को ओढ़ाई गई चादर एक तरफ खींच फेंकी और मरीज के पैरों को अपने हाथों में लेकर सहलाया. मानों वे मरीज में जीवनी शक्ति भर रहे हों, उसमें जीवन के लिए एक नई आशा का संचार पैदा कर रहे हों. चेन्नई के माने हुए हृदय शल्य चिकित्सक, पद्मश्री डॉ. के. एम. चेरियन की यह एक और नायाब चिकित्सा थी.
दूसरे दिन से ही मरीज में चमत्कारी सुधार आया. दसवें दिन उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई.
शल्य चिकित्सा के दस साल बाद आज भी उस मरीज की जीवन के प्रति आशा भरपूर है. उसे पता है कि आशा में ही जीवन है.
भाई मै तो यही प्रार्थना करूँगा कि रवि भाई जैसे कर्मवीर को दुनिया भर के प्रमादियों की उमर लग जाये ।
इसके बाद स्वामी के “पेल” की बारी थी । आशा के सूचकांक को पेल के इन्होने जमीन मे अन्दर तक घुसा दिया । नवागंतुकों की जानकारी के लिये बता दूँ कि साहित्य की तमाम विधाओं मे “पेल” एक नयी विधा है जो हिन्दी के लिये स्वामी की मौलिक देन है । ” हग” नामक एक अत्यन्त उपयोगी हिन्दी एडिटर के ये जनक हैं । इसके अलावा स्वामी जी वक्रोक्ति मे भी सिद्धहस्त हैं । आते ही उन्होने आशा को ही जीवन मानने वालों को “भाषा में कमजोर” और “विचारों मे अस्पष्ट” होने की पटकनिया दे मारी :
भाषा पर पकड कमजोर हो तो विचार भी अस्पष्ट रहते हैं, और अगर विचार अस्पष्ट हो तो सही शब्दों का चुनाव नही होता; औरों के समक्ष ही नही, पर मन मे भी - ये दोनो ही बातें सही हैं.
इसके दो कदम आगे जाकर पेलवान ने अपने “पेल” मे आशा और अपेक्षा को दो अलग-अलग भाव बताते हुए अपेक्षा को आशा की अपेक्षा अधिक वाँछ्नीय बताया :
आशा और अपेक्षा ऐसे दो भाव हैं, जब निर्धारण अस्पष्ट हो, और अपेक्षा, अराजकतापूर्ण तरीके से आशा के स्थान पर अतिक्रमण कर पडे - बवाल का मसाला तैयार समझो.
बाद मे पेलवान ने “अपेक्षा” की स्तुति मे बहुत से उदाहरण पेले पर तरूण भाई को ये बात कुछ इस तरह समझ मे आयी :
आशा को अपेक्षा का जामा पहना के सही पेला है गुरू जी…..
और इसके बाद तो मानो वे “डायरेक्ट ऐक्शन” पर ही आमदा हो गये । साफ़-साफ़ बोल दिया :
“आशा ही जीवन है” - मैं नही मानता ! “प्रपंच ही जीवन है” ये मानता हूं - परिस्थितियों पर बेहतर नियंत्रण पाने का और बुरे समय के लिए तैयार रहने का प्रपंच - ताकी आशा ना हो विश्वास हो - जहां जहां आशा की फ़सल खडी हो प्रपंच की फ़ेक्ट्री डाल के पहले अपेक्षा और फ़िर विश्वास में परिवर्तित करो ! उर्जा ही जीवन है ! उद्यम ही जीवन है जीवटता है जीवन !
अब समझ मे आया कि स्वामी जी कर्म-मार्गी हैं , अन्य मार्गों में उनकी कोई रुचि नही है । सबको छोडकर पेलवान अब महात्मा बुद्ध से जा भिडे । वहाँ भी उन्होने देसी लोगों को उनके पद-चिन्हों पर चलने के कारण खूब लथाडा :
बुद्ध नें कहा था अपेक्षा ही सारे दुखों की जड है - अपेक्षा मत कर! हो गया सत्यानाश!!
वो तो नसीब, बुद्ध ने ये नही कहा था की आशा मत कर - वो क्या था, बुद्ध को दु:ख से एलर्जी थी - बचपन में एक शवयात्रा देखी और दुखी हो गए, सालों प्रपंच कर के बुद्धत्व को प्राप्त हुए और फ़िर सारे संसार का दु:ख दूर करने की ट्राई मारने लगे - वापस आ कर बोले अपेक्षा नहीं करने का! भारतवासी तभी से कोई अपेक्षा नही करते - बस आशा करते हैं.
प्रवचन के अन्त मे स्वामी जी धर्म ( कर्तव्य / ड्यूटी ) पर आ गये और आपना प्रवचन समाप्त किया । इसके बाद श्रोताओं ने अपने
उद्गार व्यक्त किये । ” स्वामी जी की — जय ! ” ( तीन बार )
इसी क्रम में आये तरूण भाई संक्षेप मे अपनी बात रखते हुए कुछ व्यंग-वाण यों छोड गये :
आशा ही जीवन है, इसी सोच के साथ रोज एक नई पार्टी का जन्म होता है। नेता दल बदलते रहते हैं कि शायद किसी पार्टी से तो टिकिट मिलेगा, कोई पार्टी तो बहुमत मे आयेगी, कोई तो मंत्री बनायेगा। इसी आशा की चाह में अपने प्रधानमंत्री एक बहुत ही करारी हार के साक्षी बने, क्रिकेट के मैदान में, देश की राजधानी में, प्रतिद्वंदी टीम के राष्ट्रपति के सामने। यही आशा तो है जो लाखों लोगों को अपना काम छोड़ के टीवी के आगे बैठने में मजबूर करती है कि कभी तो शायद अपने भी महारथी कुछ कर दिखायेंगे।
शायद इसी आशा के दम पर कुछ लोग विलुप्त होती अपनी राष्ट्र भाषा को जिंदा रखे हुए है। और ये आशा ही है जो शायद आदमी को नपुंसक बनाती है, क्योंकि ‘आशा ही जीवन’ की माला जपते हुए वो हाथ मे हाथ रख कर बैठा रहता है।
आशा की इज्जत लुटते देख मुझसे रहा नही जा रहा था । अब बारी हमारी थी । मैने सबके पत्ते देख लिये थे । इसलिये आसानी से समझ मे आ गया कि कौन सा पत्ता चलना चाहिये । सो ये कह दिया कि आशा के बिना उद्यम कैसे संभव है ? और सारे उद्यमों के बावजूद भी अभीष्ट फल मे अनिश्चितता बनी रहती है ; इसलिये कर्म के पहले आशा रखो , कर्म के दौरान आशा रखो और कर्म के बाद भी आशा रखो कि अभीष्ट ही होगा :
आशा का दूसरा पहलू भी है । बहुत से लोगों का मानना है कि आशामय दृष्टिकोण हमारी क्षमता और दक्षता को बढाता है । इससे सफलता और पास आ जाती है । इसके विपरीत निराशाग्रस्त व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक क्षमता घटती जाती है और सफलता उससे दूर भागती जाती है ।
एक और प्रकार की आशा है जिसे मैं संस्कृत के महान कवि भवभूति का आशावाद कहूंगा । इनका मानना है कि कोई भी प्रयास निरर्थक नही जाता । ” आपका कोई न कोई समान-धर्मा अवश्य उत्पन्न होगा क्योंकि समय का कोई अन्त नही है और पृथ्वी बहुत बडी है । ”
विजय ठाकुर जी अपनी बात कविता के माध्यम से कह गये और इसके उपर एक छबि ( फोटो ) जोड दिया जो हजारों शब्दो से भी भारी पड रहा है । उनकी पूरी कविता उद्धृत है :
हर शाम खोलकर
गठरी
दर्द की अपनी
निकालती
यह रुग्ण
जर्जर काया
मौसम की मार
बलात्कार
और सारे
अत्याचार
कितनी सारी
खाद्य सामग्री
कुछ खा पीकर
सो रहती है
गठरी बाँध
फिर से
बचा-खुचा
कल के खाने की।
देखती है स्वप्न
क़िस्मत बदल
जाने की।
और रिसते
रहते हैं
स्वप्न उसके
रात भर
शीत बनकर।।
आशा ही जीवन है
पर किसकी आशा ?
सबको पता है कि जीतू भाई आजकल बहुत व्यस्त चल रहे हैं । पर कौन सोच सकता है कि उनकी प्रविष्ट चूक जायेगी ? इच्छा ही बहुत बडी शक्ति है । देखिये जितेन्द्र भाई के आशावाद का सूत्र-वाक्य क्या है :
हर रात की सुबह होती है, और हर परेशानी के बाद सफलता का उजाला होता है.
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की ये कविता उद्धृत करके हमारे बाल्यकाल की स्मृतियों को ताजा कर गये । जरा देखिये गुप्त जी ने कैसे निराशा छोडकर , “कुछ काम करने” , “सुयोग (opportunity) का सदुपयोग करने” और “अपना पथ स्वयं प्रशस्त करने” की सलाह दी है :
नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो ।
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो ।
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को ।।संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना ।
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को ।।
और अंत मे कह गये :
एक बार फिर मै यही कहना चाहूँगा कि निराशा के सागर मे उतरने से कुछ हासिल नही होता ; हिम्मते मर्दां , मदद ए खुदा .
पिछली अनुगूँज का आयोजन करके आशीष जी कुछ थका-थका सा अनुभव कर रहे होंगे । फिर भी अपनी एक छोटी प्रविष्टि के साथ इस आयोजन मे पहुँच ही गये । कुछ कटाक्ष ( कनखी ) मारते हुए कहते है कि सच में आशा हर मायने में जीवन है, कुछ को जीवन देती है और कुछ के साथ जीवन भर रहती है बिना कुछ दिये ।
आशा पे ही तो ये देश चल रहा है, ये सबके लिये जीवन है। राजनीतिकों के लिये इस संदर्भ में कि कब वो लोकसभा और विधानसभा के लिये चुने जायें और कब जनता के पैसे को लूटें। नौकरशाहों के लिये भी कुछ ऐसा ही है। उच्च, उच्च-मध्यम और मध्यम वर्गीय बच्चों के लिये कि कब पढ़लिख कर विदेश जायें, यही आशा है। माता-पिता के लिये ये आशा है कि कब बच्चा बड़ा हो और उनके लिये एक गोरी से बहू लाये और साथ में खूब सारा माल। और अनेकोनेक उदाहरण हैं आशा के। और ये आशायें पूरी हो जाती हैं और लोग अपना जीवन सार्थक समझते हैं।
केवल कुछ आशायें बिखर जाती है और जीवन पर्यंत आशा ही रह जाती हैं: जैसे कि किसान द्वारा जीवन में सुधार की आशा, जमादारा द्वारा इसकी आशा कि कब उसे लोग छूने से न मुंह फेरें, मजदूरों द्वारा अच्छे जीवन की आशा इत्यादि।
आशा के बारे मे प्रतीक जी की दृष्टि बिल्कुल अलग है । वे आशा को बंधन का कारण मानते है ।
आशा बन्धन का कारण है। आशा सापेक्षिकता पैदा करती है, दृष्टिकोण की सापेक्षिकता – और फिर वही दिखता है जो तुम देखना चाहते हो। निरपेक्ष सत्य आंखों से ओझल हो जाता है। जो हमारी आशा है, कामना है, तृष्णा है; उसी के अनुरूप हम सारा संसार अपने चारों ओर गढ़ते हैं। और इस तरह आशा द्वन्द्व पैदा करती है, संघर्ष उत्पन्न करती है।
वे आशा को ही दुख का कारण भी मानते हैं ।
आशा दु:ख की जननी है। जो व्यक्ति कुछ प्राप्त करने की आशा रखता है, प्रतिदान चाहता है; वह हमेशा दु:खी रहेगा। वह कष्ट भोगने के लिए बाध्य है। आदमी अपनी पत्नी से इस आशा में प्यार करता है कि बदले में वह भी प्यार पाएगा, और जब उसे प्यार नहीं मिलता या कहें कि वैसा प्यार नहीं मिलता जैसी उसने आशा की थी, जैसी उसने कल्पना की थी; तो वह कष्ट का अनुभव करता है।
अगर दु:ख से, कष्ट से, निराशा से छुटकारा पाना है; तो आशा की ज़ंजीरों से भी छुटकारा पाना पड़ेगा। क्योंकि निराशा और आशा दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक को पकड़कर दूसरे से छूटना नामुमकिन है।
इसके बाद प्रतीक जी कहते हैं कि जीवन का वास्तविक आनंद आशा-मुक्त ( निराश नहीं ) होकर ही लिया जा सकता है :
द़रअसल जीवन के आनन्द का उपभोग वही कर सकता है, जो आशा-मुक्त हो। बच्चों के साथ वही खेल सकता है, बारिश में वही भीग सकता है, उल्लास से भरकर वही नाच सकता है और दिल खोलकर गाने का आनन्द वही उठा सकता है; जिसने बदले में कुछ न चाहा हो, जिसने प्रतिदान न चाहा हो, जिसने कोई आशा न की हो। दुनिया में जो भी सर्वश्रेष्ठ है, वह आशा-विहीन अवस्था से उत्पन्न होता है।
और अंत में उनका निष्कर्ष है कि ”आशा ही जीवन है” और आशा ही मृत्यु भी है |
रमण जी सचमुच अपने नाम को चरितार्थ करते हैं । हर जगह “रमते” रहते है - “हिन्दी-फ़ोरमों” में , “सर्वज्ञ” पर और “इधर-उधर” भी । रमते-रमते अनुगूँज मे भी समय से पहुच गये । उनके पहुचते ही अनुगूँज का सारा वातावरण ही आशामय हो गया :
मैं एक इनक्युअरेब्ल ऑपटिमिस्ट हूँ, यानी लाइलाज आशावादी। मैं इस बात में सौ प्रतिशत विश्वास करता हूँ कि आशा ही जीवन है। ज़िन्दगी में कुछ भी गुज़र जाए, मैं हमेशा यही मानता हूँ कि शायद इस से बुरा भी हो सकता था, और जो मेरे साथ हो रहा है, हज़ारों-लाखों लोगों के साथ रोज़ इस से बुरा होता है। इसीलिए मुझे “संघर्ष से सफलता” की कहानियाँ बहुत प्रेरित करती हैं। चाहे वह अन्धी-बहरी हेलेन केलर की कहानी हो, या पैरा-ओलंपिक्स में भाग लेने वाले किसी अपंग खिलाड़ी की। आशा ही तो है जिस के बल पर लोग जीते हैं, आशा के बिना क्या जीना।
फ़िर रमण भाई ने बताया कि उनका आशावाद किन स्तंभो पर खडा है : प्रथम यह कि कुछ गिने-चुने लोग है जो इस दुनिया को अपने कंधे पर चलाते है और द्वितीय यह कि शायद इस से बुरा भी हो सकता था :
एइन रैंड मेरी मनपसन्द लेखिका हैं, और उन के उपन्यास फाउन्टेनहैड और ऍटलस श्रग्ड मेरे मनपसन्द उपन्यासों में से हैं। ऍटलस श्रग्ड ऐसे कुछ गिने चुने लोगों की कहानी है जो दुनिया को अपने कन्धे पर चलाते हैं, यानी जब सारी दुनिया के लोग नोच नोच कर खा रहे होते हैं तो कुछ गिने चुने लोग तब भी काम कर रहे होते हैं, ईमानदारी से, लगन से, बिना बाकी लोगों की परवा किए हुए। मेरा यह मानना है कि बिहार को, भारत को, दुनिया को, यही गिने चुने लोग चलाते हैं। यह मेरे आशावाद का हिस्सा है।”
दो दोस्त थे, एक आशावादी और एक निराशावादी। सैर को निकलने की बात हो रही थी तो निराशावादी डर रहा था कि अभी अभी नहा के निकला हूँ कोई पक्षी बीट न कर दे। आशावादी ने कहा, इतना बड़ा आस्मान है, इतनी बड़ी ज़मीन है, तुम्हें यह क्यों लग रहा है कि बीट तुम्हारे ही ऊपर गिरेगी। निराशावादी मान गया, पर उसका ड़र सही निकला। निकलते ही एक पक्षी ने उस के सारे कपड़े गन्दे कर दिए। उस ने अपने दोस्त से कहा, “अब खोजो इस में आशा की किरण”। आशावादी बोला, “भैया, भगवान का शुक्र करो कि हाथियों के पंख नहीं होते।”
और जाते-जाते बता गये कि आशा जी तो उनकी जीवन संगिनी हैं :
चलते चलते यह बता दूँ कि मेरे लिए आशा के बिना बिल्कुल जीवन नहीं है, चाहे लड़े, चाहे मरें, आशा के साथ अग्नि के सात फेरे जो लिए हैं।
तब तो “आशा”वादी होने के सिवा आपके पास कोई चारा भी नही है ।
आज के आपाधापी के युग में भी “फ़ुरसतिया” के पास भी फ़ुरसत की कमी आ जायेगी , मैं नही मान सकता । उनकी प्रविष्टि सबसे अंत मे मिली , इस लिहाज से वे अनूप हैं । और भी कई तरह से अनूप जी बिल्कुल अनूप हैं । ( बेनजीर नही कहुँगा , ” पुरुष = स्त्री ” का चक्कर आ जायेगा । ) उनके लेखों का भारी भरकम आकार अनुपम है , उनकी हास्य-विनोद से ओत-प्रोत शैली अनुपम है , और उनके विचारों की गहराई तो अनुपम है ही । शुरू में वे आशावाद और और निराशावाद के वैचारिक क्रिकेट में वे अम्पायरी करते हुए दीखे :
यह सच है कि आशा का जीवन में बहुत बड़ा योगदान होता है. पर आशा ही जीवन है कहना जीवन के बाकी तत्वों की उपेक्षा करना है. जीवन का तो ऐसा है कि जो भी चीज जरूरी दिखी उसी को कह दिया कि वही जीवन है. जल की कमी हो रही है तो जल बचत करने वाले जलपरियोजना से जुड़े लोग कहते हैं जल ही जीवन है. जो लोग देशप्रेम का झंडा ऊंचा किये रहते हैं जो लोग देश को प्यार नहीं करते वे मरे के समान हैं मतलब देश प्रेम ही जीवन है. लब्बो-लुआब यह कि जिस किसी को भी महत्वपूर्ण बताना हुआ तो कह दिया कि वही जीवन है.
…तो महाराज पहले तो मेरा यह बयान नोट किया जाये कि आशा ही जीवन है यह बात पूरी तरह सच नहीं है. जीवन में आशा के अलावा भी बहुत कुछ होता है.
लेकिन इसके उत्तरवर्ती बयान मे अनूप जी मिस आशा के रूप-सौन्दर्य-लवणता-रमणीयता का ही बखान करते रहे और उनके चरण पखारते रहे :
आशा स्त्रीलिंग है.खूबसूरत है.आकर्षक है.बिना किसी उम्र-लिंग के भेदभाव के सबकी चहेती है.जीवन को अगर संसद कहा जाये तो आशा मंत्रिमंडल है.जीवन अगर कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है तो आशा वह शेयरधारक है जिसके पास इस कंपनी के सबसे ज्यादा शेयर हैं.जीवन अगर कोई गाड़ी है तो आशा उसकी ड्राईवर.जीवन अगर कोई इंजन है तो आशा उसका ईंधन.
आशा का स्थान बहुत जरूरी है जीवन में. बहुत कुछ होता है जीवन में जब मनचाहा नहीं होता. निराशा होती है.ऐसे समय में आशा एक संजीवनी होती है जिससे जीवन फिर उठ खड़ा होता है.आशा वह बतासा है जो जीवन के मुंह में घुल कर कड़वाहट दूर करता है.मिठाई में केवड़े की सुगन्ध की तरह है आशा की महक .
हमेशा से दुनिया में निराश होने का फैशन रहा है.आप देखिये अगर तो बहुतायत निराश लोगों की है.ये बहुसंख्यक निराश लोग भी अपने आसपास किसी आशा के दीप को जलते देखते हैं तो इनकी भी आंखें रोशनी की मीनार हो जाती हैं.आशा यह तेवर देती है कि हम किसी असफलता से सामना होने पर कह सकें:-
पराजित हैं हम किंतु सदा के लिये नहीं
कल हम फिर उठेंगे अधिक शक्तिऔर विवेक के साथ !
आशा हमें यह खिलंदड़ा उत्साह देती है जो पराजयों के इतिहास को भी अनदेखा करके कह सकें:-
अन्य होंगे चरण हारे,
और हैं जो लौटते , दे शूल को संकल्प सारे.
हमारे एक कर्मचारी थे-वजीर अंजुम.वे डायबिटीज से पीड़ित थे.तमाम मध्यवर्गीय बीमारियां उनकी मेहमाननवाजी करतीं थीं. पर वे जब तरन्नुम में गाते :-
हादसे राह भूल जायेंगे, कोई मेरे साथ चले तो सही.
तो लगता कि तमाम अंधेरे में रोशनी की मीनार जल रही हो. वे आज नहीं हैं पर यह गीत उस मंत्र की तरह कानों में गूंजता है जिसको सुनते निराशा के भूत सर पर पैर रखकर नौ दो ग्यारह हो लेते हैं.
बहुत सारे उदाहरण मिल जायेंगे जो आशा का झंडा फहराते हैं. तमाम सूत्र वाक्य मिल जायेंगे पर एक दिन मैंने किसी बोर्ड पर लिखा देखा- सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है. इससे बेहतर आशा का मंत्र मुझे नहीं मिला आजतक.
जीवन में हम तमाम परेशानियों से दो चार होते हैं.जिनसे हम पहले निपट चुके होते हैं उनसे निपटने के तरीके भी हमें पता होते हैं.पर जो नयी चुनौतियां आती हैं उनसे निपटने के नये तरीके भी खोजने होते हैं.पर आशा का लंगर वही होता है .यह स्थायी भाव है
अन्त में स्वामी के “प्रपंचवाद” पर खुछ और बयान देकर अनूप जी ने अपनी बात समाप्त की ।
- इति नवम अनुगूँज अवलोकनम ।
मैं अनुनाद सिंह , नवीं अनुगूँज : आशा ही जीवन है , इस आयोजन के सफलता पूर्वक सम्पन्न होने की घोषणा करता हूँ । दसवीं अनुगूँज मे अक्षरग्राम पर अगले पखवाडे फ़िर मिलेंगे ।
Filed under: अनुगूँज

अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




बधाई- आयोजन,अवलोकन के लिये.रवि रतलामी जी की बात भी शामिल कर लो जो छूट गयी अनजाने में शायद.
रवि भाई क्षमा करें । दरअसल आवें से नाद ही गायब था । भूल से उनकी प्रविष्टि को अवलोकन मे शामिल नही कर कर पाया था । हुआ ये कि मैं अक्षरग्राम पर की गयी टिप्पणियों के हिसाब से चलता चला गया , जिसमे रबि भाई ने टिप्पणी नही की थी ( लेकिन मुझे मेल जरूर भेजा था ) ।
अनुनाद भाई को अनूगूँज के सफल आयोजन के लिये बहुत बहुत बधाई.
अब अगले सूरमा मैदान सम्भालें.
अनुनाद भाई,
“यथा नाम तथा उपमा” वाली बात छेङ ही दी तो मैं भी कह दूँ कि अनुगूँज - अनुनाद दोनों जुङवे भाईयों की साथ खूब निभी । बधाई हो ।
अनुनाद भाई सचमुच बड़ी अच्छी समीक्षा है काफी मेहनत से सारी कड़ी को जोड़ा है आपने, साधुवाद।