नारद - कुछ यहाँ की कुछ वहाँ की
Posted on मई 3rd, 2005 द्वारा पंकज
मैं काफी समय से चुपके से एक छोटे से प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूँ। वैसे सही मायनों में तो केवल पहले हफ्ते में ही काम किया। उस के बाद से दैनिक नौकरी की व्यस्तता इतनी बढ़ गई है कि बीवी का कहना है कि ऑफिस में ही सो जाया करो
कोई नहीं यह तो चलता है। जिस प्रोजेक्ट की बात मैं कर रहा हूँ उसका नाम है नारद। यह है तो जीतू भाई के ब्लॉगफीडर या देबाशीष के एग्रीगेटर जैसा ही। पर मेरे ख्याल से इसका ले आउट व अपटाइम बढ़िया है। पता है
मैं इसका काफी प्रयोग कर रहा हूँ। खास कर यदि आप ने मेरा फॉयरफॉक्स का दूसरा लेख पढ़ा हो उसकी कड़ियाँ गरमागरम द्वारा आप भी प्यार का अहसास कर सकते हैं।
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




No offense but I think we are concentrating on what people call “reinventing the wheel”. I liked the Dictionary project you once mentioned that was different. When we have Blogdigger and CV I think these are all duplicating efforts. Hust my thought, it’s your choice.
देबाशीष जी
आप की बात बिल्कुल सही है। पर मेरे विचार से “Reinventing” की जगह गर “Evolution” के नजरिए से सोच कर देखें। CV का ऐग्रीगेटर मुक्त व्यक्तितव का धारक है। कभी एक दम बढ़िया चलता रहता है तो कभी रुक ही जाता है। फिर जीतू जी ने ब्लॉगफीडर लगाया। अवेलबिल्टी के हिसाब से बढ़िया है पर लेआउट के मामले में कुछ चाह रह ही जाती है। मैंने लोकली इंसटाल करके देखा पर जल्दी से इसे सुंदर बनाना कठिन लगा। एक अदद एग्रीगेटर की चाह बनी रही। इसी बीच मुझे लिलिना के बारे में पता चला तो उसे भी आजमा कर देखा। जरा यहाँ गौर कीजिए
http://dev.pnarula.com/narad/
लेआउट बहुत धाँसू था पर परफार्मेंस घटिया रही। दो तीन बग्स भी थे। फिलहाल एग्रीगेटर की खोज जारी रही। फिर मुझे वर्डप्रैस के एग्रीगेटर का पता चला और इस स्वरुप का पता चला। जो फरवरी में लगभग पूरा हो गया था। मैंने खुद दो महीने प्रयोग करने के बाद सोचा कि शायद संतजनो के काम भी आए। पर गर जनता को लगता है कि इसमें कुछ नया नहीं है। तो अपनी राय रखिए। मिटाने में कितना समय लगता है। नहीं तो ऐसे ही पढ़ा रहेगा।
Pankaj,
I don’t have any affiliation with blogdigger but I had seen that it has many advantages over other freely available systems. A common Feed, OPML list (that also powers the Blogroll code of CV, I don’t know how many people use it, but that list is “the up-to-date” list of Hindi blogs), the aggreator interface at the site itself, ability to add multiple feed URLs for the same site etc.
I agree these sites may not be there always, but can we guarantee this for our sites as well. Anyways, if removing dependency on free resources is the aim let’s decide and define a single source. I had also told Jitu bhai, have a source that can provide a groups Feed and OPML list and CV will leave blogdigger.
I also never saw any reason why we should go on changing Chhahri when it is already there. On the same line, integrating a tool or devising a plugin to type Hindi with WP (or any blogosystem for that matter) is an excellent idea. Blognaad was a unique concept. Girgit is unique too. I myself am keen on working on Hindi Speech to text convertors. In nutshell, and I am no one to lecture, still…IMHO let’s look for any novel thing “where no man has gone before”, and I am not talking about “Hindi on Mars”
Best,
Debashish
पहले तो मैं सोच रहा हूं कि एक दावा ठोंक दूं पंकज पर कि भाई ये हमारे नारदजी को हमसे पूछे बिना यहां काहे लगा लिये?अगर लगाना ही था तो पूछना चाहिये था.ये तो कहो हम बुरा नहीं माने नहीं मामला हाथ से निकल सकता था.खैर हुआ ये कि बताया हमें देबू ने पूना से भोपाल के लिये ‘बसारूढ़’ होते हुये कि नारद जी अवतार ले चुके हैं.यह भी उवाचा कि शायद वह कुछ ज्यादा लिख गये.पता नहीं लोगों को कहां -कहां से अकल मिल रही है कि लोग बाद में महसूस करने लगे कि शायद ये नहीं लिखना था.बहरहाल अब जब थके हारे संपादकाचार्य किसी बलखाती सड़क पर हिचकोले खाते हुये नींद के गोले खा रहे होंगे तो हमे यही कहना है कि पंकज का प्रयास सराहनीय है.देख लो पंकज ,तकनीकी जानकारी न होने का फायदा कि हम तुम्हारी कितनी आसानी से तारीफ कर सकते हैं.अज्ञानता का यह वरदान है.मेरे ख्याल में कोई भी काम करो .चाहे जितने लोग कर चुके हों उसे .जब आप खुद करते हैं तो कुछ न कुछ नया होता है.खुद के साथ तथा सामूहिक रूप से भी.निश्चित तौर पर पत्नी की फटकार के अलावा भी बहुत कुछ मिला होगा -कम से कम संतोष तो कहीं गया नहीं.दूसरी
बात विकल्प हमेशा बने रहने चाहिये.मामला विकल्पहीन नहीं होना चाहिये.स्वामीजी से आशा है कि वे भी पत्नी डांट-फटकार सहते हुये जल्द से जल्द आनलाईन हिंदी कमेंट की व्यवस्था करेंगे.पंकज ये जो अंतिम पैरा में लिखा है (…मिटाने में कितना समय लगेगा)अच्छा है पर थोड़ा कम शहीदाना है .जरा थोड़ा और कुर्बानी लाओ.बहरहाल नारद पर काम करने के लिये बधाई.
शुक्ला जी,
आपका नारद जब पढ़ा था तो मजा आया था पर मेरे नारद की कहानी कुछ और है। मेरे कुछ दोस्तो ने थोड़ा पहले शादी कर ली थी तो दो तीन भाभियाँ के बीच में मैं अकेला देवर फंस गया था। अब कुंवारा देवर अलग अलग घरों में टूलता रहता था। बस तभी कुछ नारद की संज्ञा मिल गई थी।
पंकज
नारद का काम ही टूलते रहना है.अच्छा है मजे किये .अब भी करो.
पंकजजी,
गजब की चीज है , कङियाँ गरमागरम । और इधर नारद की वाणी तीनों लोकों का खबर बखुबी दे रही है ।
अब ऐसा क्या संभव है कि फायरफाक्स के टैब पर ही रचना के साथ, ब्लाग का भी नाम दिख जाए ।
प्रेम जी,
कोशिश कर के तो देखा हूँ पर नाम अभी तो नहीं ला पाया। पर अब आप ने खुरक लगा ही दी है तो खुजा के ही माँनेगे।
पंकज