देवनागरी की विशिष्टता

भारतवर्ष के साहित्या में कुछ ऐसे रूप विकसित हुए हैं जो देवनागरी लिपि मे ही व्यक्त किये जा सकते हैं । उदाहरणस्वरूप केशवदास का एक नया सवैया लीजिये :

मां सम मोह सजै बन बीन, नवीन बजै सह मोस समा ।

मार लतानि बनावति सारि, रिसाति बनावति ताल रमा ॥

मानव ही हरि मोरद मोद, दमोदर मोहि रहि वनमा ।

माल बनी बल केसवदास, सदा बसकेल बनी बलमा ॥

इस सवैया के किसी भी पंक्ति को किसी ओर से भी पढिये , कोई अंतर नही पडेगा । इस प्रकार के चित्रालंकार रोमन और अन्य लिपियों मे अभिव्यक्त नही किये जा सकते ।

नागरी लिपि परिषद की मुख्पत्रिका “नागरी संगम” से साभार

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