देवनागरी की विशिष्टता
Posted on मई 12th, 2005 द्वारा अनुनाद
भारतवर्ष के साहित्या में कुछ ऐसे रूप विकसित हुए हैं जो देवनागरी लिपि मे ही व्यक्त किये जा सकते हैं । उदाहरणस्वरूप केशवदास का एक नया सवैया लीजिये :
मां सम मोह सजै बन बीन, नवीन बजै सह मोस समा ।
मार लतानि बनावति सारि, रिसाति बनावति ताल रमा ॥
मानव ही हरि मोरद मोद, दमोदर मोहि रहि वनमा ।
माल बनी बल केसवदास, सदा बसकेल बनी बलमा ॥
इस सवैया के किसी भी पंक्ति को किसी ओर से भी पढिये , कोई अंतर नही पडेगा । इस प्रकार के चित्रालंकार रोमन और अन्य लिपियों मे अभिव्यक्त नही किये जा सकते ।
नागरी लिपि परिषद की मुख्पत्रिका “नागरी संगम” से साभार
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 



