मधु किश्वर

मधु किश्वर अंग्रेज़ी में लिखने वाले भारतीय लेखक-लेखिकाओं में विशिष्ट स्थान रखती हैं, इस मामले में कि उन्हें अपनी ज़मीन, लोगों और मुद्दों की गहरी समझ है. वे आम भारतीय ज़िंदगी को, अधिकतर अंग्रेज़ी में लिखने वाले पत्रकारों-लेखकों की तरह ‘टूरिस्टी’ नज़रिये से नहीं देखतीं, बल्कि उसका हिस्सा होकर बात करती हैं. उनके लेखन में खुद जिए गए पलों की अनुभूति है और एक गहरी सोच है जो निरन्तर अपने परिवेश में हिस्सेदारी से उपजी है.

पिछले दिनों वेब पत्रिका ‘सुलेखा’ में उनका एक लेख “When Religions Claim Superiority” छपा, जो इस विषय को अनूठे और उसी विशेष नज़रिये से देखता है, जो उनकी खासियत है.

लेख के कुछ अंश हिंदी में अनुवादित कर प्रस्तुत कर रहा हूँ. अनुवाद मेरा, गलतियाँ मेरी.

“[…] आज, अधिकतर लोग दूसरों के रिवाज़ों-विश्वासों के बारे में टीवी, अखबारों, फ़िल्मों या अन्य मास-मीडिया के जरिये जानते हैं. अन्तरराष्ट्रीय मीडिया के वर्चस्वी रूपों ने एक विकृत और यूरो-केंद्रित विश्वदृष्टिकोण गहरे तौर पर पैठा दिया है. इसकी प्रवृत्ति अ-यूरोपियन लोगों की संस्कृतियों और विश्वासों को हेय या पिछड़ा समझने की रही है, मुख्यतया पुरातन-विज्ञान के विषय के रूप में, जो कि जैसे मानव जाति के विकास के निचले चरण में किसी उत्सुक खुमार की तरह लटक रहे हों. यही कारण है कि बजाय एक वृहत्तर समझ के, मुख्य मीडिया में तैरतीं अनजाने तौर-तरीकों की यह छवियाँ जब बहुत भिन्न संस्कृतियों में देखी जाती हैं तो उनकी प्रवृत्ति अभी तक भेदभाव बढ़ाने, पूर्वाग्रहों को मजबूत करने और नकारात्मक ठप्पे बनाने की ही रही है. […]”

पूरा लेख http://www.sulekha.com/printer.asp?ctid=2000&cid=306001 पर देखा जा सकता है.

मधु किश्वर का एक और लेख, जो कि मेरे पढ़े हुए लेखों में अपने विषय का सर्वश्रेष्ठ है, ‘सुलेखा’ में ही करीब दो साल पहले छपा था. विषय था - “The Dominance of Angreziyat in Our Education”. ज़रूर पढ़ें. “The new colonisers” के बारे में वे लिखती हैं (फिर से, अनुवाद मेरा, गलतियाँ मेरी):

“[…] आज के भूरे साहबों ने प्यार जताने के लिए, अपने नवजात शिशुओं से बात करने के लिए और यहाँ तक कि अपने पालतू कुत्तों को झिड़कने के लिए भी अंग्रेज़ी को अपनी भाषा बन जाने दिया है.

“पर इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने इस भाषा में इतना हुनर हासिल कर लिया है कि इसे वे ज्ञान अर्जन या संवाद के एक प्रभावी औजार के रूप में प्रयोग कर सकें. यह तो बहुत दूर की बात है. कुछ को छोड़ दें तो हमारे अंग्रेज़ी-माध्यम स्कूलों में भी अध्यापन की गुणवत्ता इतनी गई-गुजरी है कि हमारे बहुत सारे विद्यार्थी गम्भीर अंग्रेज़ी किताबें तो दूर, अखबार के लेखों का भी सही अर्थ नहीं निकाल सकते. नतीजा यह कि कुछ जिनका अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छा अधिकार है, उनसे तो किसी राज घराने जैसा, और वे जो कम जानते हैं उनसे निचले दर्जे के प्राणियों जैसा व्यवहार किया जाता है. ये अंग्रेज़ीदाँ ग़ैर-अंग्रेज़ीभाषियों के जीवन, भावनाओं, समस्याओं और सपनों से अधिकांशतः कटे हुए हैं. उनके सपने या तो विदेश में बसने की ओर केंद्रित होते हैं या अपने लिए समृद्धि के छोटे-छोटे द्वीप बनाने की तरफ़, मसलन नई दिल्ली में, जहाँ वे यह खुशफ़हमी पाल सकें कि वे न्यू यार्क में रह रहे हैं.”

 
पूरा लेख यहाँ है: http://www.sulekha.com/printer.asp?ctid=2000&cid=305813

2 Responses to “मधु किश्वर”

  1. मधु किश्वर के लेख काफी दिन बाद पढ़े.अनुवाद भी बढ़िया किया.

  2. शुक्रिया, अनूप। बढ़िया हो अगर कोई मधु जी से अनुमति लेकर पूरे-पूरे लेख हिंदी में अनुवादित कर वेब पर छाप सके।

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