११वीं अनुगूँज- माज़रा क्या है?
अनुगूँज की शुरुआत हुई थी बहुत मासूम से लगते सवाल से-क्या देह ही सब कुछ है? एक खास विषय।इसके बाद दूसरे विषयों पर बात हुई। दसवीं अनुगूँज तक आते-आते सारा मामला मुक्त हो गया। जो मन आये सो लिखो।इस मुक्त व्यवस्था को किसी साँचे में कैद करना न तो हमारे वश में है न मैं चाहता हूँ।

तो मेरा तो कहना है कि भाई लोग आपके मन में जो आये सो लिखो। ग्याहरवीं अनुगूँज का ‘लोगो’ लगाओ तथा टीप दो अपने ब्लाग में। पर कुछ विषय देना पड़ेगा ।
तो यह भी लफड़ा है। विषय भी देना पड़ेगा । तब तो गई भैंस पानी में।खैर अब जब देना है तो दिया जायेगा विषय भी।
तो सुना जाये। पूरे देश में हल्ला है कि देश को तो अब विकसित होने से कोई माई का लाल रोक ही नहीं सकता। पर हमारे बहुत से साथी कह रहे हैं कि ऐसे ही चलते रहे तो सौ साल तक विकासशील बने रहेंगे। तो आप विचार कर सकते हैं- सच क्या है। दुनिया में हल्ला है कि भारतीय मेधा का दुनिया में कोई जोड़ नहीं ।जहाँ जाते हैं झंडा गाड़ देते हैं वहीं कुछ दिलजले कहते हैं ये झंडा तो क्या गाड़ेंगे! कुलीगीरी,क्लर्की कर रहे हैं पैसे के बदले जिससे देश को कोई खास फायदा नहीं है।तो आप बतायें कि सच क्या है! कहानी घर घर में पसरी है कि भारत की महिलायें कदम से कदम मिलाकर प्रगति के पथ पर चल रहीं हैं घर से बाहर निकल रहीं है, खुद निर्णय ले रही हैं मनमाफिक न होने पर दरवाजे से बारात लौटा दे रही हैं ।दूसरी तरफ देखा जा रहा है महिलायें अभी भी दिन दहाड़े शान से सती हो रही हैं, ग्रामप्रधान भले ही कोटे के कारण बन रही हों पर निर्णय उनके लल्ला के पापा ही ले रहे हैं।तो असलियत क्या है !
चाँद पर जाने की हमारी योजनायें कागज पर आने लगीं हैं जाने का समय भी तय हो गया पर यह तय नहीं हो पाया बारिश में दो गावों के बीच बढ़ी नदी के वावजूद आना-जाना कब पक्का हो जायेगा। सूचना क्रान्ति के चलते हमें यह तो पता चल जाता है कि पोर्टलैंड में आज दाल बनी थी कि दलिया पर संवेदना में प्रगति के चलते हम यह नहीं जान पाते कि पड़ोस के रामलाल कब ,कैसे गुजर गये।
इन दो तस्वीरों के बीच बहुत भटकाव लगता है कभी। कहीं चकाचौंध रोशनी के कारण आंखें मुँद जाती हैं कहीं इतना अंधेरा कि ब्लैकहोल बनकर सारी रोशनी सोख लेता है। समझ में नहीं आता कि माज़रा क्या है ?
तो लो साथियों विषय भी आ गया लपक के सामने। आप विचारें कि आपके आसपास क्या हो रहा है ,क्या होना चाहिये क्या नहीं और लिख मारिये- माज़रा क्या है?
चूँकि लोग छुट्टियों के मूड में हैं। कुछ लोग आ-जा रहे हैं । संपादक निरंतर निकालने में लग जायेंगे तो मेरा विचार है कि इसकी आखिरी तारीख २५ जून रखी जाये। आप लिखें ,साथियों से लिखवायें। चाहें जिस भाषा में लिखें पर यह बता दें कि यह अनुगूँज के लिये लिख रहे हैं। बकिया हम सब खुद कर लेंगे। तो सारत: सूचनायें निम्नवत हैं:-
Filed under: अनुगूँज

अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




पार्क में बैठे हुए एक मित्र मिल गये।पूछने लगेः “यार, कुछ बताओगे कि फ्रैंच कम्पनी मिनैली के जूतों का
क्या माजरा क्या है।” सो भाई, एक दम ह्रदय और मस्तिष्क को झटका सा लगा तो “क्या हम चुप रहें?” शीर्षक के अंतर्गत कुछ लिख कर “महावीर” चिट्ठे पर “अनुगूँज” का लोगो सजा कर प्रकाशित कर दिया है। आप भी पढ़ियेगा।
महावीर
मेरी लेखनी कहती है कि माज़रा कुछ ऐसा है ।
http://hankabaji.blogspot.com/2005/06/blog-post.html
अनुगूँज के लोगो सहित “क्या हम चुप रहें”(९ जून) तथा “ये माजरा क्या है ?” (१९ जून) “महावीर” चिट्ठे पर पोस्ट कर दिये हैं।
महावीर
भईये आखिर माजरा क्या है?
भइया मौका लगे तो हमारी प्रविष्टि भी पढी जाये,
http://www.jitu.info/merapanna/?p=349
[...] रा क्या है?दूसरी पुकार जैसा कि बताया गया था कि अनुगूँज में पोस्ट २५ जून [...]
लो जी हम भी आ गये !
माजरा क्या है ?
आशीष कुमार
हमारा माजरा भी तैयार है - एक नजर
ते असी वी लिख दित्ता है हाँ बी माजरा की ए।
मेरी प्रविष्टि यहाँ देखें -
http://abhivyakti.blogspot.com/2005/06/blog-post.html
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