नवभारत टाईम्स
अभी अभी नारद जी के हवाले से विनय जी वेब पर हिन्दी वाले खबर दिए हैं कि हिन्दी समाचार पत्र नवभारत टाईम्स का सजाल यूनिकोड में उपलब्ध हो गया है। जाकर देखा सजाल तो बढ़िया बनाया है। अंग्रेजी संस्करण से ज्यादा अच्छा लग रहा है शायद इसलिए कि गूगल एडस हिन्दी में नहीं डाल सकते। चलो अब मसालेदार खबरें हिन्दी में पढ़ने का मन हो तो इस तरफ रुख कर सकते हैं। पेरिस हिल्टन के लिए हिन्दी में भी चिंता कर पाएंगे
लेकिन पैरिस हिल्टन का कहना है कि उन्हें सुंदरता की जरा भी चिंता नहीं होती है और वह इसे तवज्जो भी नहीं देतीं। उन्होंने कहा कि पहले वह अच्छी सूरत को पर्सनैलिटी से ज्यादा अहमियत देती थीं, लेकिन अब सब कुछ बदल चुका है। उनका कहना है, ‘मैं वैसे लोगों को पसंद करती हूं जो सुंदर न भी हों, लेकिन भरोसे के लायक हों। जो मेरी अच्छी तरह देखभाल कर सके और मुझे खुश रख सके। जाहिर है ऐसा शख्स मुझे प्यारा लगेगा ही।’ हिल्टन का कहना है कि मैं इसके लिए सूरत से ज्यादा सीरत को तवज्जो देती हूं।
लड़कियो सीखो कुछ हिल्टन से। नवभारत का पता नहीं पर टाईम्स ऑफ इंडिया प्रबद्ध जनों में स्लाइम्स ऑफ इंडिया के नाम से प्रसिद्ध है। आशा करता हूँ कि नवभारत इन ऊँचाईयों को नहीं छू पाया है। अभी तक मेरी पसंद है इनका एकदा नामक स्तंभ
पेड़ का दर्द
नामदेव बचपन से ही संत स्वभाव के थे। उनके हृदय में हमेशा दया का सागर उमड़ता रहता था। उनके बचपन की बात है। एक दिन उनकी बीमार मां ने उन्हें कहा- बेटा, दवा के लिए जरा ढाक की छाल ले आ। नामदेव चले गए और काफी देर बाद लौटे। मां ने देखा, उनकी धोती पर खून के धब्बे पड़े हुए थे। खून देख वह भयभीत हो बोली- क्या हुआ बेटा, किसी से झगड़ा हो गया क्या? नामदेव बोले,’ मां मैं अपने से ही लड़ रहा था। मेरी बहुत देर तक पेड़ की छाल निकालने की हिम्मत नहीं हुई। मैं डर रहा था कि वह कैसे दर्द को सहन कर पाएगा। इसलिए, मैंने पहले अपने पांव की छाल निकाली, ताकि मुझे पता चल पाए कि छाल निकालने पर कितना दर्द होता है। मुझे असहनीय दर्द हुआ। पेड़ को भी इतना दर्द देने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। मुझे माफ करना मां, मैं तेरी आज्ञा का पालन नहीं कर पाया।’ पेड़ के प्रति भी बेटे में ऐसा दया भाव देख मां द्रवित हो उठीं। उन्होंने दोबारा नामदेव को कभी ऐसा काम नहीं दिया।
प्रस्तुति : विजय कुमार सिंह

अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 



