११ वीं अनुगूंज-माज़रा क्या है? का अवलोकन

जब से अनुगूँज का आयोजन शुरु हुआ, हम कई बार विषय देते-देते रह गये। हर बार यही डर रहा कहीं आयोजन करना ही न पड़ जाये।पर हमारे अच्छे कर्मों का प्रताप ही कहा जायेगा कि हम बाल-बाल बचते रहे। पर कब तक ! सो इस बार हमने सोचा बचने में वो मजा कहाँ जो फंसने में है। नतीजन इस बार हमने दिया विषय-माज़रा क्या है? हरिशंकर परसाई हमारे पसंदीदा लेखक रहे हैं। वे इस नाम से लेख लिखते रहे काफी दिन। इसमें वे विश्वभर के शिखर नेताओं से काल्पनिक भेंटवार्ता करके उनकी विसंगतियाँ जाहिर करते थे।तो जब बात देश की करना हो तो यही विषय समझ में आया।
बहरहाल जब विषय दिया गया तो लोगों ने लिखा भी। अभी तक चौदह लोगों ने कुल मिलाकर सोलह पोस्टें लिखीं। जहाँ नये साथियों आशीष श्रीवास्तव तथा सुनील दीपक ने अनुरोध करने पर तुरंत लेख लिखे वहीं राजेश ने बिना अनुरोध के अभिप्राय लिखा-माज़रा क्यों है? देबाशीष तथा इन्द्र अवस्थी आशानुरूप नहीं लिख पाये। देबाशीष व्यस्त थे इसलिये नहीं लिख पाये और अवस्थी मस्त हैं लिहाजा किसलिये लिखें! हालांकि आज भी उन्होंने फोन पर बताया कि हम लिखेंगे जरूर इसपर चाहे अमेरिका वापस जाकर लिखें। पर अपने चिट्ठे वाले आशीष गर्ग कहां चले गये भाई! उधर पूर्णिमा वर्मन जी को बस गजल टाइप करनी है -सोचा रखा है मसाला।बहरहाल, इनके लेख के लिये ग्याहरवीं अनुगूँज तब तक खुली रहेगी जबतक ये लिखते नहीं।बहरहाल जो पोस्ट लिखीं गईं उनका लेखा-जोखा यहां प्रस्तुत है।
बेहूदगी फैशन की ,तमन्नायें मियां ‘हुड़कचुल्लू’ देहलवी की:-फैशन की दौड़ जो न कराये। इसकी शुरुआत ही शायद विवेक की आंखों में पट्टी बांध के होती है।जिन राम की चरणपादुकाओं को शिरोधार्य करके भरत नें उनकी अनुपस्थिति में राज-काज संभाला उन्ही राम के चित्र को “फैंच फैशन ग्रुप मिनैली” ने जूतों पर अंकित करके बेचने की शुरुआत की। इस पर गुस्सा स्वाभाविक था।महावीर शर्मा जी नाराजगी जाहिर करते हुये लिखते हैं:-
यह हिन्दू-धर्म का ही अपमान नहीं है बल्कि मानवता पर भीषण आक्रमण है। समस्त विश्व के हिन्दू-समाज में रोष की लहर दौड़ जाना स्वाभाविक है। “मिनैली” कम्पनी के मालिकों को यह समझाने पर भी कि हिन्दू-समाज की धार्मिक भावनाओं और आध्यात्मिक विश्वास पर यह बड़ा आघात है, उन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। इन जूतियों का विक्रय बाज़ार में अभी भी उसी प्रकार जारी है।
सभी धर्मों के लोगों ने फ्रैंच कम्पनी के इस काम की निंदा की। शर्माजी के एक मुस्लिम मित्र का कहना था:-
ये मामला सिर्फ हिन्दुओं का नहीं है, इसका ताल्लुक़ दुनिया के हर ‘ इन्सान’ और ‘इन्सानियत’ का है। इस गन्दे नाले की गन्दगी को दुनिया के हर मुल्क साथ मिल कर नहीं रोकेंगे तो एक दिन ये सैलाब की शक्ल में तबदील हो जायेगा। हर मज़हब के लोगों को इस में साथ देना चाहिये।
दुनिया भर में हुये प्रतिरोध के चलते ही बाद में मिनैली ग्रुप ने ये जूते बाजार से हटा लिये बाद में क्षमायाचना भी की।महावीरजी फैंच कम्पनी को शिकस्त देकर मौज मजे के मूड में आ गये । संगत की मिर्ज़ा अता उल्लाह ख़ानख़ाना ‘हुड़कचुल्लू’ देहलवी की। इंग्लैंड में जब हुआ जाता है भारत की विसंगतियां ज्यादा साफ दिखतीं हैं। वही मिर्जा को भी दिखा। कुर्सी महिमा के बारे में बताया मिर्जा ने:-
ये कुर्सियां एक ऐसी सीढ़ी की तरह हैं जिसका आखिरी सिरा दिखाई नहीं देता। ऐसे लोग नैतिकता को ताक में रख कर नेतागीरी का जामा पहन कर सब की आंखों में धूल झोंक कर लोगों की हमदर्दी हासिल करते हैं। बस, फिर चुनाव का मैदान साफ़ है। यहां साम, दाम,दण्ड, भेद इनके साथ रहते हैं तो संसद तक पहुंच ही जाते हैं। यहां से मन्त्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिये गिरगट उस्ताद से दोस्ती हो जाती है जो बताता है कि फ़िजा के साथ कैसे रंग बदला जाता है।
इतनी तक़रीर का बाद लाजिमी है किसी मंत्र का पढ़ा जाना:-
नगद माल की लूट है, लूट सके तो लूट
चूका तो पछतायेगा, जब कुर्सी जायेगी छूट।।
साम, दाम,दण्ड, भेद हैं, चारों तेरे यार;
घूंस, घोटाला, मार-धाड़ पर तेरा है अधिकार,
सत्य की माला दिखा दिखा कर, कह ले जितनी झूट।।
मंत्र पढ़ लेने के बाद कोई वरदान न मांगा जाये ये कैसे हो सकता है:-
रोज़ पिता जी कहते रहते मैं प्रधान मन्त्री बन जाऊं ,
श्वसुर साहब की पुत्री को रूस और इंग्लैण्ड घुमाऊं,
नाना जी को हे अविनाशी राष्ट्र-पति का पद दिलवाना,
अगले आम चुनाव में भगवन, मेरी भी सरकार बनाना।
भाभी जी यह स्वप्न देखतीं मैं यदि यू.ऐन.ओ.में जाऊं ,
बन कर प्रेजिडेण्ट सभी देशों पर अपना रौब जमाऊं,
भैय्या यदि कुछ बन न सकें तो भाभी जी का क्लर्क बनाना,
अगले आम चुनाव में भगवन, मेरी भी सरकार बनाना।
मामला गोल मटोल है:-प्रेमपीयूष की प्रविष्टि सबसे पहले आती रही है अनुगूंज में ।इस बार माज़रा कुछ अलग रहा क्योंकि वे सोच में लग गये:-
जब से इंडिया नाम की अवधारणा उत्पन्न हुई, और हमारे सोच पर हावी भी होती चली गयी । एक वैचारिक विरोधाभास का उदय हुआ, घुंघट में लिपटी भारत माता और खुले बाजार में बिकती मेड इन इंडिया के बीच। हिन्दुस्तान की अपनी सलज्ज संस्कृति और पश्चिम की खुली संस्कृति के बीच । गाँव के हाट बाजार और विश्व बाजार के बीच । कारण तो कई हैं मगर एक स्पष्ट है मेरे सामने , हमारे गिरगिटिया रंगों के खद्धरधारी नेताओं में दूरदर्शिता की भारी कमी ।
काबिल लोग अपने में डूबे रहते हैं:-
मेहनती और भी मेहनत कर पैसा कमाने की सोचते हैं चाहे कमाने की जगह विदेश हो या स्वदेश । जुझारु निकल पङते है किसी अनजानी राह पर , किस्मत आजमाने के लिए । उन्हें समय कहाँ कि दुसरों का दोष-गुण निकालते फिरें ।
प्रेम ने बताया कि संचार क्रांति का असर दुनिया पर पड़ना लाजिमी है:-
संचार क्रांति के कारण अनामंत्रित रुप से विश्वव्यापी विविधताओं में एक समानता सी आ रही है । यह परिवर्तन मुख्यतः दिख रहा है समाज के उस वर्ग में , जो इस क्रांति में सक्रिय या असक्रिय रूप से भाग ले रहा है । हम ग्राहकों की नब्ज की पकङ भी बङी आसान है । करोङो जनसंख्या के पास करोङों मिनट हैं बेकार के । क्योंकि सास भी कभी बहु थी इसलिए देशी-विदेशी चैनलों बखुबी दिखा रही है घर-घर की चुगलकहानी ।
आगे बढ़ने के उपाय हैं:-
उपाय एक ही है , प्रत्येक स्तर पर परिश्रमी को प्रोत्साहन चाहिए । रुढ़ीवादी विचारधाराओं का परिष्करण चाहिए । अब समय , भौगोलिक क्षेत्र और विचारों की सीमाएँ बदल गयी है । सारा विश्व एक गाँव बन रहा है । चाहो तो महाजन से सुद पर रुपये लो या फिर निकल पङो कमर पर गमछा बाँधकर अपने हाथ जग्गनाथ मानकर ।
माज़रे को समेटते हुये प्रेम कहते हैं कि सबको साथ लेकर चलने का प्रयास किया जाये तथा इस क्रम में कोई छूटा तो मामला गड़बड़ हो सकता है:-
आधी जनसंख्या की भी सक्रियता को सुनिश्चित करो , काम आसान हो जाएगा । माज़रा बहुत गंभीर होने से पहले ही वातानुकूलित मिटिंग में निर्धारित करो करो तपती धूप में पसीना बहाने वाले के लिए कितनी सरकारी दर से मजदुरी मिलनी चाहिए । इधर माता के संतान, मत मारो कन्या भ्रुणों को , कल कन्याओं की भारी कमी हो जाएगी तो उलटा दहेज देकर खुशामद करते रहना होगा ।
आदमी गधे के बराबर:-रवि रतलामी की पीड़ा है कि गधे की मजदूरी आदमी के बराबर कर दी गयी। गधे के लिये राहत की बात है कि:-
वैसे भी, मनुष्य तो गधा बनता रहता है, पर शुक्र है, और शायद गधे के लिए राहत की बात भी कि, गधा कभी मनुष्य नहीं बनता.
माज़रे को रविरतलामिया रुख देते हुये व्यंजल बताते हैं:-
जाति और धर्म के सियासी क्रीड़ा स्थल में
बन गए सब तमाशबीन ये माजरा क्या हैख्वाब में फिर-फिर चला आता है वो गांधी
पूछता है मेरे भारत में ये माजरा क्या हैकोई और बढ़िया रहा होगा दौर जीवन का
नए आकलन समीकरण ये माजरा क्या हैनई टोपी नया खद्दर का कुरता पहने रवि
दोस्तों से निगाहें चुराए ये माजरा क्या है
बाज बुलबुल हुये:शैल चकरा गये जब उन्होंने देखा:-
हमारे यहाँ के बाज पड़ोसी देश में जाकर बुलबुल हो गये.गाने लगे “सारे जहाँ से सेक्युलर,जिन्ना तुम्हारा”.अब हमारे यहाँ बड़ी जूतम पैजार हुई, बहुत रोना धोना मचा.सेक्युलर लोगों ने कहा तुम जिन्ना की तारीफ करके सेक्युलर बनने कि कोशिश कर रहे हो, ऐसा हम नहीं होने देंगे.कुछ राष्ट्रवादियों ने कहा जिन्ना की तारीफ करके तुम देशद्रोही हो गये हो. कुछ ने कहा बहुत अच्छा किया,ऐसा कहकर तुमने नकली राष्ट्रवादियों की असलियत सामने ला दी.वामपंथियों ने कहा बाज कभी बुलबुल नहीं बन सकता.आज की तारीख में हालत ये है कि सारे कखग”वादी” और “अबस”पंथी, अपने अपने मत लेकर मैदान में कूद पड़े हैं.अब अपनी समझ में तो कुछ नहीं आता कि माजरा क्या है?
अमरसिंह के चिट्ठा शुरु करने पर भी कयास लगाये शैल ने अपनी पारी समेटने के पहले।
परिवार एडजस्ट करो या एन आर आई बन जाओ:-कालीचरण कुछ जमीनी हकीकतों (से रुबरू कराते हुये बात शुरु करते है:-
१) उत्तर प्रदेश की आबादी (१७ करोड) से केवल ४ देश ज्यादा आबादी रखते है, पर क्षेत्रफल के मुताबिक उत्तर प्रदेश कोलराडो से छोटा है.
२) दक्षिण भारत मे जनसन्खया दर २ बच्चे प्रति स्त्री पर आ चुकी है किन्तु उत्तर भारत मे अभी भी ३ बच्चे प्रति स्त्री का औसत है.
भोपाली भाई अधिकांश समस्याओं की जड़ जनसंख्या में देखते हैं तथा इलाज एक ही है -एक अदद संजय गांधी:-
संजय गांधी की जरुरत है देश को. सारी सरकारी नौकरियो मे १ से ज्यादा बच्चे वालो की उन्नति रोक दी जाए. ईतना ही क्यो हर सरकारी नौकर जिसके बच्चे है उसकी नसबन्दी कर दी जाए. नही मानो तो हाथ धो नौकरी से. सरकारी सहयोग तथा ऋण प्राप्ति के लिए भी यही नियम रखे जाए.
जहां कालीचरण को यह भरोसा है कि सही योजनाओं से पुरानी कमीं को दूर किया जा सकता है वहीं वे चेतावनी देते हैं कि :-
मेरा यह मानना है की अगर राजनैतिक दल लोकप्रिय वोटरो को लुभाने वाली राजनीति से उपर उठे तो १ पीढि मे ही हम पिछली पीढि की बेवकुफी को सुधार सकते है. अगर समाज अभी नही चेता तो फिर भुखमरी,अकाल, बिमारी तथा चरमराता ढाचा ही आखिरकार जनसन्खया को कम कर देगा.
एक टिप्पणी में भोपाली कहते हैं कि अगर फिर भी कम कर पाओ आबादी तो एन.आर.आई. बन जाना बेहतर उपाय है।
सूखी धरती सिकुड़े दरिया:-भावनाओं की सबसे बेहतरीन अभिव्यक्ति कविता में हो सकती है यह मानते हुये अतुल ने अपनी बात कविता के मान पर तुकबंदियों में कहना बेहतर समझा। विरोधाभासों को रेखांकित करते हुये अतुल फरमाते हैं:-
भूखी डाँस बार बालाऐं मचाती गुहार
हवलदार फाड़े सबकी सलवार
कान मे डाल के तेल है बैठी
जनता की सरकार
भईये आखिर माजरा क्या है?
इससे लगता है कि अतुल निरंतरके पानी अंक के लिये मूड/मसाला बना रहे हैं:-
सूखी धरती सिकुड़े दरिया खाली बाल्टी सूनी नजरिया
फिर भी मल्टीप्लेक्स में बहती पेप्सी की धार
भईये आखिर माजरा क्या है?
कभी बीच बजरिया की बात होते ही खटमल काटने लगते थे। अब वे नोटों के हार में बदल गये हैं:-
पाकेटमारो पर चटकाते डंडे, छुटभैये चोरो पे होती जूतो की बौछार
ताजमहल बेच दलित की बेटी फिरती, बीच बजरिया पहने नोटो के हार
भईये आखिर माजरा क्या है?
अपनी राजनैतिक ताकत के प्रति उदासीनता सारे लफड़ों की जड़ है:-
वोटिंग के दिन तो सोते तान के चादर
फिर बजट पे क्यूँ मचाते सब बवाल
भईये आखिर माजरा क्या है?
जन जागरण की जरूरत :-जीतेन्दर के छक्के छूट गये विषय की गंभीरता के बारे में सोचकर।फिर उन्होंने सोचा तो जान पाये कि विरोधाभास पूरी दुनिया में हैं:-
विरोधाभास कहाँ नही है. हमारी संस्कृति मे,हमारी जीवनशैली मे, हमारी विचारो मे, हमारी भाषा मे हर जगह. अब इसके विस्तार मे जाने के लिये आपको पूरी पूरी रामायण समझानी पड़ेगी. जहाँ हमारे शहर बिजली कटौती की मार झेल रहे है, वंही किसानों को बिजली मुफ्त दिये जाने के वादे किये जा रहे है. जहाँ शेयर मार्कैट नित नयी ऊंचाइयों पर छलांगे लगा रहा है, वही मंहगाई बढती जा रही है, और विकास दर नीचे जाती जा रही है. ये विरोधाभास नही है तो और क्या है.
भारी विषय को हल्का करने के लिये चुटकुला पेश करते हुये जीतू बताते हैं कि हमारे देश की हालत उस डाक्टर के सामने चेकअप के लिये बैठी स्त्री की जो आपरेशन के लिये तैयार है लेकिन जिसका औजारों का बैग नहीं खुल रहा है।अपनी ताकत के बारे में बात करते हुये बताते हैं:-
हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है बढती जनसंख्या, लेकिन यदि उसको परोक्ष रूप से देखा जाये तो हमारी सबसे बड़ी ताकत भी है.हमारे पास दुनिया मे सबसे ज्यादा अंग्रेजी बोलने वाले लोग है, हम नई तकनीकों और प्रद्योगिकी के अच्छे जानकार है, हम नई नई चीजे जल्दी सीख जाते है.हमारे पास प्राकृतिक संसाधन है, उनका दोहन करने की तकनीक है, हमारी अर्थव्यवस्था काफी अच्छी है, हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र है,हमारा देश पर्यटन का एक बहुत बड़ा केंद्र है.
बकौल जीतेन्द्र कमजोरियों की फेहरिस्त भी कम लंबी नहीं है:-
बढता भ्रष्टाचार, देशप्रेम की कमी…हर व्यक्ति अपने लिये सोचता है, देश के लिये नही, लोगों की लोगों से बढती दूरी, भाषाई और धार्मिक वैमनस्य, अशिक्षा, गरीबी,अंधविश्वास, जाति पाति,लिंग भेद, पड़ोसी देशों से तनावपूर्ण सम्बंध,कमजोर,भ्रष्ट और अपराधिक छवि वाले राजनीतिज्ञ, और ना जाने क्या क्या.
देश के विकास के लिये अपने कुछ सुझाव देते हुये जीतेन्द्र कहते है:-
देश मे जन जागरण की जरूरत है, अगर देशवासी जाग गये, तो देश को उन्नति के रास्ते पर जाने मे कोई नही रोक सकता, राजनेता भी नही. लेकिन पहला कदम कौन रखे? इसी उधेड़बुन मे हमने इतने साल व्यर्थ मे गँवा दिये और मूकदर्शक बनकर देखते रहे.
गरीबी का सच्चा चित्रण :-खालीपीली से इसी महीने अपनी बात शुरु करने वाले आशीष कुमार श्रीवास्तव से जब लिखने का अनुरोध किया गया तो वे बिना किसी नखरे के मान गये। सोचने लगे लिहाजा गंजत्व की स्थिति के नजदीक पहुंच गये। कपिलदेव,बांगलादेश,संजयनिरुपम,बुद्ददेव भट्टाचार्य को कृतार्थ करते हुये सनीमा वालों की गरीबी के बारे में बात करते हैं:-
अपनी फिल्मे भी भारत महान की गरीबी का कितना सच्चा चित्रण करती है, अपनी हिरोइनो के पास पहनने के लिए कपडे ही नही होते. बेचारा सलमान सबसे ज्यादा गरीब है,बेचारा एक शर्ट भी नही पहन पाता. अजी एश के प्यार ने उसको निकम्मा कर दिया, वर्ना वो भी किसी काम का था. क्या कहा अब विवेक ने भी शर्ट पहनना बंद कर दिया?
अमेरिका को लपेटते हुये वे कहे हैं:-
अजी पारदर्शिता तो तब आती है जब अमरीकी सेना की निगरानी मे चुनाव हों. जैसा अफगानिस्तान मे हुवा था, इराक मे हुवा था.
धर्मनिरपेक्षता और जूते:- निठल्ला चिन्तन करते हुये तरुन ने जब लिखना शुरु किया तो लगा कि :-
विषय जैसा दिखायी देता है वैसा है नही। चन्द लाईन लिखने के लिए ना ही दिमाग ने साथ दिया ना दिल ने। अब जब दिल और दिमाग साथ छोड़ दें तो भला कोई क्या कर सकता है, हम भी बैठ गये हाथ पर हाथ रख कर।
कुछ मासूम सवाल उठे :-
जैसे ही एक धर्म विशेष के भगवान की फोटो मिलैनी निर्मित जूतों में देखी, दिमाग में रक्त ने उबाल लिया और दिल हाहाकार कर उठा, ये क्या एक बार फिर से ऐसा मंजर। इन व्यवसायिक लोगों को कोई और डिजाइन नहीं मिला। खूब गालियाँ निकाली, किसी की फोटो ऐसे जूतों में छापना……..हद है। यह मुआ अपनी ही फोटो क्यों नही छपता। अंदर से निठ्ल्ले की आवाज आयी, देखो मिंयाँ “सेक्यूलर होने का इससे अच्छा मौका फिर नही मिलेगा”।
सवाल हैं तो सवालों के जवाब भी हैं:-
अपनी समझ में बिल्कुल नही आया कि धर्म निरपेक्ष होने का जूतों से क्या ताल्लुक। इसलिए पूछ लिया, “वो भला कैसे”। निठ्ल्ला बोला, एक जोड़ी ये जूते ले लो, और फिर ऐसे ही एक-एक जोड़ी अलग-अलग धर्मों से जुड़े लोगों की फोटो छपे जूतों की ले लेना। अगर नही मिल पाये तो अपने देश में तो हर चीज का जुगाड़ है, इसका भी हो जायेगा। बस फिर, सुबह शाम जय-जय करना और दिन में शान से एक पांव में एक दूसरे मे दूजा पहन के निकलना। अलग-अलग धर्मों के देव एक साथ घुमने निकलेंगे, घर में ही मन्दिर, मसजिद, गुरूद्वारा और चर्च, सब एक जगह; मन्दिर और मसजिद का कोई झगड़ा ही नही। अब इससे बड़ी धर्म निरपेक्ष की कोई मिसाल मिलेगी।
देवता ही किसलिये मिलते हैं डिजाइनर काम के लिये। देखें निठल्ले की जबानी:-
अच्छा निठ्ल्ले एक बात बता इन्हें अपने ही देवगण क्यों मिलते हैं अपने डिजाइनर काम के लिए, आखिर “ये माजरा क्या है”। सिंपल, क्योंकि इन्हें पता है हम में से कुछ सेक्यूलर बने बैठे हैं, इसलिए कुछ कहेंगे नही; और कुछ शायद शर्म के मारे कुछ ना बोले, अब बचे कुछ चंद मुठ्ठी भर लोग, अगर इन्होंने हल्ला बोला तो ठीक नही बोला तो इनकी तो निकल पड़ी ना। दूसरा, बाकी सब के पास एक अपने पास छत्तीस करोड़ इसलिए भी प्रोबेबिलीटी थोड़ा बड़ जाती है। योग गया, आयुर्वेद गया शायद अब इसकी बारी हो।
पूरे देश की हालात पर नज़र दौड़ाते हुये तरुन लिखते हैं:-
“२४ घंटे में मुश्किल से कभी १२ घंटे बिजली आती है, सड़कों की हालत पगडंडी जैसी होती जा रही है, कोर्ट में केस पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है, देहली और बोम्बे को छोड़ कहीं कोई डेवलपमेंट नहीं इसलिये जनता इन्हीं शहरों को दौड़ी चली जाती है, कॉल सेंटर के अलावा कहीं कोई नौकरी नहीं, सरकारी नौकरी में आरक्षण के अलावा कोई काम नहीं, बिल जमा करने को अभी भी घंटों लाईन में लगना पड़ता है, फोन और इंटरनेट का कनेक्शन मिलने में अभी भी कई दिन लग जाते हैं, सरकारी बाबू अभी भी पैसे खाये बिना कुछ नही करते, पब्लिक स्कूल में इंगलिश और सरकारी स्कूल में हिंदी बदतसूर जारी है, अमीर और गरीब का फर्क बड़ता जा रहा है, नियम-कानून पर अभी भी किसी को भरोसा नही, सरकारी पार्टियां देश की आबादी की तरह बढ़ती हीं जा रहीं हैं, पहले किसी और की नीति थी “फूट डालो राज करो” और अब ये इन राजनीतिक पार्टियों की नीति है, जाती के नाम पर; भाषा के नाम पर; धर्म के नाम पर अभी भी सब लोग बंटे हुए हैं, अभी भी आधे से अधिक जनता अनपढ़ है, छूत छात अभी भी जारी है, महिलाओं को ज्यादातर लोग अभी भी पैर की धूल से ज्यादा नही समझते, इनफ्रास्ट्रकचर की अभी भी कोई बात नही करता……………फिर कुछ चंद लोग मीडिया में, न्यज पेपर में ये कैसे कहते रहते हैं कि अगले २५-३० सालों में हम एक सुपर पावर होंगे, दुसरे नम्बर पर होंगे वगैरह वगैरह….” आखिर कोई तो बताये, भला ये “माजरा क्या है”।
मन में खुशी चेहरे पर दुख:-अपनी सहज भाषा में खूबसूरत चित्र तथा मनपसंद कविता के साथ दिलकश चिट्ठा लिखने वाले सुनील दीपक ने भी अनुरोध करने पर तुरंत लिखा:-
दुनिया में दो तरह के लोग रहते हैं, एक वह जो तमाशा करते हैं और दूसरे वह जो आस पास से खड़े हो कर पूछते हैं, क्या माजरा है भाई साहब. दूसरी श्रेणी के लोग, यानी माजरा क्या है पूछने वाले, पहली श्रेणी के लोगों से बहुत अधिक हैं.
दोहरेपन की मज़बूरी मजबूरी क्या -क्या नहीं करवाती है:-
कभी कभी, माजरा देख कर भी चुपचाप ही रहना पड़ता है. यानी मन में खुशी के लड्डु फूट रहे हों, फिर भी चेहरा गम्भीर बना कर यूँ रहने पर हम मजबूर होते हैं मानो हमें सचमुच बहुत दुख हो रहा हो. घर में अगर पिता जी का झापड़ अगर आप के छोटे या बड़े भाई को पड़े, या फिर जब मास्टर साहब उस लड़के को मुर्गा बनवायें जिससे आप का झगड़ा हुआ था, तो ऐसा भी हो सकता है कि आप माजरा तो देखें, पर छुप छुप कर.
मिर्ची के बोरों का हाथ से निकलना:-पंकज ने भी काफी मानमनौवल के बाद उगलियां इनायत की की-बोर्ड पर। लिखा तब पता चला कि समय पर सूचना के अभाव में हम उन मिर्ची के बोरों से हाथ से धो बैठे थे जो कि सही समय पर हमारे हो सकते थे-कितना दूर है अम्बाला ? रात भर में पहुंच जाते। शुरुआत में अपने ढोंग का खुलासा करते हुये दूसरों को भी लपेटा:-
हाँ जी तो पहले माजरा यह है कि मैं बहुत बड़ाँ ढोंगी हूँ और जानता हूँ कि आप भी हैं। मैं सारे दिन एक मंगल को छोड़ कर चिकन खा लेता हूँ।
एलविन टाफ्लर की तीन लहरें गिनाते हुये वे बताये है:-
पहली लहर थी कृषि की, फिर आई औद्योगिक लहर और इसके उपरांत आई सूचना लहर। तो इन अलग अलग लहरों के घटने का समय अलग अलग था अपने पश्चिम में। वैसे भी भारत के स्वर्ण युग को तो हम गिन ही नहीं सकते और मैं लार्ड मैकॉले की शिक्षा नीति का अधपक्का उतपाद हूँ। खैर वह अलग बात है। कृषि लहर के लोग मिट्टी के धरों में रहते थे उनकी सोच भी मिट्ठी से जुड़ी थी। बड़े बड़े परिवार थे सब मिल जुल कर रहते थे। माँ बाप बच्चों से प्यार करते थे व उनकी ताजिंदगी देखभाल करते थे। बच्चे भी माँ बाप के बुढ़ापे की लाठी होते थे। फिर आई औद्योगिक लहर। लोग फैक्टरियों में आ गए। परिवार बस माँ बाप और बच्चों तक सीमित हो गए। बाप बेटे से बड़े होने पर घर में रहने पर किराए के बारे में सोचने लगा और बाप भी बच्चों के घर फोन करके व बेटे के अलग शहर में रहने पर होटल में रहने लगा। तलाक का शब्द भी गलियों में बड़ा गूँजने लगा। फिर आई सूचना लहर इहाँ तो मजे ही मजे हैं। एकदम प्राइवेट लाईफ है। बस कान पर आई पोड लगाया और अपनी ही दुनिया में मग्न। शादी की नहीं क्यूँकि कमिटमेंट माँगती है। बच्चों की जगह कुत्ते पाल लिए क्यूँकि कुत्ते को तो बस पहले साल ट्रेन करना पड़ता है फिर सारी उमर वैसे का वैसा। बच्चे का बचपन अलग, पढ़ाई फिर जवानी और पता नहीं क्या क्या। कुत्ते ही अच्छे हैं।
देश में किस तरह से हर लहर मौजूद है बताते है:-
आज यह है कि अपने यहाँ हाई क्लास, अपर मिडल क्लास, मिडल मिडल क्लास, लोअर मिडल क्लास, लोआर क्लास के साथ हम लोग तीनो लहरों में जी रहे हैं। बैंगलोर में लोडे आई पोड लगा कर घूमते हैं, जबकि अपने अम्बाला में अभी भी बर्फ बाजार में बिकती है और बर्फ के कारखाने भी हैं। थोड़ा दूर गाँव चला जाऊं तो मिट्टी के धर बनाती औरते भी मिल जाएंगी। पर टी वी हर जगह हैं। इस से बड़ी मजेदार संस्कृति पैदा हो गई है। मुहल्ले की प्रिया आंटी घर में तो मैक्सी पहन कर धूमती हैं पर गली में सब्जी लेने वाला आए तो दुपट्टा ओढ़ कर बाहर आ जाती है। बच्चे आज कल लव अफेयर तो खूब चलाते हैं पर शादी फिर भी बड़े दहेज के साथ माँ बाप के कहने पर करते हैं।
माजरॆ का दूसरा पहलू:-राजेश हालांकि काफी पहले से लिख रहे हैं ,सबके चिट्ठे पढ़ रहे हैं लेकिन लिखने का मन पहली बार बना। सो जब लिखा तो माज़रा क्या है? के बजाय माज़रा क्यों है? पर अपनी विचार सुषमा बिखेरी।कवि सम्मेलन के दौरान कुछ नामचीन कवियों को महिमा-मंडित तथा दूसरों को कम तरजीह देने की घटना तथा इसके संभावित कारण बताये:-
मंच और रंगमंच का अन्तर , दिल-दिमाग कॆ भीतर इस कदर समाया हॊता है , कि हमॆशा मंच कॊ रंगमंच कॆ रूप मॆं दॆखनॆ/बदलनॆ की कॊशिश की जाती है। इस फ़र्क कॊ , आयॊजन मॆं मंचासीन सभी कवियॊं नॆ शायद महसूस किया। नतीजा यह हुआ , कि कवि-सम्मॆलन शुरु हॊनॆ सॆ पहलॆ ही अपनी रंगत खॊ बैठा ।
राजेश के अनुसार भारतीय लोगों में कुछ मूलभूत कमी है:-
भारतीय बुद्धिजीवी , हममॆं मूलभूत गुणॊं का अभाव है। जिन भारतीयॊं कॆ विदॆशॊं मॆं झंडा गाड़ॆ रखनॆ की बात है , उनका तॊ दॆश की समस्याओं सॆ कॊई नाता ही नहीं। फिर उनकी याद सॆ आँखॆ नम करनॆ कॆ अलावा , और कुछ फायदा दिखता है क्या ?
देश के प्रति हमारा रुख अवसर वादी है बताने के बाद राजेश उनके कारणों का जायजा लेते हुये राजेश लिखते हैं:-
बतौर निचॊड़ और निष्कर्ष ,समाज का जितना बॆड़ा भ्रष्टाचार सॆ गर्क हुआ हॊगा , उससे कई गुना ज्यादा नुकसान स्वार्थ लिप्त ताकतॊं नॆ किया है। फिर , चाहॆ उन स्वार्थी ताकतॊं कॊ हमनॆ , गुन्डा , माफियॊं कॆ रूप मॆ पहचाना या बुद्धिजीवियॊं कॆ रूप मॆं या फिर , पूँजीपति और अफसरशाहॊँ कॆ रूप मॆं। इन सबकॆ रास्तॆ बस अलग-अलग थॆ , तरीकॊं मॆं फ़र्क था , लॆकिन , तहजीब सबकी वही थी।
भूत-बेताल नाचे बे-तालतथा प्रगति से जुड़े सवाल:-कुछ अंतराल के बाद स्वामीजी फिर पूरी तैयारी के साथ अनुगूंज के मैदान पर मौजूद हुये।शुरुआत एक जबरदस्त चिट्ठांश (?)से करते हुये लिखा:-
यही सजीव बाँग़डू कोलाज वाला हाल हमारे देश का है! भारत सदियों से एक साथ कई युगों मे जीता रहा है.
स्वामीजी को आगे भी कोई बदलाव के आसार नजर नहीं आते:-
विकासशील ही रहेगा देश जैसे सदियों से रहता रहा है.
दूल्हे के माध्यम से मध्यवर्गीय समाज का जायजा लेने बाद देश के अतीत को टटोला :-
भारत कि दो महान सभ्यताओं को देने वाली सिंधु घाटी और गंगा के मैदानो पर आर्यों के बाद युनानियों ने हमले तो तुर्कों, मुगलों फ़िर हिस्सों मे 3-4 किस्म के गोरों ने राज किए. ३००० वर्ष ईसा पूर्व से तकरीबन २००० वर्ष ईसा पश्चात के ५००० सालों मे इन दो सभ्यताओं के अधिकांश बाशिंदों ने सिर्फ़ कृषि आधारित आत्मनिर्भरता ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर घोर गरीबी में निर्वाह किया है! हमारी हक़ीकत इतनी भयावह रही है और कुरूप की उसके जिक्र से बचने को हम खुद कोढ पे चादर डाल देते हैं. राजशाहियों मे आम आदमी गरीब ही रहा.
दूसरों के विपरीत हमने सामूहिक प्रगति के कोई प्रयास नहीं किये:-
हमने कभी भी एक बडी बादबानी नाव नहीं बनाईं, जिस पर सवार हो कर, पतवार खोलते, नई जमीन तलाशने निकल जाते! हमने झेली आंधियां जो अपने साथ लाईं नई-नई भाषाएं, पराए धर्म और संस्कृतियाँ - जो हमने बस अपनाए. हम नही बने आंधी ना ही वो दीवार जो आँधियों को रोक सके. हमें जरूरत नही पडी - हो सकता है, शायद इतनी उर्वर थी हमारी भूमी, आवश्यकता नही पडी हो - सोच तो व्यव्हारिक रूप से सँकुचित थी ना चाहे उसका दार्शनिक विस्तार पार-लोक, पर-जनम तक रहा हो. क्या से क्या हुए हैं हम -
धीरे-धीरे ,जाने-अनजाने हम यथार्थ से दूर होते गये:-
क्या हमारा दर्शन हमारा शगल बन गया? फेवरेट पास-टाईम? क्या रूढियाँ हमारी जीवन शैली बन गईं? क्या हम यथार्थपरक नही रहे? श्रुति-स्मृति आधारित शिक्षा व्यवस्था ने तोतारटंत सामाज नही बनाया? भ्रमण-श्रवण-मनन का क्या हुआ
नयी पीढ़ी की सोच को स्वतंत्र विस्तार न देकर हम अतीत चर्चा में लगे रहे:-
हमने एकदा गढे शास्त्रियता के बंध, और फ़िर, बंधे-बंधे अतीत से ही, जाते रहे अतीत मे ही खोजने उस उर्जा को जो गढ सके नया - कैसे हो? उडने के लिए चाहिए हवा और चाहिए पंख - हमने पंख कतरे अपने बच्चों के, अतीत महिमामंडित हो गया!
देश की मूलभूत समस्यायें जस की तस बरकरार हैं:-
जनसंख्या, बेरोजगारी, बिमारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, गंदगी, अशिक्षा, पिछडापन जैसे मुद्दे आज भी बकाया हैं! हमारी अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है और ये स्वीकार करने में हमारी हेठी होती है, पिछडापन महसूस होता है! हमारी आत्मनिर्भरता का आधार कृषि है साफ्टवेयर का निर्यात नही है! हमने अपने बाजार खोल कर अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की राह आसान की, बडे बडे संस्थानो से निकलने वाले युवकों की राह आसान की पर हमारे अपने उत्पाद नही आ रहे जो हमारे बाजारों मे ही खप सकें. अभी तक गर्व कर सकने लायक कुछ भी नही हुआ है!
स्वामीजी का कहना है कि उन पत्रकारों की सरेआम धुलाई होनी चाहिये जो बेबुनियाद आंकड़ों के आधार पर देश की प्रगति की हवा हवाई खबरें फैलाते रहते हैं।नागरिकों का विकास देश के विकास की पहली सीढ़ी है:-
मेरे विचार में देश को विकसित बनाने का अर्थ देश के नागरिकों को विकसित करना है, उनको बुद्धिजीवी बनाना है. कविता लिखने वाला, फिलासाफी पेलने वाला थोथा पंगू झंडू टाईप नही, क्रियाशील सशक्त और सक्रिय बुद्धिजीवी, सृजनशील! आप क्रियाशील बुद्धिजीवी बनाने का साधन करो देश अपने आप संपंन्न और विकसित हो जाएगा - पक्का! अगर आप तोतारटंत समाज बनाओगे देश नए पाठ सिखने के लिए बाहर की ओर देखने लगेगा - नकलची होने लगेगा!
स्वामीजी का मानना है कि हमें अपनी शक्तियों को पहचानकर अपनी मेधा बढ़ानी होगी। विविधतापूर्ण समाज हमारे लिये धनात्मक बिंदु हो सकता है। सफल होने के लिये जहां से जो सहयोग मिले ,लेने में संकोच नहीं करना चाहिये।
प्रगति का कोई एकिक नियम नहीं होता:-आयोजन जब हमने किया तो मजबूरन लिखना पड़ा हमें भी। दूसरों के काफी विचार आ ही चुके थे लिहाजा लिखा गया। लब्बोलुआब कुछ यूँ रहा:-
इतिहास जैसा भी हो लेकिन मेरा यह मानने का मन नहीं करता कि भविष्य भी वैसा ही होगा। कोई गणित नहीं होता प्रगति का।कोई एकिक नियम नहीं होता कि सौ साल में दस कदम चले तो दो सौ साल में बीस कदम चलेंगे। मेधा किसी कौम की बांदी नहीं होती। मेरा मानना है कि लगन तथा मेहनत किसी भी कमी को पूरा कर सकते हैं। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि दो व्यक्तियों ,कौमों में उन्नीस-बीस,पंद्रह-सोलह का अंतर हो सकता है सौ-दो सौ का अंतर कभी नहीं होता । जो यह मानता है वह मेहनत ,लगन,समर्पण की ताकत से बेवाकिफ है।
मेरा तो मानना है कि हम जहां हैं जिस स्थिति में हैं वहीं से जो ठीक समझते हैं वह करते रहें । बहुत छोटी कोशिशें न जाने कब बड़ी सफलताओं में बदल जायें। काफिले की शुरुआत भी अकेले से ही होती है। सफलता -असफलता का मूल्यांकन आगे आने वाला समय करेगा। अभी न कुछ शुरु किया तो जिंदगी बीत जायेगी सोचते-सोचते -माज़रा क्या है?
कुछ मजेदार सवाल-जवाब भी हुये इस पोस्ट पर।
तो साथियों यह रहा ११वां अनुगूंज आयोजन -माज़रा क्या है ? के लिये लिखे चिट्ठों का अवलोकन । जो साथी बकाया हैं वे जब लिखेंगे उनके चिट्ठों का अवलोकन किया जायेगा।फिलहाल बाहरवीं अनुगूंज के आयोजक अपने विषय की घोषणा करें।
Filed under: अनुगूँज

अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम
अनूपजी,
बधाई हो श्री मान् ,अनुगूँज के सफल आयोजन के लिए ।
अगली बार से अनुगूँज की घोषणा होते ही मैं भी फुरसत के क्षण निकालकर फुरसतिया की शिकायत दूर कर दुँगा ।
अनूप जी,
रोचक अवलोकन के बहुत बहुत धन्यवाद. हर चिट्ठे से दिलचस्प हिस्से निकाल कर इन्हें एक तर्कसंगत तथा रचनात्मक तरीके से एकसार करना भी एक कला है जो आप के लेख में बहुत खूबी से निखरी है. धन्यवाद.
हिन्दुत्व अथवा हिन्दू धर्म
हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक, एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं।
अधिक के लिये देखियेः http://vishwahindusamaj.com
चिठ्ठाजगत में स्वागतम्
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