लो भाई बनारसी भी आ गये मैदान में
Posted on जुलाई 26th, 2005 द्वारा अनूप
बीस साल बाद जब हमारे मित्र मनोज मिले तो बोले हम बदला चुकाने आये हैं। हमने पूछा -किस बात का बदला? तो वे बोले जो कवितायें तुमने अनजाने में हमें झेलाईं हम उनका बदला चुकायेंगे। हमने पूछा कि क्या वही कवितायें सुनाओगे? वे बोले नहीं-हम अपनी सुनायेंगे। हमने कहा -तुम कविता कब से लिखने लगे? तुम
तो ऐसे न थे। वे बोले जब तुम लिख सकते हो तो हम काहे नहीं? हम बोले लिखो। वे बोले बताओचिट्ठा कैसे लिखते हैं। बताया गया तो इन्होंने कर भी दिया शुरु लिखना। अब आप लोग झेलें एक और कवि को। जो कवि भी है तथा फिलहाल बनारसी भी । मतलब करेला वह भी नीम चढ़ा।
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




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