लो भाई बनारसी भी आ गये मैदान में

बीस साल बाद जब हमारे मित्र मनोज मिले तो बोले हम बदला चुकाने आये हैं। हमने पूछा -किस बात का बदला? तो वे बोले जो कवितायें तुमने अनजाने में हमें झेलाईं हम उनका बदला चुकायेंगे। हमने पूछा कि क्या वही कवितायें सुनाओगे? वे बोले नहीं-हम अपनी सुनायेंगे। हमने कहा -तुम कविता कब से लिखने लगे? तुम
तो ऐसे न थे। वे बोले जब तुम लिख सकते हो तो हम काहे नहीं? हम बोले लिखो। वे बोले बताओचिट्ठा कैसे लिखते हैं। बताया गया तो इन्होंने कर भी दिया शुरु लिखना। अब आप लोग झेलें एक और कवि को। जो कवि भी है तथा फिलहाल बनारसी भी । मतलब करेला वह भी नीम चढ़ा।

One Response to “लो भाई बनारसी भी आ गये मैदान में”

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