१२वीं अनुगूँज : सुभाषित सहस्र / मेरी तीसरी खेप

आधुनिक विषय

गणित

यथा शिखा मयूराणां , नागानां मणयो यथा ।
तद् वेदांगशास्त्राणां , गणितं मूर्ध्नि वर्तते ॥
– वेदांग ज्योतिष
( जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे उपर है, वैसे ही सभी वेदांग और शास्त्रों मे गणित का स्थान सबसे उपर है । )

बहुभिर्प्रलापैः किम् , त्रयलोके सचरारे ।
यद् किंचिद् वस्तु तत्सर्वम् , गणितेन् बिना न हि ॥
– जैन गणितज्ञ , महावीराचार्य
( बहुत प्रलाप करने से क्या लभ है ? इस चराचर जगत में जो कोई भी वस्तु है वह गणित के बिना नहीं है / उसको गणित के बिना नहीं समझा जा सकता )


Akshargram Anugunj

ज्यामिति की रेखाओं और चित्रों में हम वे अक्षर सीखते हैं जिनसे यह संसार रूपी महान पुस्तक लिखी गयी है ।
– गैलिलियो

गणित एक ऐसा उपकरण है जिसकी शक्ति अतुल्य है और जिसका उपयोग सर्वत्र है ; एक ऐसी भाषा जिसको प्रकृति अवश्य सुनेगी और जिसका सदा वह उत्तर देगी ।
– प्रो. हाल

काफी हद तक गणित का संबन्ध (केवल) सूत्रों और समीकरणों से ही नहीं है । इसका सम्बन्ध सी.डी से , कैट-स्कैन से , पार्किंग-मीटरों से , राष्ट्रपति-चुनावों से और कम्प्युटर-ग्राफिक्स से है । गणित इस जगत को देखने और इसका वर्णन करने के लिये है ताकि हम उन समस्याओं को हल कर सकें जो अर्थपूर्ण हैं ।
– गरफंकल , १९९७

गणित एक भाषा है ।
– जे. डब्ल्यू. गिब्ब्स , अमेरिकी गणितज्ञ और भौतिकशास्त्री

लाटरी को मैं गणित न जानने वालों के उपर एक टैक्स की भाँति देखता हूँ ।

यह असंभव है कि गति के गणितीय सिद्धान्त के बिना हम वृहस्पति पर राकेट भेज पाते ।

विज्ञान

विज्ञान हमे ज्ञानवान बनाता है लेकिन दर्शन (फिलासफी) हमे बुद्धिमान बनाता है ।
– विल्ल डुरान्ट

विज्ञान की तीन विधियाँ हैं - सिद्धान्त , प्रयोग और सिमुलेशन ।

विज्ञान की बहुत सारी परिकल्पनाएँ गलत हैं ; यह पूरी तरह ठीक है । ये ( गलत परिकल्पनाएँ) ही सत्य-प्राप्ति के झरोखे हैं ।

हम किसी भी चीज को पूर्णतः ठीक तरीके से परिभाषित नहीं कर सकते । अगर ऐसा करने की कोशिश करें तो हम भी उसी वैचारिक पक्षाघात के शिकार हो जायेगे जिसके शिकार दार्शनिक होते हैं ।
– रिचर्ड फ़ेनिमैन

तकनीकी

पर्याप्त रूप से विकसित किसी भी तकनीकी और जादू में अन्तर नहीं किया जा सकता ।
-आर्तर सी क्लार्क

सभ्यता की कहानी , सार रूप में , इंजिनीयरिंग की कहानी है - वह लम्बा और विकट संघर्ष जो प्रकृति की शक्तियो को मनुष्य के भले के लिये काम कराने के लिये किया गया ।
– एस डीकैम्प

इंजिनीयर इतिहास का निर्माता रहा है, और आज भी है ।
– जेम्स के. फिंक

मशीनीकरण करने के लिये यह जरूरी है कि लोग भी मशीन की तरह सोचें ।
– सुश्री जैकब

इंजिनीररिंग संख्याओं मे की जाती है । संख्याओं के बिना विश्लेषण मात्र राय है ।

आवश्यकता डिजाइन का आधार है । किसी चीज को जरूरत से अल्पमात्र भी बेहतर डिजाइन करने का कोई औचित्य नहीं है ।

तकनीक के उपर ही तकनीक का निर्माण होता है । हम तकनीकी रूप से विकास नही कर सकते यदि हममें यह समझ नहीं है कि सरल के बिना जटिल का अस्तित्व सम्भव नहीं है ।

भाषा / स्वभाषा

निज भाषा उन्नति अहै, सब भाषा को मूल ।
बिनु निज भाशा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल ॥
– भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

भाषा हमारे सोचने के तरीके को स्वरूप प्रदान करती है और निर्धारित करती है कि हम क्या-क्या सोच सकते हैं ।
– बेन्जामिन होर्फ

आर्थिक युद्ध का एक सूत्र है कि किसी राष्ट्र को नष्ट करने के का सुनिश्चित तरीका है , उसकी मुद्रा को खोटा कर देना । (और) यह भी उतना ही सत्य है कि किसी राष्ट्र की संस्कृति और पहचान को नष्ट करने का सुनिश्चित तरीका है, उसकी भाषा को हीन बना देना ।

..(लेकिन) यदि विचार भाषा को भ्रष्ट करते है तो भाषा भी विचारों को भ्रष्ट कर सकती है ।
– जार्ज ओर्वेल

जो एक विदेशी भाषा नहीं जानता वह अपनी भाषा की बारे में कुछ नही जानता ।
– गोथे

साहित्य

साहित्य समाज् का दर्पण होता है ।

संगति / सत्संगति / मित्रलाभ / एकता / सहकार /नेटवर्किंग / संघ

संघे शक्तिः ( एकता में शति है )

हीयते हि मतिस्तात् , हीनैः सह समागतात् ।
समैस्च समतामेति , विशिष्टैश्च विशिष्टितम् ॥

हीन लोगों की संगति से अपनी भी बुद्धि हीन हो जाती है , समान लोगों के साथ रहनए से समान बनी रहती है और विशिष्ट लोगों की संगति से विशिष्ट हो जाती है ।
– महाभारत

यानि कानि च मित्राणि, कृतानि शतानि च ।
पश्य मूषकमित्रेण , कपोता: मुक्तबन्धना: ॥

जो कोई भी हों , सैकडो मित्र बनाने चाहिये । देखो, मित्र चूहे के कारण कबूतर (जाल के) बन्धन से मुक्त हो गये थे ।
– पंचतंत्र

को लाभो गुणिसंगमः ( लाभ क्या है ? , गुणियों का साथ )
– भर्तृहरि

सत्संगतिः स्वर्गवास: ( सत्संगति स्वर्ग में रहने के समान है )

संहतिः कार्यसाधिका । ( एकता से कार्य सिद्ध होते हैं )
– पंचतंत्र

दुनिया के अमीर लोग नेटवर्क बनाते हैं और उसकी तलाश करते हैं , बाकी सब काम की तलाश करते हैं ।
– कियोसाकी

मानसिक शक्ति का सबसे बडा स्रोत है - दूसरों के साथ सकारात्मक तरीके से विचारों का आदान-प्रदान करना ।

शठ सुधरहिं सतसंगति पाई ।
पारस परस कुधातु सुहाई ॥
– गोस्वामी तुलसीदास

गगन चढहिं रज पवन प्रसंगा । ( हवा का साथ पाकर धूल आकाश पर चढ जाता है )
– गोस्वामी तुलसीदास

बिना सहकार, नहीं उद्धार ।

संस्था / संगठन / आर्गनाइजेशन

दुनिया की सबसे बडी खोज ( इन्नोवेशन ) का नाम है - संस्था ।

आधुनिक समाज के विकास का इतिहास ही विशेष लक्ष्य वाली संस्थाओं के विकास का इतिहास भी है ।

कोई समाज उतना ही स्वस्थ होता है जितनी उसकी संस्थाएँ ; यदि संस्थायें विकास कर रही हैं तो समाज भी विकास करता है, यदि वे क्षीण हो रही हैं तो समाज भी क्षीण होता है ।

उन्नीसवीं शताब्दी की औद्योगिक-क्रान्ति संस्थाओं की क्रान्ति थी ।

बाँटो और राज करो , एक अच्छी कहावत है ; ( लेकिन ) एक होकर आगे बढो , इससे भी अच्छी कहावत है ।
– गोथे

व्यक्तियों से राष्ट्र नही बनता , संस्थाओं से राष्ट्र बनता है ।
– डिजरायली

साहस / पराक्रम / निर्भीकता / आत्मविश्वास

साहसे खलु श्री वसति । ( साहस में ही लक्ष्मी रहती हैं )

इस बात पर संदेह नहीं करना चाहिये कि विचारवान और उत्साही व्यक्तियों का एक छोटा सा समूह इस संसार को बदल सकता है । वास्तव मे इस संसार को इसने (छोटे से समूह) ही बदला है ।

जरूरी नही है कि कोई साहस लेकर जन्मा हो , लेकिन हरेक शक्ति लेकर जन्मता है ।

बिना साहस के हम कोई दूसरा गुण भी अनवरत धारण नहीं कर सकते । हम कृपालु, दयालु , सत्यवादी , उदार या इमानदार नहीं बन सकते ।

बिना निराश हुए ही हार को सह लेना पृथ्वी पर साहस की सबसे बडी परीक्षा है ।
– आर. जी. इंगरसोल

जिस काम को करने में डर लगता है उसको करने का नाम ही साहस है ।

दोष / गलती

गलती करने में कोई गलती नहीं है ।

गलती करने से डरना सबसे बडी गलती है ।
– एल्बर्ट हब्बार्ड

गलती करने का सीधा सा मतलब है कि आप तेजी से सीख रहे हैं ।

बहुत सी तथा बदी गलतियाँ किये बिना कोई बडा आदमी नहीं बन सकता ।
– ग्लेडस्टन

मैं इसलिये आगे निकल पाया कि मैने उन लोगों से ज्यादा गलतियाँ की जिनका मानना था कि गलती करना बुरा था , या गलती करने का मतलब था कि वे मूर्ख थे ।
– राबर्ट कियोसाकी

सीधे तौर पर अपनी गलतियों को ही हम अनुभव का नाम दे देते हैं ।
– आस्कर वाइल्ड

असफलता

जीवन के आरम्भ में ही कुछ असफलताएँ मिल जाने का बहुत अधिक व्यावहारिक महत्व है ।
– हक्सले

जो कभी भी कहीं असफल नही हुआ वह आदमी महान नही हो सकता ।
– हर्मन मेलविल

असफलता आपको महान कार्यों के लिये तैयार करने की प्रकृति की योजना है ।
– नैपोलियन हिल

सफलता की सभी कथायें बडी-बडी असफलताओं की कहानी हैं ।

असफलता फिर से अधिक सूझ-बूझ के साथ कार्य आरम्भ करने का एक मौका मात्र है ।
– हेनरी फ़ोर्ड

धन / अर्थ / अर्थ महिमा / अर्थ निन्दा / अर्थ शास्त्र /

दान , भोग और नाश ये धन की तीन गतियाँ हैं । जो न देता है और न ही भोगता है, उसके धन की तृतीय गति ( नाश ) होती है ।
– भर्तृहरि

हिरण्यं एव अर्जय , निष्फलाः कलाः । ( सोना (धन) ही कमाओ , कलाएँ निष्फल है )
– महाकवि माघ

सर्वे गुणाः कांचनं आश्रयन्ते । ( सभी गुण सोने का ही सहारा लेते हैं )
- भर्तृहरि

संसार के व्यवहारों के लिये धन ही सार-वस्तु है । अत: मनुष्य को उसकी प्राप्ति के लिये युक्ति एवं साहस के साथ यत्न करना चाहिये ।
– शुक्राचार्य

आर्थस्य मूलं राज्यम् । ( राज्य धन की जड है )
– चाणक्य

मनुष्य मनुष्य का दास नही होता , हे राजा , वह् तो धन का दास होता है ।
– पंचतंत्र

अर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः । ( संसार मे धन ही आदमी का भाई है )
– चाणक्य

विकास

सामाजिक नवोन्मेष ( social innovation )

व्यापार

समय

आयुषः क्षणमेकमपि, न लभ्यः स्वर्णकोटिभिः ।
स वृथा नीयती येन, तस्मै नृपशवे नमः ॥

करोडों स्वर्ण मुद्राओं के द्वारा आयु का एक क्षण भी नहीं पाया जा सकता ।
वह ( क्षण ) जिसके द्वारा व्यर्थ नष्ट किया जाता है , ऐसे नर-पशु को नमस्कार ।

समय को व्यर्थ नष्ट मत करो क्योंकि यही वह चीज है जिससे जीवन का निर्माण हुआ है ।
– बेन्जामिन फ्रैंकलिन

किसी भी काम के लिये आपको कभी भी समय नहीं मिलेगा । यदि आप समय पाना चाहते हैं तो आपको इसे बनाना पडेगा ।

क्षणशः कणशश्चैव विद्याधनं अर्जयेत ।
( क्षण-क्षण का उपयोग करके विद्या का और कण-कण का उपयोग करके धन का अर्जन करना चाहिये )

काल्ह करै सो आज कर, आज करि सो अब ।
पल में परलय होयगा, बहुरि करेगा कब ॥
– कबीरदास

अपने काम पर मै सदा समय से १५ मिनट पहले पहुँचा हूँ और मेरी इसी आदत ने मुझे कामयाब व्यक्ति बना दिया है ।

हमें यह विचार त्याग देना चाहिये कि हमें नियमित रहना चाहिये । यह विचार आपके असाधारण बनने के अवसर को लूट लेता है और आपको मध्यम बनने की ओर ले जाता है ।

दीर्घसूत्री विनश्यति । ( काम को बहुत समय तक खीचने वाले का नाश हो जाता है )

अवसर / मौका / सुतार

बाजार में आपाधापी - मतलब , अवसर ।

धरती पर कोई निश्चितता नहीं है , बस अवसर हैं ।
– डगलस मैकआर्थर

संकट के समय ही नायक बनाये जाते हैं ।

आशावादी को हर खतरे में अवसर दीखता है और निराशावादी को हर अवसर मे खतरा ।
– विन्स्टन चर्चिल

अवसर के रहने की जगह कठिनाइयों के बीच है ।
– अलबर्ट आइन्स्टाइन

हमारा सामना हरदम बडे-बडे अवसरों से होता रहता है , जो चालाकी पूर्वक असाध्य समस्याओं के वेष में (छिपे) रहते हैं ।
– ली इओकोक्का

इतिहास

उचित रूप से ( देंखे तो ) कुछ भी इतिहास नही है ; (सब कुछ) मात्र आत्मकथा है ।
– इमर्सन

इतिहास सदा विजेता द्वारा ही लिखा जता है ।

इतिहास, शक्तिशाली लोगों द्वारा, उनके धन और बल की रक्षा के लिये लिखा जाता है ।

जो इतिहास को याद नहीं रखते , उनको इतिहास को दुहराने का दण्ड मिलता है ।
– जार्ज सन्तायन

ज्ञानी लोगों का कहना है कि जो भी भविष्य को देखने की इच्छा हो भूत (इतिहास) से सीख ले ।
– मकियावेली , ” द प्रिन्स ” में

इतिहास स्वयं को दोहराता है , इतिहास के बारे में यही एक बुरी बात है ।
–सी डैरो

संक्षेप में , मानव इतिहास सुविचारों का इतिहास है ।
– एच जी वेल्स

सभ्यता की कहानी , सार रूप में , इंजिनीयरिंग की कहानी है - वह लम्बा और विकट संघर्ष जो प्रकृति की शक्तियो को मनुष्य के भले के लिये काम कराने के लिये किया गया ।
– एस डीकैम्प

इंजिनीयर इतिहास का निर्माता रहा है, और आज भी है ।
– जेम्स के. फिंक

शक्ति / प्रभुता / सामर्थ्य / बल / वीरता

वीरभोग्या वसुन्धरा ।
( यह धरती वीरों के द्रारा ही भोगी जाती है । )

प्रभुता पाई काहि मद नाहीं ।
– गोस्वामी तुलसीदास

समरथ को नहिं दोष गोसाईं ॥
– गो. तुलसीदास

प्रश्न

वैज्ञानिक मस्तिष्क उतना अधिक उपयुक्त उत्तर नही देता जितना अधिक उपयुक्त वह प्रश्न पूछता है ।
भाषा की खोज प्रश्न पूछने के लिये की गयी थी । उत्तर तो संकेत और हाव-भाव से भी दिये जा सकते हैं , पर प्रश्न करने के लिये बोलना जरूरी है । जब आदमी ने सबसे पहले प्रश्न पूछा तो मानवता परिपक्व हो गयी । प्रश्न पूछने के आवेग के अभाव से सामाजिक स्थिरता जन्म लेती है ।
– एरिक हाफर

प्रश्न और प्रश्न पूछने की कला शायद सबसे शक्तिशाली तकनीक है ।

सही प्रश्न पूछना मेधावी बनने का मार्ग है ।

कोई भी प्रश्न मूर्खतापूर्ण ( फुलिश ) नहीं होता ।

जो प्रश्न पूछता है वह पाँच मिनट के लिये मूर्ख बनता है लेकिन जो नही पूछता वह जीवन भर मूर्ख बना रहता है ।

सबसे चालाक व्यक्ति जितना उत्तर दे सकता है , सबसे बडा मूर्ख उससे अधिक पूछ सकता है ।

सूचना / सूचना की शक्ति / सूचना-प्रबन्धन / सूचना प्रौद्योगिकी / सूचना-साक्षरता / सूचना प्रवीण / सूचना की सतंत्रता / सूचना-अर्थव्यवस्था

संचार , गणना ( कम्प्यूटिंग ) और सूचना अब नि:शुल्क वस्तुएँ बन गयी हैं ।

ज्ञान, कमी के मूल आर्थिक सिद्धान्त को अस्वीकार करता है । जितना अधिक आप इसका उपभोग करते हैं और दूसरों को बाटते हैं , उतना ही अधिक यह बढता है । इसको आसानी से बहुगुणित किया जा सकता है और बार-बार उपभोग ।

एक ऐसे विद्यालय की कल्पना कीजिए जिसके छात्र तो पढ-लिख सकते हों लेकिन शिक्षक नहीं ; और यह उपमा होगी उस सूचना-युग की, जिसमें हम जी रहे हैं ।

ज्ञान प्रबन्धन (KM)

लिखना / नोट करना

परिवर्तन

क्षणे-क्षणे यद् नवतां उपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः । ( जो हर क्षण नवीन लगे वही रमणीयता का रूप है )
– शिशुपाल वध

आर्थिक समस्याएँ सदा ही केवल परिवर्तन के परिणाम स्वरूप पैदा होती हैं ।

परिवर्तन विज्ञानसम्मत है । परिवर्तन को अस्वीकार नहीं किया जा सकता जबकि प्रगति राय और विवाद का विषय है ।
– बर्नार्ड रसेल

हमें वह परिवर्तन खुद बनना चाहिये जिसे हम संसार मे देखना चाहते हैं ।
– महात्मा गाँधी

परिवर्तन का मानव के मस्तिष्क पर अच्छा-खासा मानसिक प्रभाव पडता है । डरपोक लोगों के लिये यह धमकी भरा होता है क्योंकि उनको लगता है कि स्थिति और बिगड सकती है ; आशावान लोगों के लिये यह उत्साहपूर्ण होता है क्योंकि स्थिति और बेहतर हो सकती है ; और विश्वास-सम्पन्न लोगों के लिये यह प्रेरणादायक होता है क्योंकि स्थिति को बेहतर बनाने की चुनौती विद्यमान होती है ।
– राजा ह्विटनी जूनियर

नयी व्यवस्था लागू करने के लिये नेतृत्व करने से अधिक कठिन कार्य नहीं है ।
– मकियावेली

नेतृत्व / प्रबन्धन

अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥

कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं ।

विसंगति / विरोधाभास / उल्टी-गंगा

पालन-पोषण / पैरेन्टिग

कल्पना / चिन्तन / ध्यान / मेडिटेशन

उपाय / सुविचार / आइडिया / मंत्र / उपाय-महिमा

कार्यारम्भ / कार्य / क्रिया / कर्म

ज्ञानं भार: क्रियां बिना ।

आचरण के बिना ज्ञान केवल भार होता है ।
– हितोपदेश

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथै: ।

कार्य उद्यम से ही सिद्ध होते हैं, मनोरथ मात्र से नहीं।
– हितोपदेश

जो क्रियावान है, वही पण्डित है । ( यः क्रियावान् स पण्डितः )

जीवन की सबसे बडी क्षति मृत्यु नही है । सबसे बडी क्षति तो वह है जो हमारे अन्दर ही मर जाती है ।
– नार्मन कजिन

आरम्भ कर देना ही आगे निकल जाने का रहस्य है ।
- सैली बर्जर

जो कुछ आप कर सकते हैं या कर जाने की इच्छा रखते है उसे करना आरम्भ कर दीजिये । निर्भीकता के अन्दर मेधा ( बुद्धि ), शक्ति और जादू होते हैं ।
– गोथे

छोटा आरम्भ करो , शीघ्र आरम्भ करो ।

प्रारम्भ के समान ही उदय भी होता है । ( प्रारम्भसदृशोदयः )
– रघुवंश महाकाव्यम्

पराक्रम दिखाने का समय आने पर जो पीछे हट जाता है , उस तेजहीन का पुरुषार्थ सिद्ध नही होता ।

यो विषादं प्रसहते विक्रमे समुपस्थिते ।
तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न सिद्धयति ॥
- - वाल्मीकि रामायण

शुभारम्भ, आधा खतम ।

हजारों मील की यात्रा भी प्रथम चरण से ही आरम्भ होती है ।
– चीनी कहावत

सम्पूर्ण जीवन ही एक प्रयोग है । जितने प्रयोग करोगे उतना ही अच्छा है ।
– इमर्सन

सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप चौबीस घण्टे मे कितने प्रयोग कर पाते है ।
– एडिशन

यदि सारी आपत्तियों का निस्तारण करने लगें तो कोई काम कभी भी आरम्भ ही नही हो सकता ।

एक समय मे केवल एक काम करना बहुत सारे काम करने का सबसे सरल तरीका है ।
– सैमुएल स्माइल

उद्यम / उद्योग / उद्यमशीलता / उत्साह

स्वतंत्र चिन्तन / चिन्तन की स्वतंत्रता

रचनाशीलता / सृजनशीलता / क्रीएटिविटी /

विद्या / सीखना / शिक्षा / ज्ञान / बुद्धि / प्रज्ञा / विवेक / प्रतिभा /

विद्याधनं सर्वधनं प्रधानम् ।
विद्या रूपी धन सभी धनो में श्रेष्ठ है ।

विद्या ददाति विनयम् ।
( विद्या विनयशील बनाती है । )

जिसके पास बुद्धि है, बल उसी के पास है ।
(बुद्धिः यस्य बलं तस्य )
– पंचतंत्र

ज्ञान प्राप्ति से अधिक महत्वपूर्ण है अलग तरह से बूझना या सोचना ।
–डेविड बोम (१९१७-१९९२)

सत्य की सारी समझ एक उपमा की खोज मे निहित है ।
– थोरो

प्रत्येक व्यक्ति के लिये उसके विचार ही सारे तालो की चाबी हैं ।
– इमर्सन

वही विद्या है जो विमुक्त करे । (सा विद्या या विमुक्तये )

विद्या के समान कोई आँख नही है । ( नास्ति विद्या समं चक्षुः )

खाली दिमाग को खुला दिमाग बना देना ही शिक्षा का उद्देश्य है ।
- - फ़ोर्ब्स

अट्ठारह वर्ष की उम्र तक इकट्ठा किये गये पूर्वाग्रहों का नाम ही सामान्य बुद्धि है ।
– आइन्स्टीन

कोई भी चीज जो सोचने की शक्ति को बढाती है , शिक्षा है ।

संसार जितना ही तेजी से बदलता है , अनुभव उतना ही कम प्रासंगिक होता जाता है । वो जमाना गया जब आप अनुभव से सीखते थे , अब आपको भविष्य से सीखना पडेगा ।

गिने-चुने लोग ही वर्ष मे दो या तीन से अधिक बार सोचते हैं ; मैने हप्ते में एक या दो बार सोचकर अन्तर्राष्ट्रीय छवि बना ली है ।
– जार्ज बर्नार्ड शा

दिमाग जब बडे-बडे विचार सोचने के अनुरूप बडा हो जाता है, तो पुनः अपने मूल आकार में नही लौटता । –

जब सब लोग एक समान सोच रहे हों तो समझो कि कोई भी नही सोच रहा । — जान वुडेन

पठन तो मस्तिष्क को केवल ज्ञान की सामग्री उपलब्ध कराता है ; ये तो चिन्तन है जो पठित चीज को अपना बना देती है ।
– जान लाक

4 Responses to “१२वीं अनुगूँज : सुभाषित सहस्र / मेरी तीसरी खेप”

  1. मेरी प्रविष्टि यहाँ है। कुल योगदान = ३१ सूक्तियाँ / उक्तियाँ
    राजेश
    (सुमात्रा)

  2. भइया हमारे सुभाषित भी देख लो।सब खुद के हैं ।

  3. Nexium.

    Nexium.

  4. […] अनुगूंज के पुराने अंक देखिये। एक से एक धांसू लेख लिखे हैं लोगों ने। अपने बारे में और दुनिया के बारे में। विषय वैविध्य भी मजे का रहा। लोगों ने अपने पहले प्यार के किस्से सुनाये। अपने बचपन के मीत के बारे में लिखा। शिक्षा व्यवस्था के बारे में लिखा। धर्म, संस्कृति, फिल्म, संस्कार और न जाने किन-किन विषयों पर लोगों ने अपने लेख लिखे। चुट्कुले संग्रह और हिंदी में सूक्ति संग्रह का उपयोगी काम किया गया। आप अनुगूंज की पुरानी कड़ियां यहां देख सकते हैं। […]

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