अनुगूँज संख्या १३ : संगति की गति

कहा गया है , “चंदन विष व्याप्त नहीं , लिपटे रहत भुजंग” ।
पर , यह साथ-संग की स्थिति , जड़ और चेतन के लिये तो ठीक है । चल जाता है , विषधर और विषहीन का साथ । उपमा भी , अच्छी बन पड़ती है । लेकिन , व्यावहारिक जगत में , जब इस साथ का रूपान्तरण , चेतन प्राणियों के बीच होता है , तो कितना व्यावहारिक होता है यह साथ ? क्या कुसंग के प्रभाव / दुष्प्रभाव सहज-असहज रूप में स्थानान्तरित नहीं होते हैं ?
तो , क्या , सिर्फ सत्संग ही काफी है , आदर्श समाज स्थापित करने के लिये ?
मनोविज्ञान के किन रास्तों से होते हुए , संगति अपना प्रभाव डालती है ?
सोच कर के किन निष्कर्षों पर पहुँचते हैं आप ? लिखिये । कभी ऐसा हुआ हो कि , किन्हीं सम्बन्धों के बारे में , काफी बाद में आप ने सोचा हो , कि , ऐसे सम्बन्ध बनाये रखने से तो , अच्छा था , निस्संग फिरते रहना !
कुसंग सदैव अप्रिय रहा है , अवांछित रहेगा । सत्संग दुर्लभ है , फिर भी श्रेयस्कर रहेगा । लेकिन फिर भी , जिस तरह , शरीर के एक अंग के अस्वस्थ होने पर , दूसरे अंग उसकी देख-रेख करते हैं , उस तरीके से , समाज के बारे में सोचना क्या उपयुक्त है ? यानी , कुसंग को भले न स्वीकारें , पर उसे सही दिशा और उचित रास्ते पर लाने के लिये प्रयास करने से विमुख न होवें !
बात को वैचारिक मंथन की दरकार है । यह प्रश्न , भिन्न-भिन्न रूपों में , उठता रहा है। मसलन , “क्या सिर्फ विचारों से किसी को , खुद अपने आप में या अन्य में बदलाव लाना मुमकिन है ? ” या , व्यावहारिक आचरण के प्रभाव और अनुकरण भी किसी दूरगामी अर्थपूर्ण और स्थायी महत्व के परिवर्तनों के लिये आवश्यक हैं ? ” आप की नजर में क्या है इस मनोविज्ञान का रहस्य ? और , व्यावहारिक जीवन में इन पर अमल करना कितना मायने रखता है ?
आइए , सोचें जरा।
और लिखें , अपने विचार , अपने ब्लाग पर।
मसौदा तैयार होने पर , सूचना दें ।
हम इन्तजार में हैं , आप के प्रविष्टि की।
–राजेश
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




बहुत अच्छा , राजेश भाई । विषय भी बहुत रोचक और (सदा)सामयिक है । आपकी स्वतः-स्फूर्ति काबिले-तारीफ़ है । बधाई !!!
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[…] अभी कुछ समय पहले एक ब्लॉग प्रविष्टि पढ़ी, बड़ी रोचक लगी। इस पर खूब मनन भी किया, हर चिट्ठाकार की तरह मन में विचार आया कि मौका लगते ही इस पर एक प्रविष्टि पेल दूँगा। अभी इस विचार को मन में घूमते हूए कुछ समय ही हुआ था कि राजेश जी सुमात्रा वालों ने अनुगूँज तेहरवीं की घोषणा कर दी। पढ़ी गई प्रविष्टि का तात्पर्य था कि हम अपने शरीर की बेहतरी के लिए तो नाना प्रकार के व्यायाम करते हैं, करते हैं न, पर मन की बेहतरी के लिए कुछ भी नहीं करते। हर तरफ से जो इनपुट आ रही है बस लिए जा रहे हैं। कभी प्रयास नहीं करते की कुछ अच्छा जाए दिमाग में। तो मन के बेहतरी के लिए क्या – सत्संग। यानि अच्छे लोगों का साथ। उनके विचारों का आत्मसात। यही सत्संग विषय है इस अनुगूँज का। […]
[…] [परिचयों की कड़ी में अगली कड़ी है राजेश कुमार सिंह । राजेश का आज जन्मदिन है। आप उनको शुभकामनायें दे सकते हैं तथा उपहार के रूप में राजेश द्वारा आयोजित तेहरवीं अनुगूंज में अपना लेख लिख सकते हैं। विषय है -संगति की गति।] […]