चिट्ठों के बाद क्या?

वैसे मैं इतना लिखता नहीं हूँ, पर जिनकी रैगिग लेते हैं उनके लिए बदले मे कुछ तो करना ही पड़ता है इसलिए झेलो।

अधिकारिक तौर पर चिट्ठों का सैकड़ा पार हो चुका है। वैसे आजकल जिधर देखो उधर हिन्दी के चिट्ठे फिंके मिलते हैं, लेकिन कमाल की बात अग़र कोई है तो वह है एक बढ़िया समुदाय का निर्माण

हिन्दुस्तानी लोग (हाँ कुछ ग़ैर भी हैं, पर अधिकतर हिन्दुस्तानी ही हैं) मिल जुल कर काम करने के लिए जाने नहीं जाते हैं, और अग़र मिलते जुलते हैं तो बाते ज़्यादा बनाते हैं और काम कम। लेकिन यहाँ तो बातें ही बनाने का काम था, इसलिए शायद दिक्कत नहीं आई।

ग़ौरतलब बात यह है कि जिसने भी कोई उपकरण बनाने, सहायक लेख लिखने, या आतिथ्य के लिए प्रयास किया, अपनी दिलचस्पी से किया, और एक दूसरे की बात का ख़याल रख के किया। जाल पर झड़प होना बहुत आसान है, आमने सामने जो नहीं हैं। पर ऐसा कभी हुआ नहीं। कम से कम सार्वजनिक तौर पर तो नहीं, निजी तौर पर हुआ हो तो पता नहीं। यह एक बहुत अच्छी बात है। हाँ, कुछ अपवाद तो हैं, पर उन झड़पों की वजह से कुछ बढ़िया काम ही हुए, दुर्गति नहीं।

अक्सर देखने में आया है कि कुछ लोग जोड़ तोड़ में अच्छे होते हैं, और कुछ सुन्दर लेखन में। यह बहुत अच्छी बात है कि अच्छा लिखने वाले और उनको अच्छा लिखने के उपकरण प्रदान करने वाले - दोनो को एक ही मञ्च पर वार्ता करने का अवसर मिला।

मैंने ९ २ ११ लिखना शुरू क्यों किया? एक प्रयोग ही था, और साथ ही एक अकेलापन था - यानी जाल पे - कुछ डाक सूचियों पर हिन्दी में किसी ने सवाल पूछा था, तो तुरन्त उसे झिड़कियाँ मिल गईं। उस व्यक्ति का मैंने समर्थन किया, तो मुझे भी मिलीं। मुझे लगा कि कोई ऐसी जगह तो होनी चाहिए जहाँ मैं अपनी मर्जी से जो चाहे लिख सकूँ। इस सब को करने में हनुमान जी का इसमें बहुत बड़ा योगदान था। सबसे पहले मैंने हिन्दी आल्ट.लॅङ्ग्वेज.हिन्दी पर ही देखी थी। अग़र यूज़्नेट न होता तो शायद मैं हिन्दी में न लिख रहा होता।
जैसे जैसे लोगों को पता चलता है कि ये सब करना कितना सरल है, लोग उसे करने को अग्रसर होते हैं।

एक और बात उन दिनों देखी कि हिन्दी में जाल पर काम करना सरल नहीं है। सचमुच में इसके लिए दृढ़ निश्चय चाहिए। लोग फ़ट्टे पेलने और मीन मेख निकालने में आगे हैं, पर रचनात्मक कार्य करने वाले लोग कम हैं। तो सोच लीजिए आप लोग, जो सचमुच इतना सब करते हैं, सिर्फ़ लोकैषणा (टिप्पण्यैषणा) के लिए, कितने महान, दृढ़निश्चयी हैं और कितने परिपक्व हैं!

अन्तर्जाल पर जो इतनी सारी चीज़े हैं, वह सब सरकार ने या किसी कम्पनी ने वहाँ नहीं डाली हैं। लोगों ने अपने खाली समय में, दिन भर मेहनत करने के बाद, घर वापस आ कर (या कभी कभी दफ़्तर में भी) इन सबको बनाया है। इसका एहसास तभी होता है जब खुद ये सब करने जाओ। हाँ चिट्ठाकारी ने प्रकाशन को बहुत सरल कर दिया है। पहले पहल जब लिखना शुरू किया, तो सोचा था कि हर रोज़ कुछ लिखूँगा, डायरी की तरह। पर हो नहीं पाया। उस समय प्रकाशन के उपकरणों के बारे में अधिक नहीं मालूम था। इस प्रकार लेखन में दुतरफ़ा संवाद भी नहीं था।

भला हो टिप्पणियों का।

बिना प्रोग्रामिङ्ग जाने, और बिना कभी एक दूसरे को मिले, बातचीत, विचारों का आदान प्रदान करने की इस सुविधा ने ही बेड़ा पार लगाया है। हाँ अब तो हिन्दी में डाक भेजना भी सरल है, पहले नहीं था। इसीलिए यूज़नेट की शक्ति को समझना चाहिए।
चिट्ठाकारों को एक मञ्च प्रदान करने और बेनाम शीर्षकों के पीछे की शक्लों और व्यक्तित्वों को उजागर करने से ही सामूहिक कार्यों में सफलता मिली है।

पर आगे क्या? मुझे लगता है कि चिट्ठों के आगे कुछ सोचना चाहिए।

नेट्स्केप की निर्देशिका में देखें तो पाएँगे कि फ़िलहाल 20% चिट्ठे ही हैं। वास्तविक गिनती में उन्नीस बीस का फ़र्क हो सकता है, अधिक नहीं।

चिट्ठों के आगे कुछ सोचना चाहिए।

यह कुछ वैसा ही व्यक्तव्य है जो मेरे एक मित्र ने कुछ साल पहले कहा था।

हमें हिन्दी के लिए कुछ करना चाहिए।

पर क्या?

यही तो सवाल है जो अनुत्तरित रह जाता है।

पर उसका जवाब सोचेंगे, और जवाब अपने आप मिलेगा, शायद वैसा जवाब न मिले जैसा हम सोच रहे हों। मैंने ये तो ज़रूर सोचा था कि हिन्दी के चिट्ठों की सङ्ख्या बढ़े, पर इस बात का कभी गुमान न था कि हिन्दी के जालराजों व लेखकों का जाल पर इतना सशक्त समुदाय होगा।

आप सबको साधुवाद।

9 Responses to “चिट्ठों के बाद क्या?”

  1. आलोक भाई,
    काफ़ी दिनो बाद आपका विस्तृत लेख देखने को मिला, तबियत प्र्सन्न हो गयी.
    चिटठो के बाद क्या? इस पर तो एक सम्मेलन या अनुगूँज का आयोजन होना चाहिये, जिसमे सभी चिटठाकार अपने अपने विचार प्रकट करें.

  2. इस पर तो एक सम्मेलन या अनुगूँज का आयोजन होना चाहिये,

    ठीक है, इसका आयोजन मैं करूँगा। बहुत दिनों से आतिथ्य से बच भी रहा हूँ।

  3. बहुत अच्छे. इसी तरह के आलोकित करने वाले लेख की आशा थी.आशा है कि आगे भी लेख नियमित अंतराल में आते रहेंगे.फिर से बधाई.

  4. हिन्दी के आदि-चिट्ठाकार को इस अवसर पर शत्-शत् बधाइयाँ !!

  5. आलोक के अनुभव लगभग मेरे जैसे ही हैं. मेरा जियोसिटीस पर ग़ज़ल का पेज हिन्दी पीडीएफ़ में था. उसे आलोक के कहने पर ही यूनिकोड में लाया. देबाशीश के बताने पर ब्लॉग की शुरूआत की. ये दोनों तो, हिन्दी ब्लॉग जगत के पितृपुरूष हैं.

    इन्हें फिर से बधाईयाँ.

  6. […] लोक तथा देबाशीष का जिक्र करते हुये लिखाहै:- देबाशीष के बताने पर ब्लॉग क […]

  7. गुरु जी, आप लिखे अच्छा लगा। अब इसे आदत बना डालिए।

    पंकज

  8. […] न कर रही थी। कुछ दिनों पहले आलोक ने चिट्ठों के बाद क्या? पूछ्कर पीड़ा और बढ़ा […]

  9. […] विचार-विमर्श Posted in Blogs at 4:00 pm by IndicBlogger चिट्ठों के बाद क्या हो? यह सवाल आलोक ने उ […]

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