ब्लॉग और यूज़नेट के बीच

मेरा शुरू से मानना रहा है, और समय के साथ यह धारणा दृढ़ ही हुई है, कि ब्लॉग व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के माध्यम हैं, सामूहिक विचार-विमर्श के नहीं। पर बावजूद इस तकनीकी सीमा के, अक्सर चिट्ठाकार अपने चिट्ठों के जरिये मुद्दे उठाने और उनपर बहस के लिए निमंत्रण देने से पीछे नहीं रहे हैं। और कई बार टिप्पणियों में असहमतियों और पूरक विचारों के रूप में ब्लॉग पोस्टों को अच्छा प्रतिसाद भी मिला है। पर बहस कुल मिलाकर नदारद ही रही है। दोष बहुत आधारभूत है और ब्लॉग के प्रारूप से जुड़ा है। बल्कि इसे दोष कहना भी ज़्यादती होगी क्योंकि ब्लॉग के मूल उद्देश्यों में बहस कभी थी भी नहीं। सामूहिक विचार-विमर्श के लिए ब्लॉग प्रारूप की अनुपयुक्तता इन कुछ बिन्दुओं से जाहिर होती है -

* टिप्पणियों का पंक्तिरूप (लीनियर) होना - सूत्र (थ्रेड) आधारित न होने की वजह से उत्तर-प्रत्युत्तरों को सन्दर्भ में रख पाना मुश्किल हो जाता है।
* चिट्ठों का विकेन्द्रीकरण - एक ही मुद्दे पर कई जगह चर्चा हो रही होती है। इसकी वजह से चर्चा आगे बढ़ते जाने के, कई जगहों पर समानान्तर चलती रहती है।
* फ़ोकस कर पाने की मुश्किल - आम तौर पर हर ब्लॉग पाठक दिन में कई ब्लॉग पढ़ता है और अपने विचार भी कई चिट्ठों जाहिर करता है। और फिर अगले रोज़ शायद किन्हीं दूसरे चिट्ठों पर टिप्पणियाँ करता है। यह पूरी प्रक्रिया बिना किसी ट्रैकिंग के चलती है। इस वजह से अक्सर पाठकों का अपनी टिप्पणियों के उत्तरों को देख पाना या उनका फ़ॉलो-अप कर पाना कठिन हो जाता है। और इस तरह कई रास्ते बीच में बन्द हो जाते हैं।

पर जैसा कि मैंने ऊपर कहा, ब्लॉगकार कई ऐसे मुद्दों को उठाते रहते हैं जिन पर अक्सर चर्चा की आवश्यकता महसूस होती है। ब्लॉगों की खासियत, जिसमें उनकी सरलता मुख्य है, को बरकरार रखते हुए इस कमी को कैसे पूरा किया जाये?

कई दिनों से गाहे-बगाहे यह कमी या रिक्तता मुझे परेशान कर रही थी। कुछ दिनों पहले आलोक ने चिट्ठों के बाद क्या? पूछ्कर पीड़ा और बढ़ा दी। पिछले दिनों अनूप गूगल टॉक पर मिले तो उनसे भी ज़िक्र छेड़ा। उन्होंने सुझाया कि अक्षरग्राम पर बात रखूँ। तो लीजिये हाज़िर हूँ। और एक समाधान के साथ। एक प्रस्तावित मिडलवेयर जो ब्लॉगों और चर्चा-समूहों को आपस में जोड़ सके। कुछ तीन-चार अलग-अलग उपायों से उठा-पटक करने के बाद यह प्रस्तुत है। पर इसके बारे में कुछ कहने के बजाय मैं चाहूँगा कि आप खुद इसे बरतें, जाँचें, परखें और देखें कि यह ब्लॉग पोस्टों पर परस्पर संवाद मंच की आवश्यकता को कैसे और किस हद तक पूरा कर पाता है। साथ ही इसके बाकी उपयोगों को ढूँढना भी आप पर ही छोड़ता हूँ। बेशक, सुझावों का स्वागत है। यूआरएल यह रही -

http://groups.google.com/group/charcha

19 Responses to “ब्लॉग और यूज़नेट के बीच”

  1. विनय भाई,
    आपका ख्याल बहुत नेक है, इस बारे मे पह्ले भी चर्चा हो चुकी है, और वास्तव मे अड़्डा तो तैयार है
    बस आप लोगो का इन्तजार है. जरा यहाँ नजरे इनायत कीजिये

    www.jitu.info/forum

    इस फ़ोरम मे आप अपनी पसन्द के टापिक बना सकते है, और खूब जम कर बहस कर सकते है. किसी और चीज की दरकार हो तो बन्दा हाजिर है.

  2. http://groups.google.com/group/charcha

    वाऊ, दिस इज़ सो कूल!

    के अलावा और क्या कहूँ?

    पहले तो मैंने सोचा था कि क्या एक और डाक समूह?

    फिर देखा अन्दर के सन्देशों को, तो समझ आया कि माजरा क्या है।
    बहुत उम्दा।
    देखते हैं आगे क्या होता है।
    सदस्यता ले ली है, विनय जी आपने ये किया कैसे?

  3. I was thinking of mentioning this, when I saw that Jitu has already replied. The basic problem that this forum has faced is that
    1. It was not publicized well and
    2. People usually hate to enroll to 10 different media on the same topic.

    Overall, I think it is the best idea for threaded conversation.

    IMHO, the Chitthakar group is also very suitable for such conversation and we have a very good database of users here. Only hitch is may be that all are not aware as to how we should use this. For Chitthakar users here is a suggestion when participating in a thread:
    1. When replying to a existing thread of discussion, quote the earlier conversation when replying through email. When using the web-interface, instead of using the “Reply” link at bottom, click on the “options” link and click the “Reply” button. This will “quote” the earlier reply. For some strange reasons Google has kept the behavior of these two “Reply” links different, the bottom link does not “quote” the conversation.
    2. To view the threaded conversation, click on the topic and you would see a “tree view” of conversation on the left pane. This framed version is appropriate to carry on a conversation in thread. If you have chosen “No Frames”, you might not see this left pane.

    Do let me know what you think.

    Best,

    -Debashish

  4. जीतू/देबाशीष,

    बात जगह की तो थी ही नहीं। गूगल, याहू कहीं भी एक नया फ़ोरम ५ मिनटों से कम में खोला जा सकता है। और पहले से jitu.info पर एक फ़ोरम है ही। ‘चिट्ठाकार’ भी है।

    दर्ख़्वास्त है कि एक बार फिर से “चर्चा” को देखें। दरअसल यह एक ब्लॉग-से-फ़ोरम गेटवे की परिणति है। दूसरा, इसका मूल उद्देश्य बस कोई भी चर्चा करना नहीं बल्कि हिन्दी ब्लॉग जगत की प्रविष्टियों पर चर्चा करना है। तीसरा, यह ओपन है (कम से कम अभी तो), वैसे ही जैसे अधिकतर चिट्ठों की टिप्पणियाँ होती हैं। यानि बहस में कोई भी शामिल हो सकता है - चिट्ठाकार हो या गैर।

    कुछ लोकप्रिय भारतीय अंग्रेज़ी ब्लॉगों के लिए मैंने ऐसा ही एक समूह यहाँ बनाया है -

    http://groups.google.com/group/samvaad

    ==
    आलोक,

    जैसा कि मैंने ऊपर कहा, यह मूलतः एक ब्लॉग-से-फ़ोरम गेटवे है। और यह किया मैंने एक आरएसएस-से-ईमेल गेटवे एप्लिकेशन, एक एसएमटीपी सर्वर, और एक फ़ोरम (गूगल-समूह) की सीधी सी जुगत लगाकर।

  5. मुझे लगता है लोगों को समझ नहीं आया है कि चर्चा है क्या। एक बार जा के देखें, यह कोई ऐरा गैरा डाक समूह नहीं है।

  6. आइडिया अच्छा है, पर मुझे कुछ कहना है। जो मैं ने देखा, उस हिसाब से इस समूह में पंजीकृत सभी ब्लॉगों की हर प्रविष्टि स्वतः इस समूह पर एक नया चर्चा सूत्र खोल देती है। आप का मतलब है कि प्रविष्टि ब्लॉग पर पढ़ी जाए, फिर चर्चा “चर्चा” पर की जाए, या फिर प्रविष्टि भी चर्चा पर ही पढ़ी जाए। यदि मेरी समझ में कुछ फेर है तो समझाया जाए।

    यह चर्चा करने के उद्देश्य से तो अच्छा है, पर टिप्पणियों और सांख्यिकी (stats) के प्यासे ब्लॉगरों के लिए एक और दर्द-ए-सर। यानी अब पाठक आप के चिट्ठे पर क्यों आएगा? आएगा भी तो एक बार। ब्लॉग व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के माध्यम तो हैं, पर वह काम तो व्यक्तिगत जालस्थलों से भी हो ही रहा था। ब्लॉग को ब्लॉग बनाती हैं सीधी टिप्पणियाँ, जो न सिर्फ कुछ हद तक वार्तालाप में सहायक होती हैं, पर चिट्ठाकार और उस के पाठकों का एक कड़ियों का नेटवर्क बनाने में भी मदद करती हैं। वार्तालाप जैसा भी है, उसे चिट्ठे पर ही रहने दिया जाए तो बेहतर है। उसे पूरी तरह चर्चा समूह में ले जाना मुश्किल होगा, हाँ वार्तालाप बंट ज़रूर जाएगा (जैसे यह वार्तालाप बंट गया है), जिससे कोई भला नहीं होगा। बाकी चिट्ठाकारी से सम्बन्धित मुद्दों के लिए “चिट्ठाकार” समूह है ही।

    जहाँ तक ख़ुद चर्चा समूहों का सवाल है, जितना केन्द्रीकरण हो उतना अच्छा। एक ही विषय पर जितने छोटे छोटे छुटपुट समूह खुल रहे हैं, उतने ही वे असफल रहते हैं। विनय के गूगल समूह “हिन्दी” को सफल करने की आवश्यकता है। यह याहू के हिन्दी समूह (जिस में प्रबन्धन अहिन्दी भाषियों के हाथ होने से कई बार हिन्दी का भला होने की बजाय नुक्सान हुआ है) का स्थान लेना चाहिए और मिल के कोशिश हो तो ले सकता है।

  7. पुनश्च -

    इस तरह का चर्चा समूह तब सफल होगा जब सभी चिट्ठाकार अपने चिट्ठे पर टिप्पणियाँ निष्क्रिय करें और एक कड़ी दें - “इस प्रविष्टि पर चर्चा यहाँ करें”। क्या सभी चिट्ठाकार ऐसा करने के लिए तैयार हैं?

    जहाँ तक जीतू के फोरम का सवाल है, मेरा सुझाव है कि किसी भी साझे प्रयास को जहाँ तक हो सके साझे स्थान पर रखा जाए (अक्षरग्राम इस का एक अपवाद है)। पहला कारण यह कि व्यक्‍तिगत रूप से हम लोग सस्ती होस्टिंग ही खरीद पाते हैं और वह हमेशा reliable नहीं होती, दूसरा यह कि साझे स्थान पर एक व्यक्ति के उपलब्ध न होने पर दूसरे लोग प्रबन्धन कर सकते हैं। इसलिए चिट्ठाकार अभी तक बढ़िया है।

  8. >>मुझे लगता है लोगों को समझ नहीं आया है कि चर्चा है क्या।
    As far as I could get, the Google group created created by Vinay get the latest blog posts through Email (similar to the “Bloglet” service) as and when the posts are made. The Subscribers to the “Charcha” group get these Email Posts and can discuss on this. Am I correct Vinay?

    On this thought I agree with Raman that I would rather have the conversation on my blog through my blog comments for my posts rather than on a separate location. Moreover, regular visitors to the site will have no idea about the group conversation, unless we tag every post with the associated conversation link, as Raman pointed.

  9. रमन भाई ने सही मुद्दे उठाए और ये सब तो इस प्लग-इन की मदस से अक्षरग्राम चौपाल पर भी किया जा सकता है. यहां अधिकतर सदस्य हैं और ये सबसे अधिक जाना पहचाना है.

    threded comment प्लग-इन

    बात करने वाले २० बात करने के अड्डे बनेंगे पच्चीस - जी इधर आओ जी उधर जाओ जी मै लगाउंगा गूगल के विज्ञापन कल को. मैने देखा है फ़ोरम्स पर हुए वाद विवादों का हश्र - आपसी कुत्ता- फ़जीती ज्यादा और चर्चा कम! मैने आज तक किसी को भी आपस मे सहमती से कोई चर्चा किसी निदान या निर्णय पर पहूंचते नही देखी - हां सूचनाओं या तकनीकों के आदान प्रदान वाली थ्रेड्स की बात अलग हैं और मनोरंजक वाली की भी बाकी बहसबाजी ब्लड-प्रेशर बढाने के सिवा कुछ नही या सारे मिल कर लेंगे परनिंदा परमसुख. फ़ोरम्स से तंग आ कर ब्लाग्स की तरफ़ रुख किया है - आपको जो लिखना है आप अपने ब्लाग पर लिखो मै कडी दे कर अपने पर लिखूंगा और जो लिखूंगा जिम्मेदारी से लिखूंगा ये विधी मेरे लिये तो यूं भी काम करती है!

    फ़िर पोस्ट लिखने वाला तय करे ना की वो बहस चाहता है या ब्लाग फ़िर उस हिसाब से लिखे या इधर या ब्लाग पर आप तय करने वाले कौन? ख्वामखां! हमने ब्लाग लिखा अपनीं हांकने के लिए, अपनी भडास निकालने के लिए और चाहा आप पढ लो हमारे यहां आके, अगर आप चाहो, नही जमे, तो एक मिमियाती हुई टिप्पणी कर दो की हम हमारे घर मे इस पर दहाडेंगे और कडी दो, सो करो! पर आप चाहते हैं बहस, की नही भईये मै तो सिद्ध करूंगा की तुमसे ज्यादा समझदार हूं तो तभी करो जब हम वो मौका एज़ ए ब्लागर देना चाहें किसी चौपाल पर - क्या समझे? हर पोस्ट को आप अपनी मरजी से बहस मे कैसे बदल लोगे?

    भाईयों अपनी उर्जा बहस करने मे नही आधारभूत काम करने मे लगाओ - वर्तनी सुधारने के उपाय, आसान और मुफ़्त हिंदी होस्टिंग के उपाय किसी गैर तकनीकी आदमी की मदद के उपाय और हिंदी के निष्काम सेवा के उपाय. जब देखो नए नए अड्डे बनाने की मेंटेलिटी से बाज आओ यार - कुकुरमुत्ते उगाना छोडो!

  10. Debashish:

    >>The Subscribers to the “Charcha” group get these Email Posts and can discuss on this. Am I correct Vinay?

    Absolutely, Debashish.

    >> Moreover, regular visitors to the site will have no idea about the group conversation, unless we tag every post with the associated conversation link, as Raman pointed.

    Again, absolutely true. Raman is also right in his comments. It is totally on users to want to use it. It’s just a concept which I found useful and actually felt a need of, personally. I don’t expect everyone to have the same kind of interest in discussions. In fact so far that has generally been true of the Hindi community on the net. We can see how the lone usenet group for Hindi — alt.language.hindi — is nothing but a place for spam. Other Hindi groups fare hardly better. I thought it might change, but apparently I am wrong.

    >> भाईयों अपनी उर्जा बहस करने मे नही आधारभूत काम करने मे लगाओ - वर्तनी सुधारने के उपाय, आसान और मुफ़्त हिंदी होस्टिंग के उपाय किसी गैर तकनीकी आदमी की मदद के उपाय और हिंदी के निष्काम सेवा के उपाय. जब देखो नए नए अड्डे बनाने की मेंटेलिटी से बाज आओ यार - कुकुरमुत्ते उगाना छोडो!

    स्वामी जी, मुझे विश्वास है कि आप यह नहीं चाहेंगे कि कोई आपको बताये कि भैया ये करो और ये मत करो। मुझे तो बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। इसी तरह मेरी “मेंटेलिटी” को आप जज़ करने की कोशिश न करें तो मेहरबानी होगी।

    मैंने जो ये किया वह स्वान्त सुखाय था। मेरी ज़रूरत थी, मैंने कर लिया। सोचा अगर किसी और की भी ऐसी ही ज़रूरत हो तो उसके भी काम आ जायेगा। तो सबके सामने रख दिया। ये कहाँ कहा मैंने कि सबको इसे इस्तेमाल करना ही पड़ेगा। जिसे काम का लगेगा वो बरतेंगे, न लगेगा तो मेरे काम तो आ ही रहा है।

    और जहाँ तक रही बात हिंदी के लिए निष्काम सेवा की, तो स्वामी जी ऐसा नहीं है कि अगर आपके दर्शनों के लिए कोई नहीं आया तो उसका किया धरा व्यर्थ हो गया। कुछ लोग निष्काम का अर्थ भी समझते हैं।

  11. ॐ शान्ति शान्ति!

    सबसे पहले तो विनय भाई को धन्यवाद कि उन्होने एक अच्छी चीज हमारे सामने पेश की. मै अपनी पिछली टिप्पणी, चर्चा को बिना ज्यादा एक्स्प्लोर किये की थी. चर्चा एक अच्छी सोच है, हमे इसका स्वागत करना चाहिये.
    लेकिन विनय भाई, ब्लाग अपने आप मे इन्टरेक्टिव होते है, टिप्प्णी के माध्यम से, और हर ब्लागर चाहेगा कि उसके लिखे की चर्चा उसके ब्लाग पर ही हो. क्या आप नही चाहेंगे ऐसा? इसलिये रमण के प्वाइन्ट भी वाजिब है.

    लेकिन मेरे विचार से चर्चा का प्रयोग थोड़ा सा हट के किया जा सकता है, कैसे?
    आप ब्लाग के फ़ीड ना लेकर, बीबीसी हिन्दी या किसी और यूनीकोड साइट के फ़ीड लीजिये(कापीराइट का पंगा पहले समझ लीजियेगा), फ़िर उन फ़ीड(समाचारो) के ऊपर यदि किसी ब्लागर ने लिखा है तो उसे भी उठा लीजिये. फ़िर सभी को एक फ़ोरम(आपका चर्चा वाला ग्रुप) मे एक थ्रेड की तरह पेश कर दीजिये….समाचार का समाचार, चर्चा की चर्चा. बाकी सारे गुणीजन है जैसा ठीक समझे.

    स्वामी जी, आपके इरादे हमेशा नेक होते है, लेकिन थोड़ा भाषा मे साफ़्ट्नैस लाइये, यदि भाषा कड़ी होगी तो अच्छी बात भी बुरी लग सकती है. बाकी आप स्वयं विद्वान है, खुद निर्णय लें.

  12. […] ा. विनय ने सुझाया है कि ब्लाग के आगे यूजनेट समूह के माध्यम से विचार-विमर्श क […]

  13. यह तो हमारे ऊपर ही निर्भर है न कि संवेदनशील मुद्दों पर भी सभ्यता से चर्चा करना सम्भव हो? कहा सुनी होने के डर से क्या मञ्च पर प्रवेश ही न करना उचित है?
    क्या केवल दूसरों की बुराई करने के लिए ही फ़ोरम होते हैं? ज़रूरी है कि बहस, बद्तमीज़ी भरी ही हो? बद्तमीज़ी तो चिट्ठों की टिप्पणियों में भी की जा सकती है, लोग करते हैं क्या?
    यदि वार्ता का एक और माध्यम मिल रहा है तो उसे आजमाने में क्या हर्ज़ है? बिना प्रयोग में लाए किसी वस्तु को बेकार करार देना क्या उचित है?
    यह प्रतिरोध क्यों?

  14. chuu.Nki mujhe jo kahanaa hai wah tho.Daa zyaadaa lambaa hai, mai.n charcha par likh rahaa huu.N. ka.Dii -

    http://groups.google.com/group/charcha/msg/6d7062269c7fbb18

  15. hindi me blog likhne ka maja hi kuchh aur hai

  16. refinance dallas…

    psychiatry.Shapiro twitched Thetis Archie mortgage bad credit http://mortgage-bad-credit.time-4mortgages.com/

  17. health insurance carrier

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  18. EWFEF

  19. póquer dado

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