अनुगूँज 14: हिन्दी जाल जगत: आगे क्या?

Akshargram Anugunj

पन्द्रह सितम्बर 2005 वाले पखवाड़े के अनुगूँज का विषय है

हिन्दी जाल जगत: आगे क्या?

इस पर पहले भी चर्चा हो चुकी है, लेकिन उसका उल्लेख करके आपको पूर्वाग्रहग्रस्त न करते हुए केवल एक तथ्य (तथ्य, राय नहीं) आपके सामने पेश करता हूँ।

हिन्दी के कुल जालस्थलों की सङ्ख्या इस वक़्त छः सौ से कुछ अधिक है। पर निश्चय ही सात सौ से कम है।

इनमें भी काम की चीज़ ढूँढने जाएँ तो रो पिट कर अन्य भाषाओं के स्थलों से काम चलाना पड़ता है।

अब इस तथ्य से सम्बन्धित अपनी राय दीजिए।

(1)
क्या यह स्थिति वाञ्छनीय है?
यदि हाँ, तो क्यों?
यदि नहीं तो क्यों नहीं?

(2)
इतना तो निश्चित है कि जाल पर हिन्दी बढ़ेगी।
पर क्या बढ़ने की रफ़्तार वही रहेगी जो अभी है?
या रफ़्तार कम होगी?
या रफ़्तार बढ़ेगी?

(3)
क्या हिन्दी जाल जगत को सर्वाङ्गीण विकास की आवश्यकता है? क्या विकास की दिशा का नियन्त्रण किया जाना चाहिए या इसे अपने आप फलने फूलने या ढलने देना चाहिए? साथ ही, वैयक्तिक रूप से क्या हम इस विकास पर कोई असर डाल सकते हैं?

ज़रूरी नहीं कि इन सभी पहलुओं पर आप लिखें, यह भी ज़रूरी नहीं कि आप इनमें से किसी भी पहलू पर लिखें। अनुगूँज की चेंपी लगी होगी तो आपके लेख को शामिल कर लिया जाएगा :)

अन्ततः यह अवसर देने के लिए धन्यवाद।

अनुगूँज है क्या?

अपने लेखों की कड़ियाँ टिप्पणियों में डालने का कष्ट करें। या फिर ट्रॅकबॅक कर दें (आज तक मुझे पता नहीं चला है कि यह करते कैसे हैं)। लेख के साथ अनुगूँज की छवि लगाना न भूलें।

13 Responses to “अनुगूँज 14: हिन्दी जाल जगत: आगे क्या?”

  1. पुनीत पाण्डे की ओर से प्रेषित -

    आलोक जी,
    अक्षरग्राम पर टिप्‍पणी डालने का प्रयास किया तो यह मिला -

    Sorry but the total effect of your comment’s actions and conduct during the
    successive phases of its existence, did not justify giving it a second
    chance in this world of pain and misery…
    In other words: it got trashed.
    Bad Karma, man, bad karma…
    इस बुरे कर्म का प्रायश्चित क्‍या है ? :-)
    वैसे मेरी टिप्‍पणी इस प्रकार थी -

    आलोक जी,

    सर्वप्रथम तो यह कहने की आवश्‍यकता नहीं कि आपके प्रयास काबिले तारीफ हैं। मेरा
    एक सुझाव है जो कि मेरे अनुसार हिन्‍दी को आगे ले जाने के लिए अतिआवश्‍यक भी
    है। मेरे अनुसार हमें (पूरे ब्‍लॉग लेखकों को) अतिसाहित्यिक होने के बजाय
    सामान्‍य रुचि के विषयों पर लिखने की आवश्‍यकता है। केवल एक-दूसरे के चिठ़ठों
    पर टिप्‍पणी करके हम हिन्‍दी को इन्‍टरनेट पर आगे नहीं ले जा सकते। उदाहरणार्थ
    12वीं अनूगूंज ‘संगति की गति’ जैसे मुद्दों को अनुगूंज में उठाकर सामान्‍य
    पाठकों को हम अनुगूंज से विमुख कर रहे हैं।

    पुनीत पाण्‍डे
    http://www.hindiblogs.com

  2. ध्यान दें - अनुगूँज का विषय “हिन्दी जाल जगत: आगे क्या?” है, “हिन्दी चिट्ठा जगत:आगे क्या नहीं”।

  3. ध्यान दें - अनुगूँज का विषय “हिन्दी जाल जगत: आगे क्या?” है, “हिन्दी चिट्ठा जगत:आगे क्या?” नहीं।

  4. पुनीत जी,

    स्पैम कर्मा ने आप से ऐसा व्यवहार किया इस के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। पर फिर भी स्पैम कर्मा प्लगइन के कर्ता के हंसमुख मिजाज की तो तारीफ करनी पड़ेगी।

    जहाँ तक अनुगूँज के विषयों को प्रश्न है तो जनाब वह तो समय समय पर बदलते रहते हैं। अनुगँज आप का अपना मंच है अगले अनुगूँज के आयोजन के लिए आप आमंत्रित हैं।

    पंकज

  5. […] इस पर विचार - १) स्थिती वांछनीय नही, भाषा जानने वालो के अनुपात मे कम है. […]

  6. आलोक द्वारा पुनीत को दिये गये निमंत्रण का मै अपनी पूरी शक्ति से समर्थन करता हूँ । इसमें अपनी सोच और क्षमता दिखाने का भरपूर गुंजाइश है । ( और इससे सुन्दर सजा भी नहीं है )

    आलोक द्वारा अनुगूँज के लिये उठाया गया विषय अत्यन्त समीचीन और महत्वपूर्ण है ।

    अनुनाद

  7. पुनीत जी,
    अनुगूँज के नियमानुसार, प्रत्येक आयोजक को अपना विषय चुनने का हक होता है, जो राजेश भाई ने चुना और इस हक पर किसी को भी अंगुली नही उठानी चाहिये. हो सकता है विषय आपकी पसन्द का हो, लेकिन हमे कोई हक नही बनता कि हम किसी दूसरे की कार्यप्रणाली मे कुछ हस्तक्षेप करें, अत: यदि आप इस विषय पर लिखना चाहे तो आपका स्वागत है. यदि आपको लगता है कि विषय काफ़ी गम्भीर है तो आप अपने लेखन द्वारा उस विषय को लिखकर(जैसे फ़ुरसतिया जी ने लिखा) विषय को सामान्य रुचि का बना सकते है.

    आशा है आप मेरे कहे को पाजिटिव रुप से लेंगे और बुरा नही मानेंगे.

  8. पुनीत जी,
    अनुगूँज के नियमानुसार, प्रत्येक आयोजक को अपना विषय चुनने का हक होता है, जो राजेश भाई ने चुना और इस हक पर किसी को भी अंगुली नही उठानी चाहिये. हो सकता है विषय आपकी पसन्द का ना हो, लेकिन हमे कोई हक नही बनता कि हम किसी दूसरे की कार्यप्रणाली मे कुछ हस्तक्षेप करें, अत: यदि आप इस विषय पर लिखना चाहे तो आपका स्वागत है. यदि आपको लगता है कि विषय काफ़ी गम्भीर है तो आप अपने लेखन द्वारा उस विषय को लिखकर(जैसे फ़ुरसतिया जी ने लिखा) विषय को सामान्य रुचि का बना सकते है.

    आशा है आप मेरे कहे को पाजिटिव रुप से लेंगे और बुरा नही मानेंगे.

  9. अनुगूँज 14 : हिन्दी जाल जगत : आगे क्या ?

    इस विषय पर मेरे विचार यहाँ देखें :
    http://pratibhaas.blogspot.com/2005/09/14.html

  10. अनुगूँज 14 : हिन्दी जाल जगत : आगे क्या ?
    मेरे विचार इस कड़ी पर देखें
    http://nishants.net/hindi/wordpress/?p=4

  11. लो भैया हमारी प्रविष्टि को भी देखा जाय
    http://www.jitu.info/merapanna/?p=406

  12. […] यह चर्चा आरंभ करने के लिए आलोक का धन्यवाद। […]

  13. अनुगूँज 14 : हिन्दी जाल जगत : आगे क्या ?

    इस विषय पर मेरे कुछ और विचार जिनको पिछली प्रविष्टि में नहीं लिख पाया था , यहाँ देखें :

    http://pratibhaas.blogspot.com/2005/09/blog-post_24.html

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