तेरहवीं “अनुगूँज”: संगति की गति - एक अवलोकन

अनूगँज

संगति की बात की थी , मैंने , तेरहवीं “अनुगूँज” के माध्यम से ।

गति का प्रयोग लाक्षणिक रूप से किया गया था , अभिप्राय “परिवर्तन” और प्रभावों से था ।

लिहाजा , “सत्संगति” के साथ-साथ “विसंगतियों” का भी जिक्र होना स्वाभाविक ही था ।

पन्द्रह सितम्बर तक जब कोई प्रविष्टि नहीं दिखी , तो मुझे लगने लगा कि , तेरहवीं “अनुगूँज” कहीं तेरह की अशुभ मार का शिकार न हो जाये।

तत्काल , मुझे अक्षरग्राम पर , लिखना पड़ा , “का चुप साध रहा बलवाना” और , फिर जिन बलशालियों ने बल लगा कर गाड़ी निकाली , पहले तो उन सभी का धन्यवाद ।

अनूप , जीतेन्द्र , अनुनाद , पंकज , महावीर शर्मा , आशीष , नीरज त्रिपाठी , इन्द्र अवस्थी , सभी का धन्यवाद , इस अनुगूँज में , अपने विचार व्यक्त करने के लिये , इस “अनुगूँज” को आकार देने के लिये , अपने अपने अन्दाजे बयाँ में ।

सबसे पहली प्रविष्टि , बतौर जन्मदिन की रिटर्न गिफ्ट , मिली , “फुरसतिया” पर , कीर्तन मण्डली के संवादों से छूट कर , नर्तकी मण्डली (कौवी-कौवा) की चौपाल पर पहुँचे , अनूप कुमार शुक्ला से ;

“संगति,गति जैसे स्त्रीलिंग शब्द सुन पूरी की पूरी कौवी सी.बी.आई. में तब्दील हो गई। मिसाइल दागी-ये संगति,गति कौन हैं? किस पेड़ पर रहती हैं ? वर्चुअल हैं या रियल ?इनकी यूजर आई.डी. क्या हैं ? ”

“कौवा बोला- जैसा करेंगे वैसा भरेंगे। ये कम थोड़ी हैं ।इन्होंने कम अनाचार थोड़ी ही किये हैं। मार तारीफ के लोगों का जीना मुहाल कर दिया । अब झेलें।शायद यही संगति की गति है।”

”यानी , संगति की गति का प्रथम नियम : “जैसा करेंगे , वैसा भरेंगे ”

लेकिन कन्या ने पास आते ही बिना कुछ कहे उनके मुंह में माइक ठूंस दिया।”

“सवाल:- ये भाई साहब में बड़े काहे जोड़ा है ? क्या इनको पता नहीं भाई साहब का मतलब ही बड़े भाई साहब होता है ?”

हमें तो लेखक , प्रेमचंद की कहानी “बड़े भाई साहब” से प्रेरित हुआ लगता है ! लेकिन बिना इस बात पर ध्यान देते हुए , आगे बताया गया कि,

“ देख रहीं हैं गरदन विनम्रता से झुकी है सबेरे से। लग रहा है कट गई। ”

“सवाल:-लेकिन गति से तो नकारात्मक बोध होता है। संगति की गति से लगता संगति का यही हश्र होता है।गति ,दुर्गति का बोध कराती है।”

इसीलिये , शायद “संगति की गति” , सभी को “विसंगति” का ही बोध पैदा करती रही । और , इन्हीं विसंगतियों को पकड़ा अनूप ने , कुछ इस तरह :

“अपने मन से चाहें जो कूड़ा फैलाते रहें लेकिन अनुरोध करने पर कालजयी लिखने का बोध पाल लेते हैं। ”

“संगति की गति पर लेख लिखना अलग बात है।उसका गणित बहुत जटिल है। ”

“संगति को ,अच्छी या बुरी , बनाना आसान होता है। निभाना कठिन होता है।”

और , इस परिदृश्‍य का अन्त हुआ , विदेशी मुद्रा के नखरे जैसा :

“कन्या अपने सारे लटके-झटके अपने जुगराफिये में समेट कर विदेशी मुद्रा की तरह मटकती हुयी चली जा रही थी। जन्मदिन की सारी कीर्तन मंडली कन्या के पीछे हिंदी में चिट्ठा लिखने की तरकीबों के लिंक दिखाते हुये साथ-साथ सटते हुये चलने की कोशिश करते हुये अपने-अपने पन्ने पर लिखने का अनुरोध कर रहे थी।”

इस कन्या के चाल से आहत हुए , कुवैत में , जीतेन्द्र । लिखते हैं ,

“पढने का तो शौंक बहुत था, अक्सर किताबे पढा करते, लोटपोट,मधुमुस्कान, दीवाना,इन्द्रजाल कामिक्स से बात शुरु हुई तो राजन इकबाल के बाल जासूसी नावेल्स से होती हुई, रानू,गुलशन नन्दा के सामाजिक नावेल्स से गुजरती हुई, वेद प्रकाश शर्मा और दूसरे जासूसी नावेल्स पर जाकर खत्म हुई. बुक शाप वाले से भी दोस्ती गांठ ली थी, वो एक पचपन साठ साल का बुड्डा था.एक दिन उसने मेरे को एक पालीथीन मे लिपटी हुई एक किताब थमाई और बोला अकेले मे जाकर पढना, बहुत धांसू है.”

“हीन लोगों की संगति से अपनी भी बुद्धि हीन हो जाती है , समान लोगों के साथ रहने से समान बनी रहती है और विशिष्ट लोगों की संगति से विशिष्ट हो जाती है।”
महाभारत से ली गयी उपरोक्त सूक्ति का व्यावहारिक अनुभव भी है , जीतेन्द्र के पास ।

“वे रामकृष्ण मिशन पुस्तकालय मे पुस्तकालयाध्य्क्ष थे. मै रोजाना लाइब्रेरी मे जाता, चार बजे लाइब्रेरी खुलती थी और शायद सात बजे बन्द होती. मै कुछ घन्टे तो किताबों मे उलझा रहता, उसके बाद एक घन्टा स्वामीजी और हम विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करते. अक्सर चर्चायें धर्म,राजनीति, समाज और मानवीय संवेदनात्मक रिश्तो पर होती. ”

“मै बहुत सवाल पूछता था, सवाल दिमाग मे आया नही कि स्वामीजी पर दाग देता था,स्वामी जी अक्सर मेरे ऊलजलूल सवालों का धेर्यपूर्वक जवाब देते. सारे सवालो को उदाहरण पूर्वक समझाते, कभी कभी सम्बंधित कहानी किस्से भी सुनाते.”

अनूप टिप्पणियाएः “हर अनुभव का धनात्मक पहलू देखा करो भाई.”
पंकज ने भी सुझावों से लाभान्वित किया , “जीतू जी इन गलियों से कौन नहीं गुजरा । बचपन जवानी में माँ बाप हजार चीजें समझाते हैं - वे इसलिए कि वे इस दौर से गुजर चुके होते हैं । ”

इस “अनुगूँज” की बेहतरीन प्रविष्टियों में से एक थी , हाँ भाई ! यानी , पंकज नरूला की ; शुरूआत में ही कसौटी पर कसना शुरू किया , विषय को ;

“हम अपने शरीर की बेहतरी के लिए तो नाना प्रकार के व्यायाम करते हैं, करते हैं न, पर मन की बेहतरी के लिए कुछ भी नहीं करते। हर तरफ से जो इनपुट आ रहा है बस लिए जा रहे हैं। कभी प्रयास नहीं करते की कुछ अच्छा जाए दिमाग में। तो मन के बेहतरी के लिए क्या – सत्संग। यानि अच्छे लोगों का साथ। उनके विचारों का आत्मसात। यही सत्संग विषय है इस अनुगूँज का।”

एक और बढ़िया उदाहरण दिया ,

“शोले का अमिताभ, धर्मेन्द्र का कोई भी अवगुण न मानकर सारी बात दोस्तों के संग पर ही डाल देता है।”

बतौर लेखक , अपनी उपस्थिति का भी अहसास कराया , पंजाबी के बोल , लिख कर ,

माँ की बचपन में कही गई एक बात अब भी याद है और वेगास जाते वक्त अब भी याद कर लेते हैं – “विक्की कौडियाँ नाल खेडदे खेडदे मोहरां नाल वी खेलनां आपे शुरु कर देंदे नें ।”

लास वेगास जो नहीं गये , अभी तक , उनको अपना अनुभव बताते हैं:

“लास वेगास की बात शुरु हुई है तो एक और बात बताता हूँ। इतने बड़े स्केल पर जूआ, शराब, शबाब होते देखकर अच्छे अच्छे पशोपश में पड़ जाते हैं कि यार इतने लोग कर रहें हैं तो इसमें क्या बुराई है। अपन भी कर के देखते हैं। सिग्रेट पीने वाले तो इस बात के गवाह हैं कि सिग्रेट संगति से ही आरम्भ होती है।”

और , अन्ततः , सारतत्व को बाँधा , इन सारगर्भित शब्दों में :

“मनसा वाचा कर्मणा यानि मन, वाणी व कर्म तीनों का सदूपयोग ही समाज का भला कर सकता है। मैं कितना भी उपदेश दे दूँ पर यदि खुद कर्म से उस का पालन नहीं करता यानि आचरण में नहीं है तो भूल जाओ कोई और या मेरे बच्चे वैसा करेंगे।”

अनुनाद ने , विषय की निराले अन्दाज में परख कीः

“संगति का प्रभाव बहु-आयामी है । गुरू का महत्व परोक्ष रूप से संगति के महत्व को कुछ और नाम देना है । ”

“संगणक और संजाल ने चिर परिचित सत्संगति को एक नया रूप प्रदान किया है । इस नये रूप में सत्संगति बहुत हद तक स्थान (देश) , समय (काल) और व्यक्ति (गुरू) की सीमाओं से मुक्त हो गयी है।”

आगे , एक असहज से सत्य को अभिव्यक्त करते हुए , कहते हैं;

“आधुनिक शिक्षा के उच्चतम स्तर पर शिक्षक और शिक्षार्थी में भेद समाप्त हो जाता है ।”

संगति के दृष्टिगोचर होने वाले प्रभावों को लिखा ;

“प्राय: दो या अधिक व्यक्तियों के अपूर्ण विचार मिलकर एक पूर्ण और सार्थक रूप धारण कर लेते हैं ; या दो या अधिक व्यक्ति मिलकर कुछ ऐसा कर जाते हैं जो अकेले कभी संभव न होता ।”

“इसको चाहें तो आप सगति ( एक साथ उठना , बैठना या गति ) का प्रभाव मानें या संहति ( मास , एकता या एसोसिएशन ) का प्रभाव ।”

शायद यह भी एक वजह है , कि , लोग एक अच्छे दल के साथ कार्य करना पसन्द करते हैं क्योंकि , व्यक्ति की उत्पादकता , दल के अन्य सदस्यों की उत्पादकता से भी प्रेरित और प्रभावित होती है।

“गेहूँ के साथ घुन का पिसना या रावण के पडोस मे बसने से समुद्र की महिमा घटना इसके कुछ उदाहरण हैं।”

पन्डित कोई जाति या जन्तु नहीं , बताते हुए लिखा:

“पण्डित वह है जो संगति के प्रभाव को अधिकाधिक अर्थपूर्ण बनाने की कला जानता है ।”

आशीष “अखण्ड बेवडो” के बीच जाने का साहस करते हैं , यथार्थ तक पहुँचने के लिये ,

“ऐसे काफ़ी लोग दिख जायेगें , जो “अखण्ड बेवडो” के साथ रहते हुवे भी शराब छूते तक नही.”

“महाभारत युद्ध मे संजय , विदुर और भीष्म पितामह के होते हुवे भी कौरवो ने क्या सीखा ? जबकी असुरों के बीच मे रहते हुए प्रह्लाद और विभीषण जैसे सन्त हुये हैं.”

आशीष के उदाहरण काफी हैं , मेरे विचार से , विषय वस्तु को समझने - समझाने के लिये ।

“हिन्दीनेस्ट” की वेब साईट पर , मैंने एक साक्षात्कार पढ़ा , सुप्रसिद्ध इतिहासकार प्रो॰ इरफान हबीब का , जहाँ , वे बताते हैं , “किसी देश को अपने इतिहास की क्यों जरूरत होती है ? उसको इसलिये जरूरत होती है जैसे एक व्यक्ति को अपनी याद्‍दाश्त की जरूरत होती है । अगर वह व्यक्ति सफल होना चाहता है , तो उसकी याद्‍दाश्‍त को एक्यूरेट होना चाहिये। जहाँ उसने गलतियाँ की हैं , उसे याद होना चाहिये।”

कुछ और अच्छे सुभाषित भी , आशीष के प्रयास से पढ़ने को मिले :

“मैंने विद्वानों की संगति से कुछ-कुछ ज्ञान प्राप्त किया तब मैंने अपनी अल्पज्ञता का अनुभव किया और मेरा अहंकार ज्वर की भाँति उतर गया।”

“अच्छे लोगों की संगति करो। ऐसा कभी मत समझो कि अब तो देर हो गई। ”

“लेकिन क्या कोरी संगति महत्वपूर्ण है , या संगति द्वारा कर्म और मन पर होने वाला प्रभाव ?
सन्त तिरुक्कुरळ कहते है:
“मन की होना शुद्धता, तथा कर्म की शुद्धि ।
दोनों का अवलंब है, संगति की परिशुद्धि ॥”

सन्त तिरुक्कुरळ के शब्दो में
“मिट्टी गुणानुसार , ज्यों, बदले वारि-स्वभाव ।
संगति से त्यों मनुज का, बदले बुद्धि-स्वभाव ॥ ”

तुलसी कहते हैं
“एक घड़ी , आधी घड़ी, आधी में पुनि आधि,
तुलसी संगति साधु की , हरै कोटि अपराध।

मैंने कुछेक सुभाषित ही यहाँ उद्धृत किये हैं। बाकी के लिये सराहना व्यक्त की जा रही है।

महावीर जी की प्रविष्टि विस्तार से लिखी गयी प्रविष्टि है।

“साधारणतयः कुसंगत के पात्रों को कुछ ऐसे अवगुणों से जोड़ा गया है जिसमें समाज-विरोधी व्यवहार और आचरण, आक्रमणात्मकता, बात को ना समझना, हिंसा, उत्पात मचाना, विकृत व्यक्तित्व, आत्महत्या, नशीली ड्रग्स-सेवन, अपराध करने में लज्जा ना होना आदि वृत्तियां जो किसी प्रकार उनमें आ जाती हैं। कुछ किशोरावस्था में वातावरण के कारकों से बिगड़ जाते हैं और अधिकांश बड़े होकर इस जाल में से बाहर आ जाते हैं।”

विषय के तकनीकी पहलुओं पर भी लिखते हुए बताते हैं ,

“वैज्ञानिकों के अनुसार यह सम्भव है कि दवाओं से भी ऐसे मनोरोगों की कुछ रोक थाम हो सकती है। इस दिशा में अनुसंधान जारी है। समस्या यह है कि सरकार ऐसी दवाओं के मिलने के कारण मूल सामाजिक-कारणों के उपचार से ध्यान हटा लेती है।”

व्यावहारिक जीवन में पैदा होने वाली विसंगतियों का जिक्र करते हुए लिखते हैं;

“जब हम संगति की बात करते हैं तो ध्यान केवल अवांछनीय व्यक्तियों तक ही रह जाता है। हम ऐसी ‘संगति’ को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जो हमारे मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव डालते हैं। इन ‘संगतियों’ में सब से पहली ‘संगत’ है - मीडिया, विशेषतयः टी.वी., फ़िल्में जहां क़त्ल, बलात्कार, जुर्म की दुनिया का क्रियात्मक खुलासा, नग्न अश्लीलता, खलनायक की भव्यता और ग्लैमर इन तस्वीरों में होते हुए भी युवा दर्शकों की आंखों की राह से गुज़र कर सीधे मस्तिष्क की चेतना को झंकारने लगते हैं।”

“जो व्यक्ति एक चिड़िया के घायल होने पर द्रवित हो जाता था, इन फिल्मों को देख देख कर हत्या और बलात्कार का आदी हो जाता है।”

“भरत मुनि के नाट्य-शास्त्र में इसी कारणों को ध्यान रखते हुए रंग मंच पर हत्या और मृतक शरीर का निषेध किया गया था।”

कुछेक , प्रामाणिक तथ्यों की भी जानकारी मिलती है , महावीर जी के लेख से ,

“लैनर्ड बरकोविट्ज़ का कहना है कि व्यक्ति प्राकृतिक रूप से उग्र और आक्रामक होता है किंतु वह इस पर नियन्त्रण रख के दबाता रहता है। हिंसात्मक और उग्रात्मक टी.वी. प्रोग्राम, फिल्में, टी.वी. सीरियल इस नियन्त्रण को कम कर देते हैं और आगे चल कर हिंसात्मक स्वभाव सामान्य हो जाता है। ऐसे प्रोग्राम देखने से बच्चों में उग्र स्वभाव बढ़ जाता है। (सिंगर एंड सिंगर के प्रयोग के अनुसार- १९८१)। ”

“ह्यूसमैन एंड ऐरन, १९८६ - २२ वर्ष के अध्ययन से निष्कर्ष निकाला कि ८ वर्षीय बालक जो हिंसात्मक फिल्में देखते थे, ३० वर्ष की आयु तक किसी न किसी हिंसात्मक-अपराध में पकड़े गये थे।”

“इस ‘झूठी शान’ से झूठ बोलने की इतनी अधिक आदत पड़ जाती है कि सत्य बात निकालें तो गले में फंस जाती है।”

निश्‍चित रूप से , महावीर शर्मा की यह प्रविष्टि , इस विषय पर सोचे जाने वाले तमाम दृष्टिकोणों को प्रस्तुत करती हुई और तमाम तथ्यों को सामने लाने वाली एक बहुत उम्दा प्रस्तुति थी।

अब , आगे की जिन दो प्रविष्टियाँ का उल्लेख किया जा रहा है , वे हैं तो मूलतः बधाई सन्देश। लेकिन उनके बारे में कहा है,
“जिनकी बाँकी भृकुटि के भय से , देवन को न सम्हलते देखा ,
उनको ब्रज में , गोपिन के संग , रस-राग-रंग में रंगते देखा । ”
यानी , प्रविष्टि आयी तो है , आधुनिक ब्रज यानी अमरीका से , अपने वरिष्ठ जन को बधाई देते हुए , पर कहते हैं ;

“शुकुल बडे महीन हैं, लखनऊ की गालियों की तरह - जो पडती हैं पर खाने वाले को समझ में नहीं आतीं और जब आती हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है. शुकुल से कल बात हो रही थी तो पता चला कि शुकुल को आज २-४ ब्लाग और करीब १६ टिप्पणियां समर्पित की जा चुकी हैं.”

“मेरे ख्याल से आसपास के मुहल्ले से लेकर शहरों तक कोई ऐसा कवि, कथाकार, साहित्यकार नहीं बचा होगा जहां यह चिट्ठाकार अपनी कार से न पहुंच गया होगा.”

“बनाने वाले का कम्प्यूटर क्रैश हो गया होगा (कम्प्यूटर लैंगुएज ‘सी’ की भाषा में कोर डम्प) ऐसे प्राणी को रचकर. शुकुल जसपाल भट्टी के वह ट्रैजिक एपिसोड हैं जिसका चयन पुरस्कार के लिये कामेडी की श्रेणी में हुआ हो.”

फिर , महकते , खुशबू देते , और चटपटेपन के स्वाद के साथ दी गयी शुभकामना संदेश ,का अन्दाजे बयाँ , कुछ यूँ है :

“शुकुल दिवस पर यही कामना है कि वह दिन-पर-दिन इसी तरह बसियाते रहें जिससे इनकी चावल वाली महक, दारू वाली मस्ती और अचार का चटपटापन न केवल बरकरार रहे बल्कि बढता भी रहे.”

दूसरा बधाई सन्देश , जो कनिष्ठ पात्र के लिये है :

“कविताएं कभी हमें पढ़ के समझ में नहीं आतीं. कोई प्लेट में सजा के लाये और बताये कि देखो इस प्रसंग में कितनी अच्छी बात कही गयी तो थोड़ा समझ में आती है. या कोई कवि फर्स्ट हैंड सुना रहा तो बाडी लैंगुएज के साथ जल्दी समझ आती है.”

आगे की बात , बतौर शुभकामनाएँ ,

“जूनियर परंपरानुसार पुत्रवत होता है । लिहाजा बधाइयाँ और शुभकामनाएँ.”

नीरज त्रिपाठी ने अपनी बातें कहने के लिये कविता की विधा चुनी । इस अभिनव और अनूठे प्रयास में , संदेश देते हुए नीरज लिखते हैं:

“कहत कहै देओ एक कान सुनि दूजे देई निकार। भले बुरे सब तन के मनई मिलैं बनै संसार।।”

कविता की एक और पंक्ति भी ध्यान खींचती हैः

संगत तौ मनइन केर है मनइन मा गुण औ अवगुण। सदगुण सदगुण चुन लेओ भोला का होई देखि कै अवगुण।।”

और , अन्त में आत्मसाक्षात्कार करते हुए , मुझे भी इकबालिया बयान तो देना ही पड़ेगा ! तो , मेरा अपना बयान कुछ यूँ है (मेरा मानना है कि , शायद , किसी न किसी स्तर पर, आप इससे अवश्‍य सहमत होंगे ।) :

यदि , आप अपने आचरण के प्रति खुद ईमानदार हैं तो जीवन में , किसी सलाहकार की जरूरत नहीं पड़ती ।”

“मुझे , इसलिए यह जान पड़ता है , कि संगति , कुसंगति , और सत्संगति के प्रभाव तो पड़ते हैं , क्योंकि संगति के प्रभाव से मनोविज्ञान प्रभावित होता है और , मनोविज्ञान बदलने से विचार बदलते हैं , फिर आचार , फिर व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व । अतएव , मुझे रवीन्द्र नाथ टैगोर का “एकला चलो रे” का आवाह्न या भगवान बुद्ध का “अप्पदीपो भवः” का संदेश ज्यादा यथार्थपरक , शाश्‍वत और कालजयी लगते हैं । और , ये संदेश , मुझे दूर तक दुनिया के मायावी संगतियों , विसंगतियों से , बतौर सामान्य व्यक्ति , अपनी अस्मिता की रक्षा प्रदान करने में अधिक समर्थ जान पड़ते हैं।”
।। इति श्री ।।
।।सर्वे भवन्तु सुखिनः , सर्वे सन्तु निरामयाः।।

One Response to “तेरहवीं “अनुगूँज”: संगति की गति - एक अवलोकन”

  1. बढ़िया आयोजन किया अनुगूंज का। अब नियमित लिखो भी अनुगूंज में ।

Leave a Reply