संगत केर गति- नीरज त्रिपाठी
[नीरज त्रिपाठी अनुभूति के याहू ग्रुप के सदस्य हैं। नियमित कवितायें लिखते हैं। आज उनकी कविता देखी ‘संगत केर गति’। कविता रोचक जानकर यहां दे रहा हूं। अनुभूति ग्रुप तथा नीरज त्रिपाठी को आभार देते हुये। कविता का मजा लें और नीरज को पटायें /उकसायें ब्लाग लेखन के लिये।मैंने तो ‘मेलानुरोध’ कर दिया।]
चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग और हियां सब हमरे साथी हमका करते तंग हम भोले भाले प्राणी सब कहते हमका भोलू हमरे हिय की हालत कैसी किससे हम यह बोलूं जब खाएं सब पिज्जा बर्गर हम खा लेई केला इत्ते सारे संगी साथी भोलुवा तबहूं अकेला संगी खाएं गोश्त चिकन हम भोलू शाकाहारी बोलैं मार ठहाका कब तक घास फूस तरकारी जब पियैं सब व्हिस्की हम लै लेई कोका कोला भोलू अब बड़े हुइ जाओ एक साथी हमते बोला देर रात तक जागैं संगी हम जल्दी सोए जाई सुबह देर तक सोवैं संगी हम उठ दौड़ लगाई लौट के आई तुरत करै हम लागी प्राणायाम देखि कहैं हमरे साथी भोलुआ क न कोई काम कहैं प्रकट भये हैं बाबा सब इनका करौ प्रणाम भोलू कहि कहि के जब हारे बाबा दीन्हिन नाम कहत कहै देओ एक कान सुनि दूजे देई निकार भले बुरे सब तन के मनई मिलैं बनै संसार एक रोज बौरावा मनवा मारी गय यह मति हम लागेन तुरत टटवालै संगति केर गति ऎसी देखी वैसी सोंची का का देखी का का सोंची सोंचेन ठीकै है सब कइका समय कौन सोंची पति पत्नी आजीवन संघै रहिकै बदल न पावत पति पत्नी का पत्नी पति का जीवन पर्यन्त सतावत कुत्तौ दयाखौ चाहें जौने मालिक संग रहि जावै अच्छा मालिक चाहें खराब पूंछ टेढ़ रहि जावै संगत तौ मनइन केर है मनइन मा गुण औ अवगुण सदगुण सदगुण चुन लेओ भोला का होई देखि कै अवगुण -नीरज
संगत केर गति
Filed under: कविता, हास्य व्यंग

अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




अनूप भाई
नीरज की ‘संगत की केर गति’ यहां देने के लिये धन्यवाद। मैं ने भी नीरज को आज
ही ई मेल भेज कर सुझाया है कि वह अपना ब्लॉग आरम्भ करे और e Blogger का लिंक भी दे
दिया है। मुझे आशा है कि इस कार्य में अनूप भाई की छत्र-छाया में तकनीकी समस्या का तो सवाल ही नहीं होगा।
हां, एक और बात है कि नीरज केवल ‘अनुभूति ग्रुप’ के ही सदस्य नहीं बल्कि विभिन्न कवि-सम्मेलनों और मुशायरों में कवि के रूप में भाग लेते रहते हैं। हिन्दी और अंग्रेज़ी कविताएं और लेख “अभिव्यक्ति”, “अनुभूति”, “साहित्यकुञ्ज”,”महावीर”, “poetry.com” “शर्मा होम”,”हिंदी नेस्ट” आदि अनेक जालघरों में प्रकाशित होते रहते हैं। साथ ही परिवार और मित्रों के जमघट में कविताएं पढ़ते रहे हैं।
‘कादम्बिनी क्लब’ के सदस्य भी हैं। उनका एक संक्षिप्त सा परिचय नीचे लिखे लिंक पर देख सकते हैं।
महावीर
लगता है परिचय का लिंक देना ही भूल गया। बूढ़ी हड्डियों में दिमागं भी बूढ़ा हो गया।
लिंक हैः
http://www.mpsharma.com/?page_id=11
अहा ! हृदय आनन्द-विभोर हो गया । सर्वविध सुन्दर कविता है ।
नीरज जी अगर अपना चिट्ठा आरम्भ करें तो हिन्दी-चिट्ठा-जगत और तेजस्वी हो जाय ।
bahut badiya mitea , majaa aa gayel yee taa hamar din charyaa haa.
bahut sundar baa
बहुत खूब. अनूप भाई आपको भी धन्यवाद।
नीरज आपकी कविताएं निरंतर पढने को मिलेगी ऐसी आशा रखता हूं.
-संजय बेंगानी
neeraj bhaiya bade batuni,
hansi hansi mein kah det hain baaten khuni.
nek sui chubhayke khud to rah muskay,
unke mircha lag rahe kah bhi na payn.
पति पत्नी आजीवन संघै रहिकै बदल न पावत
पति पत्नी का पत्नी पति का जीवन पर्यन्त सतावत
वाह! क्या ख़ूब कही.
मैं भी आपको इंटरनेट पर अपने चिट्ठा स्थल सहित आमंत्रित करता हूँ.
[…] -नीरज त्रिपाठी […]
बहुत सुन्दर रचना है बाकी अभी बहुत कुछ पढने एंव समझने को बाकी है
मेरे ब्लाग http://dilkadarpan.blogspot.com पर पधार कर अपनी टिप्पणी से मेरी रचनाओं का मुल्याकंन करने की कृपा करें
विशेष रूप से मेरी एक कविता “केवल संज्ञान है” जो http://merekavimitra.blogspot.com पर प्रेषित है आप की टिप्पणी की प्रतीक्षा में है
मोहिन्दर
नीरज भैया साचि कही, सब मिलि करौं बिचार ।
आसा है मिलिबे पढनको नयी कविता बारंबार ॥
आशा है ऒर भी पढ़ने को मिलता रहेगा।
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copious manometers,Stephenson!
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