बातों बातों में देबाशीष

शब्दांजलि में साक्षात्कार का स्तम्भ शुरु हुआ तो खोज हुई हिंदी की जानी मानी हस्ती की। बातों बातों में हाथ आये अपने देबाशीष चक्रबर्ती। सवाल-जवाब का मजा लिया जाये। साथ में देखें अपने जीतेन्दर बाबू का बहुचर्चित लेखमोहल्ले का रावण दहन । साथ में और भी बहुत कुछ प्रस्तुत किया है सारिका ने शब्दांजलि में । एक बार पढ़ तो लें।

3 Responses to “बातों बातों में देबाशीष”

  1. अरे भाई आपतो ठैहरे वेब दुनिया के पुराने खिलाड़ी पर हम तो अभी भी नौसिखुवा हैं आप को किसप्रकार प्रभावित कर सकैं यह नहीं जानें पर आप मेरे गुरू कहलायें तब हम मानें।

  2. मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!
    मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!

    याद आता है समां वो जब हुआ था रुबरु,
    दिल ने तभी था चाहा कि हो दोस्ती शुरु,
    बुज़दिल था मैं जो कह न पाया, यही मान लो,
    मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!

    कितने किये इशारे पर रही तू बेखब़र,
    थे अरमां अपने कबसे बने तू हमसफ़र,
    आसां न रहा लिखना प्रेमपत्र जान लो,
    मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!

    तेरे सलोने रूप में खोया हुँ मैं सदा,
    उन्मुक्त सी हँसी तेरी जाती है गुदगुदा,
    रह न पाऊँगा तेरे बिन इतना जान लो,
    मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!

    चेहरा तेरा निर्दोष है मासूमियत भरा,
    हिरणी सी आँखों में हो जैसे भरी सुरा,
    अनुराग मेरा तुमसे है पवित्र जान लो।
    मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!

    मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!
    मित्र मान लो, प्रिये मुझे मित्र मान लो!

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