अज आखां वारिस शाह नूँ

आज जहाँ दीवाली पर लाखों दिए जल रहें हैं वहीं पंजाबी कविता का एक दिया हमेंशा के लिए अमर-ज्योति में विलीन हो गया। अभी अभी विनय जी के हिन्दी पर खबर पढ़ी की अमृता प्रीतम नहीं रही। उनकी कविताएं का मैं बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूँ। एक कविता जो कि विभाजन पर लिखी गई थी मुझे कभी नहीं भूलती -

अज आखां वारिस शाह नूँ
कि तूँ कब्रां विच्चों बोल
ते अज किताबे इश्क दा
तूँ नवाँ वरका फोल
इक रोई सी धी पंजाब दी
तूं लिख लिख मारे वैन
अज लखां धीयां रोंदिया
तैनूं वारिस शाह नूं कैण

आज हम किस वारिस शाह से कहें?

One Response to “अज आखां वारिस शाह नूँ”

  1. सही कहा पंकज भाई,
    अमृता प्रीतम जी सचमुच हिन्दी साहित्य का एक जगमगाता सितारा थी, उनके जाने की कमी हम सभी को खलेगी।

    आप बहुत दिनो बाद आये, कहाँ रहे इतने दिन? कुछ तो ब्लागियाइये…

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