अज आखां वारिस शाह नूँ
Posted on नवम्बर 1st, 2005 द्वारा पंकज
आज जहाँ दीवाली पर लाखों दिए जल रहें हैं वहीं पंजाबी कविता का एक दिया हमेंशा के लिए अमर-ज्योति में विलीन हो गया। अभी अभी विनय जी के हिन्दी पर खबर पढ़ी की अमृता प्रीतम नहीं रही। उनकी कविताएं का मैं बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूँ। एक कविता जो कि विभाजन पर लिखी गई थी मुझे कभी नहीं भूलती -
अज आखां वारिस शाह नूँ
कि तूँ कब्रां विच्चों बोल
ते अज किताबे इश्क दा
तूँ नवाँ वरका फोल
इक रोई सी धी पंजाब दी
तूं लिख लिख मारे वैन
अज लखां धीयां रोंदिया
तैनूं वारिस शाह नूं कैण
आज हम किस वारिस शाह से कहें?
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




सही कहा पंकज भाई,
अमृता प्रीतम जी सचमुच हिन्दी साहित्य का एक जगमगाता सितारा थी, उनके जाने की कमी हम सभी को खलेगी।
आप बहुत दिनो बाद आये, कहाँ रहे इतने दिन? कुछ तो ब्लागियाइये…