अवलोकन अनुगूँज १५ - हम फिल्में क्यूँ देखते हैं

अनुगूँज वर्षगाँठ विशेष - १५भई चित्त प्रसन्न है हालांकि मिडवेस्ट के मौसम ने पूरा जोर लगा रखा है डिप्रैश्न में धकेलने का। बर्फ पड़ रही है, मानोशी जी की फोटू से आपको अंदाजा भी हो जाएगा। बोझिल स्लेटी वातावरण में चिकग बंधुओं के उत्साह ने मन में लोहड़ी की आग के पास बैठी गर्माहट पैदा कर रखी है। वैसे भी यह अनुगूँज वर्षगाँठ विशेष है इसलिए और भी अच्छा है। हाँ जी तो आप भी उत्सुक होंगे इस अवलोकनी प्रविष्टि को पढ़ने के लिए और एक बात यह पहली प्रविष्टि है जो बादलों के बीच से लिख रहा हूँ। इसलिए हाजिर है पंदहरवी अनुगूंज की दास्तां मिर्ची सेठ के कीबोर्ड से बादलों की बीच अमरीका वेस्ट का जिंजर ऐल पीते हुए।

विषय तो सभी को प्रिय होगा इतना पता था पर अपने आशीष जी खालीपीली के उत्साह की दाद देनी पड़ेगी पहली प्रविष्टि भेजने के लिए बधाई। लिखी भी एकदम फक्कड़ स्टाइल से है और छड़यां दी जून बुरी के बारे में बताना नहीं भूले। जिंदगी के हर मूड के लिए उनके पास फिल्में हैं -

जब हम अपने रहने के लिये आशियाना ढुण्ढ रहे होते है और मकान मालिक हमारे क्वारेपन के कारण इकार कर देता है, तब हमे घरौंदाजैसी फिल्मे देख लेते है. अब नौकरी अच्छी है, अच्छा खासा कमा लेते है,लेकिन दिल है कि मानता ही नहीऔर पैसा चाहिये ! मन बहलाने के लिये कांटे”, “आंखेजैसी फिल्म देख आते है.…… अव्यवस्था, रिश्वतखोरी से चिढ होती है, तब हमे नाना पाटेकर की फिल्मो(प्रहार जैसी) का भुत चढता है. भारत पाकिस्तान क्रिकेट मैच मे भारत के हारने पर जब पडोस के मुहल्ले मे पटाखे छुटते है तब हम सन्नी दयोल की गदरया मिशन कश्मीर नुमा फिल्मे देखते है.….

अपनी फिल्मी फिलासफी उन्होंने कुछ ऐसे कही

जिंदगी मे ऐसे भी परेशानीयो की, दुखो की कमी तो नही है जो सिनेमागृह मे भी जाकर वही सब कुछ देखे. मै ज्यादातर ऐसी फिल्मे देखता हुं जिसमे सोचने की जरूरत ना हो, दिमाग घर पर रख कर आओ. सारी दुनिया जहान को भुल्कर २-३ घन्टे फिल्म का आनंद लो, खुल कर हंसो

एक दम सही बात। पर कहते हैं कि कई बार आदमी यह भी सोचता है दुनिया में कितना गम है मेरा गम तो कितना कम है तो इस के चलते भी भाई लोग फिल्में देख रहे हो सकते हैं। दूसरा हर एक की अपनी डफ्ली अपना राग इस लिए आगे चलते हैं देखते हैं कि बाकी लोग क्या सोचते हैं इस बारे में।

दूसरे नम्बर पर आए स्वामी दादा। पता नहीं आज कल वे किस हलवाई की ठंडाई(अंग्रेजी में बोले तो कूल ऐड) पी रहे हैं ऐसे शब्द प्रयोग करते हैं आदमी का दिमाग अगर कौमा में भी हो तो झन्ना के उठ बैठेगा। जरा भूमिका देखिए

प्रगैतिहासिक पाषाणयुगी मानव भी गुफ़ाओं में भित्तीचित्र उकेरता था. कथाएं कहने और सुनने का रोग तो मानवता में वंशानुगत है. इतना प्राचीन की हमारी सहज प्रकृति का प्रधान अंग है.

पर मानना पढ़ेगा की काफी सोचविचार कर एक एक शब्द को भट्टी में सेंक कर लिखे हैं ई-स्वामी। उ का इ कथन फिल्मों के शगल का निचोड़ कुछ ऐसे परोसता है

जो अनुभव अतीत और आगे की सोच से अलग कर अभी में ले आएं वे ही अनूठे होते हैं उत्तेजक होते हैं - उन्हें संजोना और फ़िर फ़िर सुनाना जीवन को जीने वाला जीव होने का प्रमाण देना है - इसी को येन-केन-प्रकारेण सिद्ध करने के प्रपंच में कथाएं सुनाने का रोग लगा मानव को

……….

अक्रियाशील, अल्पकल्पनाधारी और सृजनशीलताहीन औसत मस्तिष्कों की दंभ भरी भीड को भी विचार तो चाहिए हीं - चाहे उधार के ही क्यों ना हों! अधिकांश के लिए सीखने की प्रक्रिया ही उनके पूर्वाग्रहों की जमावट बदलते रहने से अधिक कुछ नहीं. इसी जमावट की सजावट बदलते रहने के लिए हम कथाएं सुनते हैं.

स्वामी जी इस बात से तो मैं राय रखता हूँ कि नए विचार चाहिएं क्यूंकि उनके बिना जीवन में शीथलता आ जाती है। एक अनजानी जगह में सप्ताहंत पर मित्रों सम्बंधियों के बिना रहा आदमी इसे खूब समझता है और शायद इसीलिए जेल की सजा दी जाती है। पर नए विचारों या मन बहलाने के लिए किसी और के विचारों को किसी भी माध्यम से ग्रहण करना बुरा तो नहीं है। विचारों से विचारों का जन्म होता है व मनोरंजन से मिली स्फूर्ति से दिमाग बढ़िया काम करता है। आगे राजेश जी ने इसी बारे में लिखा है पढ़ते रहिए।

मामला कुछ सीरियस हो गया इसलिए आगे बढ़ते हैं। आजकल फुरसतिया जी की मौज लेने की कला ब्लॉगजगत में खूब फलफूल रही है। विषय के हम से मतलब था हम लोग बिल्कुल लल्लू वाले दूरदर्शन के पहले धारावाहिक की तरह यानी वी द पीपल। सुनील जी ने मुस्कराते हुए प्रश्न रखा व जवाब भी दे दिया। फिल्मों से मेरा अभिप्राय केवल हिन्दी फिल्मों से नहीं था हर भाषा की फिल्म और मूक भी। चार्ली भैया की माड्रन मैन पसंदीदा फिल्मों में से है। खैर सुनील जी ने फिल्में देखने का जो कारण दिया

जो मन को भाये, जिससे भारत से नाता तो जुड़ा ही रहे पर साथ साथ देख कर भावनाओं और कला की दृष्टि से अच्छा लगे.

इसके बाद पढ़ी राजेश जी की प्रविष्टि पता चला कि अनुगूंज के प्रति लोगो में कितना समर्पण है। राजेश जी ने तो इस पर शोध ही कर डाला व पूर्व प्रकाशित प्रविष्टियो पर मौज लेते हुए बोले

कोई राज की बात तो बता ही नहीं रहा। हर आदमी कहता है, कि भाई हम तो इसलिये देखते हैं, बाकी का खुद जा कर पूछो, गरज हो, तो, स्वयं पता करो। हमें औरों से मतलब नहीं, अपना पता है, सो बता दिया।

और शोध करते हुए पचड़ों में भी पड़ गए जब यह सुनना पड़ा कि फिल्में हम देखते हैं आप काहे पूछ रहे हैं - क्यों, आप को कोई परेशानी तो नहीं ?” उत्कृष्ट लेखन व मानवीय भावों को समझने की बूझ के चलते राजेश जी ने एकदम सही फरमाया कि

एक वजह तो यह हुई फिल्मों की लोकप्रियता की। तमाम चीजों की कल्पना को मूर्त रूप में देख कर, सहज अनुभूति व आनन्द प्राप्ति की। यानी अंग्रेजी की कहावत, “सीइंग इज़ बिलीविंग” ।

दूसरी बात यह है, जो, सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रायड कहते हैं, कि, कला वह नशा है, जिससे, जीवन की कठोरताओं से विश्राम मिलता है। शायद, सही कहते हैं, फ्रायड !

साथ ही मेरा यह मुगालता कि फिल्में देखने का शगल अंतर्राष्ट्रीय है भी उनसे, मिली जानकारी कि इंडोनेशिया में लोग इतना फिल्में नहीं देखते से दूर हो गया। वैसे आप क्या कहते हैं इस बारे में मिर्चीसेठ का कहना है हाऊ बोरिंग :D

राजेश जी के आगे के फिल्मों के बारे में यह विचार याद रखने लायक है

जिस तरह, खाना, कपड़ा और घर, हर व्यक्ति की आवश्‍यकता है, उसी तरह, खाली समय में भी, मानसिक स्फूर्ति को हासिल रख पाने के लिये, (अंग्रेजी के शब्द fatigue से बच पाने के लिये), स्वस्थ मनोरंजन आवश्‍यक है, जो आप की सृजनात्मक शक्ति को बिखरने से रोक सके और सही दिशा में, सही परिप्रेक्ष्य में, समाज की विभिन्न गतिविधियों से जोड़ सकने में सक्षम हो।

फिर अनुनाद जी ने भी राजेश जी के विचारों की सहमति अपने तरीके से यह लिख कर की सबसे बडा कारण है फिल्मों का श्रव्य-दृष्य माध्यम होना। इस बार का कम लिखे को ज्यादा समझना पुरस्कार के भागी बनते हुए उन्होंने बढ़िया कहा

फिल्म में बहुत सी विधाओं का घालमेल या मिश्रण का होना । फिल्म में सौन्दर्य उपासकों के लिये सेक्स होता है, कला के पारखियों के लिये अभिनय मिलता है, साहित्य-प्रेमियों को रोचक संवाद सुनने को मिलता है , चोर-उचक्कों को उनके व्यवसाय के गुर प्राप्त होते हैं, महिलाओं और फैशन-परस्तों को नये-नये डिजायन के वस्त्राम्बर देखने को मिलते हैं ।

यानि कि हर आदमी के लिए कुछ न कुछ है इन फिल्मों में। इसी बात की पुष्टि की जीतू जी ने अपनी प्रविष्टि में व खूब टिप्पणियों की वर्षा में नहाए। सुने पार्टी भी दिए थे इस बात पर, पर अपने तो लड्डू नहीं आए। जीतू जी ने सबसे पहले तो अनुगूँज के इस आयोजन को अपनी स्वतंत्रता का हनन माना व बोले

काहे ना देखें? कोई मनाही है का? क्या आपको हमारे चाचाजी ने भेजा है हमे रोकने के लिये?

उनकी फिल्मभक्ति व कहानी सुनने की लालसा से उत्पन्न अर्थव्यवस्था के बारे में तो मेरा पन्ना से ही पढ़े। डारविन की तरह क्लासिफिकेशन करते हुए उन्होने फिल्म के अफीमचीयो को बंटवारा कुछ ऐसे किया बउवा टाईप के लोग, जवान लड़के लड़कियां, फैमिली टाइप लोग, लड़कियाँ, छुट्टन टाइप, सास टाइप औरतें, बच्चे व शुकल टाइप। फिल्में देखने के राज के बारे में वे लिखते हैं

रोजी रोटी की जद्दोजहद और जिन्दगी के सुख दुख के सागर मे गोते लगाने के बाद, एक सिनेमा ही तो लोगों को आसरा देता है और कुछ सपने दिखाता है। जहाँ सपने है वहाँ और जीने की चाहत, बस इसी चाहत मे सिनेमा देखे जाते है।

फिर आए मेरे सर जी यानि की 9-2-11 आलोक बाबू। एकदम इंजीनीयर की तरह एम्पेरीकल तरीके से फिल्में देखने के राज का पर्दाफाश कर दिया। पहले बताया कि यह और यह फिल्में देखता हूँ फिर क्यूँकि इस प्रकार की फिल्में देखता हूँ इसलिए यह कारण होंगे। यानि कि फिल्मों नें

ज़िन्दगी का नया नज़रिया मेरे सामने पेश किया - जिसके आस्तित्व के बारे में मुझे पहले गुमान भी नहीं था। इस तरह मेरे सोचने का दायरा बढ़ाया, और इस की वजह से एक आनन्द का आभास हुआ। तो कह सकते हैं कि दूसरों की दुनिया में झाँकने के लिए, या कोई और नज़रिया पाने के लिए मैं फ़िल्में देखता हूँ।

संजय जी ने पहले ही वाक्य में सारी की सारी बात लिख दी

जैसे लोग नाटक-नौटंकी और तमाशे देखते थे, हम सिनेमा देखते है. फिर क्यों न देखे जब इसमें कथा हैं-कहानी हैं, चीर विजेता नायक हैं-मोहक अदाओं वाली नायिका हैं, ग़म भुलाने को हास है-परिहास हैं, झुमने को गीत है-संगीत हैं, भावनाओं में बहने को प्रेम है-विद्रोह है, दिलाशा देते सुखान्त हैं. और हां एक मां भी है. बस इसी लिए देखते हैं सिनेमा.

व फिर इस बात का खुलासा किया कि जिंदगी के हर मोड़ हर परिस्थिति में फिल्में देखने का कारण अलग अलग हो सकता है। इन्ही विचारों पर नितिन जी की प्रविष्टि पढ़ने लायक है। होस्टलो के दौर से गुजरों के उनकी प्रविष्टि खूब पसंद आएगी।

फुरसतिया जी ने अपने कॉपी न किए जा सकने वाले स्टाईल में अपनी बात गूरु जी के मुंह से कहलवाई व मानते हैं कि फिल्में देख सकते हैं इसलिए देखते हैं साथ ही

सिनेमा के बाजार ने अपने दर्शन को जन्म दिया कि हिंदुस्तान का सर्वहारा,मजदूर ,मेहनत कश,थका-हारा, रोजमर्रा की परेशानियों में सच को सच ,यथार्थ को यथार्थ में नहीं देखना चाहता। वह इस सबसे भागना चाहता है। वह इस सबसे भागना चाहता है। वह ऐसे सपने देखना चाहता है,जहां असंभव भी संभव हो। वह मन बहलाने के लिये पागलपन की हद तक गुजर जाना चाहता है। इसलिये ऐसे सपनों का ताना बाना सिनेमा ने बुना जो खूब चला। उन सपनों में रचने-बसने वाला दर्शक वहीं रहा। मजदूर वहीं रहा। सपना देखने वालों की जेबें खाली होतीं रहीं। सपना दिखाने वाले जेबें भरते रहे। आवाम के अंतिम आदमी तक पहुंचने के नाम पर सिनेमा मानसिकता की सबसे निचली सीढ़ी पर पहुंचा और बदले में अपने लिये धन की सबसे ऊपरी सीढ़ी निश्चित कर ली।

कालीचरण जी बिल्कुल अलग जा कर कहते हैं कि सवाल यह होना चाहिए कि अभी तक फिल्में क्यों देखते है दूनिया में मनोरंजन के और भी बहुत से साधन हैं। बाकी पत्नी-प्रेम वे भी यश चोपड़ा , करण जौहर की चाशनी युक्त फिल्में न देखें तो शायद खाना न मिले। सारिका जी ने शब्दाजंलि का अंक पूरा करने के बाद फुरसत के क्षणों में कुछ ऐसा कहा

फिल्में तो सभी देखते हैं- कोई सोंच समझ कर कोई बिना सोंचे समझे। वैसे कहा जाता है कि फिल्में समाज का आईना होती हैं। पर शायद हमारे हिसाब से फिल्में सपनों का आईनां होती हैं। आम ज़िन्दगी में जो कुछ हमें हासिल नहीं होता, वो हम फिल्मों में देख कर खुश हो लेते हैं।

वे इस बात से थोड़ा संकोच महसूस कर रही थी कि हिन्दी से अच्छी अंग्रेजी फिल्में लगने लगी हैं। अरे इस में कोई बात नहीं। नेटफलिक्स के चलते श्रीमती जी व मैं तो जरमन, फ्रेंच, इतालवी कोई भी फिल्म नहीं छोड़ते।

शशि जी मुम्बई से फिल्मों के मनोरंजन व आदमी की कथा से रस लेने की प्रवृत्ति के विचार आगे बढ़ाते हुए कहते हैं

जाहिर सी बात है फिल्में बनती हैं इसलिए हम फिल्में देखते हैं. यकीन मानिये अगर फिल्में नहीं बनतीं तो हम कुछ और देखते. मसलन, कठपुतली का नाच, तमाशा, जात्रा, नौटंकी, रामलीला या ऐसा ही कुछ और.

प्रविष्टि के आखिरी में उन्होंने कहा कि तीन घंटे देखने की क्षमता व खो चुके हैं भई ऐसा न कीजिए आप तो मुम्बई में हैं अपने ही शहर वालों के धंधे पर लात। बहुप्रतिभाशाली देबू जी ने भागते भागते स्टॉप प्रैस में अपनी प्रविष्टि दी व हमें यह पता चला कि वह प्रोजक्टर पर भी हाथ साफ कर चुके हैं। वे न सिर्फ फिल्में देखते हैं पर उनके बनाने में भी रुचि लेते हैं। ये तो इश्क की इंतहा है। वैसे इस अनुगूँज का आयडिया उनकी एक टिप्पणी से ही आया था। हर रुप में फिल्में भाना व इसके कारण को उन्होंने कुछ ऐसे व्यक्त किया -

फिल्में क्यों देखता हूँ? मुझे अच्छा लगता है। हम सभी आक्सीजन, जल और हवा पर जीते हैं पर मन की खुराक कुछ और ही होती है। फिल्में मुझे भाती हैं। जब कभी मन खराब होता है तो यह मुझे गुदगुदाकर हंसा देती है, जब अकेला होता हूँ तो मेरा साथ देती हैं, जब परिवार और मित्र साथ होते हैं तो बढ़िया दोस्त बन जाती है।

अंत में मिर्चीसेठ कुछ कुछ स्वामी जी की विचारधारा का स्मर्थन करते हुए कहते हैं

हम सभी पलायनवाद के चलते ही फिल्में देखते हैं। रंगीले पर्दे की कृत्रिम दुनिया में कहानी देखते वक्त आनंद आता है। अब यह हंसी का हो या वीर रस, करुणा या रहस्य का होता तो रस ही है।

चिकगों की जमात के इस सामूहिक समागम से काफी विचार सामने आए हैं किस को क्या भाता है यह तो नजरिए पर निर्भर करता है। पर इतने गुणीजनों ने भाग लिया। मजा आया। लिखते लिखते मिलवॉकी से फीनिक्स कैसे आ गया पता ही नहीं चला। वर्षगाँठ विशेष को विशेष बनाने के लिए लेखको, पाठकों व खासकर टिप्पणी से प्रविष्टि की सूनी मांग सजाने वाले पाठकों का बहुत बहुत धन्यवाद। मचिकग से भी कोई प्रविष्टि आती तो बढ़िया रहता।

सबसे अच्छी प्रविष्टि व पुरुस्कार के बारे में जानने के आते रहिए इस चौपाल पर।

6 Responses to “अवलोकन अनुगूँज १५ - हम फिल्में क्यूँ देखते हैं”

  1. बढ़िया अवलोकन किया। बधाई! यह मिर्ची सेठ का आयोजन था इसलिये बहुत अधिक सिनेमा न देखने के बावजूद मैंने लिखा तथा यह अफसोस कि लिखने के बावजूद अपेक्षित लेख न लिखा जा सका। कारण कि हमारा पी.सी. गड़बड़ रहा। खैर फिर कभी सही।

  2. नारायण! नारायण!
    मिर्ची सेठ, आपको पन्द्र्हवे अनुगूँज और वर्षगांठ स्पेशल के सफ़ल आयोजन पर बहुत बहुत बधाई।

    तो फिर भाई कौन आ रहा है, अगले अनुगूँज के आयोजन के लिये आगे। मै चाहूँगा कि नये चिट्ठाकारों मे से कोई आगे आये।

  3. अनूप जी,

    हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया। पहले प्यार के बाद फिल्मों का मुद्दा कुछ ऐसा था जिसने सभी को छूआ।

    पंकज

  4. […] १५वीं अनुगूँज में पंकज ने विषय दिया था कि हम फिल्में क्यों देखते है? १५ प्रविष्टियाँ मिली अनूगूँज के एक वर्ष पूर्ण होने पर और घोषणानुसार हमें सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि को पुरस्कृत करना है। तो बतायें कि कौन सी प्रविष्टि आप को सब से अच्छी लगी? मतदान करने की अंतिम तिथि है १६ दिसंबर। […]

  5. main hindi main kuch likh kar dekh raha hoon

  6. alternative health care

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