धनन्जय भाई को भावभीनी श्रद्धांजलि

धनन्जय शर्मा
प्रतीक द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार, हमारे उत्साही, कर्मठ और बहु-प्रतिभाशाली हिन्दी ब्लॉगर मित्र धनन्जय शर्मा जी अब हमारे बीच नही है। धनन्जय भाई से मेरा पत्राचार अक्सर होता रहता था, वे हिन्दी चिट्ठाकारी और वैब पर हिन्दी के बढते प्रभाव को देखकर बहुत उत्साही थे। मैने एक बार उनसे उनके परिचय के लिये लिखा था, जिसके जवाब मे उन्होने एक मेल लिखी थी, उसके कुछ अंश इस प्रकार है:
मेरे इस जीवन की यात्रा का आरम्भ वर्ष १९६२, माह जनवरी में “नवाबों की नगरी” लखनऊ, उत्तर-प्रदेश, भारत में हुआ। आठवीं तक की शिक्षा “कपड़ा मजदूरों की कर्म-भूमि” कानपूर में, ९वी से लेकर १२वी तक की शिक्षा, “ब्रज-भूमि” हाथरस में और विज्ञान में स्नातक की उपाधि “भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की विद्या-पीठ” डी.ऐ.वी कालेज, कानपुर से प्राप्त की । एम.एस.सी (भौतिक-विज्ञान) की शिक्षा के दौरान, वर्ष १९८२ में कम्प्यूटर के कीड़े ने ऐसा काटा कि एम.एस.सी को बीच में छोड़ कर सी.एम.सी, दिल्ली से साफ़्टवेयर के कोर्स करके, कानपुर में अपने कम्प्यूटर की कैरियर की शुरूवात की। बाद में बड़ोदा, गुजरात से, इनवेन्टरी-प्रबंधन व स्टोर-प्रबंधन में डिप्लोमा भी किया । “करत-करत अभ्यास के, जड़वत होत सुजान” नामक कथन को सत्य मानते हुए, अनेकों आपरेटिंग-सिस्टमों, डाटाबेसों, आफ़िस-आटोमेशन कार्यक्रमों, प्रोग्रामिंग भाषाओं को जानने-समझने का प्रयास किया पर अंत में प्यार हुआ “डाटाबेस-प्रबंधन व सामग्री-प्रबंधन” से। तब से इन दो की मदद लेते हुए, रोजी-रोटी की तलाश में, टैनरी, खाद-कारखाना, कृत्रिम अंग निर्माण कारखाना, खान, कैमिकल प्लांट, कम्प्यूटर परामर्श प्रतिष्ठानों, पैट्रो-रसायन कारखानों व रिफ़ानरी की यात्रा की है। शुरू से, त्रिकोण के चौथे कोण को देखने, जानने व समझने का प्रयास रहा। चाहे इसे आप मेरी मानव-प्रकृति कहे या एक “Aqurius” की इस संसार को एक अलग नजरिये से समझने की चेष्टा या फ़िर सप्त-ग्रह योग में जन्में हुए व्यक्ति की एक स्वाभाविक प्रवृति।”
धनन्जय भाई का पूरा परिचय उनके चिट्ठे पर देखिये। मुझे याद है, एक पत्राचार मे उन्होने लिखा था
“हम रहे ना रहे, हमारे शब्द,विचार और लेखन हमेशा जिन्दा रहेगा, लेखक मर कर भी लोगो के दिलो मे अमर रहता है।”
एकदम सही कहा था, धनन्जय भाई ने।
आज भले ही वे हमारे बीच नही है, लेकिन उनका लिखा सदा हमारे बीच रहेगा और हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा। उनके जाने से हिन्दी चिट्ठाकारी परिवार को बहुत बड़ी क्षति हुई है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैँ कि उनकी आत्मा की शान्ति दे और साथ ही उनके परिवार को इस अपूरणीय क्षति को सहने का धैर्य प्रदान करे। हिन्दी चिट्ठाकारों के परिवार की ओर से हम सभी धनन्जय भाई को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते है, वे अपने कार्यो और उनके लिखे विचारों से सदैव हम सभी के बीच रहेंगे।
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




धनंजय शर्मा जी ने अनके कविताओं की प्रतिकवितायें लिखीं। उनके तकनीकी योगदान का
मुझे अन्दाजा नहीं है लेकिन उनके निधन के समाचार से बहुत दुख हुआ। भगवान उनकी
आत्मा को शांति दे।
शर्मा जी के असामयिक निधन से हिन्दी कम्प्यूटिंग को एक अपूरणीय क्षति हुई है | आज समझ में आ रहा है कि हम हिन्दी चिट्ठाकारों में कितना अपनापन आ गया है | आज सुबह से ही मन दु:खी है |
यह बहुत ही दुखद घटना है। ऐसा लगता है जैसे कोई जाना-पहचाना हमारे बीच से चला गया हो। मैंने कुछ महीने पहले ही उनके चिट्ठे पढ़े थे। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।
“बड़े अजीब हैं ये दर्द-ओ-ग़म के रिश्ते भी
कि जिसको देखिये अपना दिखाई देता है”
कभी बात तक नहीं हुई और फिर भी ख़बर सुनकर जी उदास सा है। एक कर्मठ हिन्दी स्वयंसेवी के जाने का दुख है सो अलग।
बेहद दुख हुआ यह जानकार! ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शांति और उनके परिवार को यह दुख सहने की संबल प्रदान करे।
इस ब्लॉग जगत में अनजाने साथियों से एक पहचाना-सा रिश्ता कायम हो गया है. शर्माजी के निधन की ख़बर ने इस रिश्ते के अहसास को और गहरा किया है. भगवान उनकी आत्मा को शांति दें.
जीवित केवल वे लोग हैं जिनको हम याद रखते हैं। आज धनञ्जय जी की यादें, उनका नाम, कर्मठता, मार्गदर्शन, व्यक्तिगत रूप से मिले बिना जिनसे आत्मीयता हो जाए, ऐसे न भूलने वाले व्यक्ति के शारीरिक
त्याग को मृत मानने में ना जाने क्यों दिल नहीं मानता।
धनञ्जय जी एक ऐसे ही पुरुष थे जिनकी यादें हमारे ह्रदय और मस्तिष्क की स्मृतियों में अमर रहेंगी!
महावीर और परिवार की ओर से उन्हें आत्मीय तथा विनम्र श्रद्धांजलि!