अनुगूंज 18: मेरे जीवन में धर्म का महत्व
पिछले दिनो चिट्ठा जगत में एक मुद्दा ज़बरदस्त छाया रहा, शोएब ने ‘धर्म’ पर क्या लिखा रवि कामदार भी जोश में आ गये और अपने मन कि गुबार निकाल बैठे. दनादन टिप्पणियां भी आयी. मुझे लगा जब हर कोई इस विषय में कुछ न कुछ कहना चाहता हैं, हर कोई धर्म के प्रति अपना एक दृष्टिकोण रखता हैं जिसका उनके जीवन में काफी महत्व हैं, तो मौका लपक लो और इसी विषय पर अनुगूंज का आयोजन कर डालो. अनुगूंज के आयोजन कि मेरी पुरानी इच्छा भी थी पर चिट्ठा जगत में नया था, इस लिए दूर रहा (अब आप तरकशधारी हो गये हो तो थोड़ा कोंफिडेंस आ ही जाता हैं
).
तो मित्रों कुंजीपटल हैं, आपकी उंगलियों हैं और अनुगूंज 18 हैं “मेरे जीवन में धर्म का महत्व”. और हां, अंतिम तारीख़ भी हैं 15 अप्रैल, 2006. दस्तूर हैं, पहली प्रविष्टी मेरी होनी चाहिए तो दिनांक 1 अप्रैल को जोगलिखी पर रख दी जायेगी.
आशा हैं एक छोटे से अंतराल के बाद इस बार तरकश द्वारा आयोजित अनुगूंज में आप सबका सहयोग प्रविष्टीयों के रूप में प्राप्त होगा और इसका आयोजन सफल रहेगा. अनुगूँज के नियम यहाँ पढ़ सकते हैं.
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




विषय काफी अच्छा है. वैसे आपने अपनी प्रविष्टी की दिनाकं अच्छा चूना है. ना लिख पाये तो कह सकते है “एप्रील फूल” बनाया.
[…] तो इस बार की अनुगूँज(क्रमांक १८) का आयोजन तीर-कमान की छाया में हो रहा है, मेरा मतबल कि तरकश के बड़े तीर जोगलिखी वाले संजय भाई ने किया है। विषय भी कोई ऐसा वैसा नहीं, बल्कि रामबाण सा अचूक लाए हैं, “मेरे जीवन में धर्म का महत्व“, और ऐसा हो भी क्यों न, भई आखिर तीर-कमान वाले हैं!! […]
लो भाई हमने भी पहली बार अनुगुँज में अपनी प्रविष्टी भेज ही दी.
लो भाई हमने भी पहली बार अनुगुँज में अपनी प्रविष्टी भेज ही दी. गौर फ़रमाईये
http://sagarnahar.blogspot.com/2006/04/blog-post.html
ये रही हमारी प्रविष्टी
आशीष
मेरे जिवन पर धर्म का प्रभाव…
à¤à¤¸ विषयपर लिà¤à¤¨à¥ à¤à¥ लियॠमà¥à¤à¥ à¤à¤¿à¤¸à¥ à¤à¥à¤¤à¤¾à¤µà¤¨à¥ या नà¥à¤à¥à…
हमारी प्रविष्टी भी निठल्ला चिंतन में पोस्ट हो चुकी है यहाँ से मिल जायेगी
लीजिए, एक ठो प्रविष्टिया हमरी भी.
हम भी लिख दिया हूँ, आइए ना, देखिए ना, हमरी प्रविष्टि
[…] मोबाइल का विज्ञापन करता माडल बोला -ऐसी आजादी और कहां? 2.इधर ब्लागर बता रहे हैं- हमारा धर्म कैसा है उधर वो बाजार में चीख रहे हैं सड़े टमाटर ! क्या हराम का पैसा है? […]
यह रही मेरी प्रविष्टि
http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/04/blog-post_09.html
अनुगूँज में मेरी भी प्रविष्टि देखिए।
ब्लाग पर लोगो कैसे पेस्ट करें कृपया बताएं ।
[…] हम अनुगूंज के लेख का मसौदा सोच रहे थे।हमसे पहले तमाम लोग लिख चुके हैं जो कि बकौल रविरतलामी कूड़ा ही होगा। हम संकोच में थे कि कूड़े में और क्या कूडा़ मिलाया जाय। लेकिन दिल है कि मानता नहीं।दिल के आगे संकोच ने हथियार डाल दिये। हमने सोचा कि कुछ लिख ही डाला जाय। विषय खोजा-मेरे जीवन में धर्म का महत्व. […]
मन की बात: “धर्म का मेरे जीवन में मह्त्व”
[…] हाँ, तो मैं यह नहीं मानता कि ईश्वर जैसी कोई चीज़ है। मैं यह भी नहीं मानता कि सभी धर्म अच्छी चीज़ें सिखाते हैं, या यह कि ये सब “ईश्वर-रूपी सत्य” को पाने के अलग अलग रास्ते हैं। मैं यह भी नहीं मानता कि ज़िन्दगी में सही आचरण के लिए धर्म की आवश्यकता है। यह भी नहीं कि मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। हो सकता है कि यह बातें कहने के लिए मुझे तनखाइया करार दिया जाए, और मेरा हुक्का पानी बन्द किया जाए, पर जब शुऐब ने पर्दा उठा ही दिया है, और रवि कामदार ने भी अपना काम कर दिया है, और जब संजय ने क्लॉज़ेट से बाहर निकलने का न्यौता दे ही दिया है तो फिर चुप रहने से क्या लाभ? इसलिए अपनी विचारधारा के इस पहलू को थोड़ा और विस्तार देने की कोशिश करूँगा। […]
मेरी परिभाषा भी देखिये …..
[…] अनुगूंज : 18 में जो उत्साह दिखा उसके लिए मैं सभी चिट्ठाकार बंधुओं का आभार व्यक्त करता हुं. अनुमान तो पहले से ही था कि इस विषय पर हर चिट्ठाकार कुछ न कुछ कहना चाहता है, बस एक मौका और माहोल तैयार करने भर कि देर हैं. अनुगूंज कि वजह से यह दोनो सहज ही उपलब्ध हो गये. हाथ आया मौका भला चिट्ठाकार क्यों चूकते? अच्छी-खासी संख्या में प्रविष्टीयाँ प्राप्त हुई. उत्साहजनक बात यह भी रही कि कई चिट्ठाकारों ने तो पहली बार अनुगूंज में भाग लिया हैं. सभी चिट्ठाकार बंधुओं ने बहुत ही तर्क-संगत तरीके से अपने-अपने विचार व्यक्त किये हैं और इसके लिए आवश्यक हुआ वहां श्लोक, कविता, दोहे यहां तक की कुण्डलियों का भी प्रयोग किया हैं. हर लेख कि हर पंक्ति में तर्क हैं जिन्हे समीक्षा में समेट पाना कठिन हैं. मोटे तौर पर सभी प्रविष्टी में एक बात जरूर सामने आई कि मानवता ही सबसे बङा धर्म हैं और मानवता के लिए ही सभी धर्मों की अलग-अलग समय में काल, स्थान और स्थानिय आवश्यक्ताओं को ध्यान में रख कर रचना हुई. समस्या तब खड़ी हुई जब समय के साथ तथा धर्मों के फैलाव के कारण अलग-अलग स्थानों कि आवश्यक्ताओं में तो परिवर्तन हुआ पर धार्मिक मान्यताओं में आवश्यक परिवर्तन का अभाव रहा. मानवता के लिए रचे गये और हमारे विचारों को, संस्कारों को प्रभावित करते रहे यह धर्म कहीं आज मानवता के लिए ही खतरा तो नहीं बन गये हैं. ऐसे में आज हमारे जीवन में धर्म का कितना महत्व रह गया हैं? यहीं आकर चिट्ठाकार एक मत नहीं हो पाते. कुछ के मतानुसार धर्म के बिना जीवन कि कल्पना तक नहीं कि जा सकती, क्योंकि धर्म से ही जिने का सही मार्गदर्शन प्राप्त होता हैं. वहीं कुछ का मानना हैं कि धर्म तो ठीक हैं पर जरूरत पङने पर अनावश्यक धार्मिक हस्तक्षेप से दूर रहना चाहिए. अधिकांश चिट्ठाकर ऐसा भी मानते हैं कि चुंकी मानवता ही सबसे बङा धर्म हैं तो क्यों न हिन्दू, मुस्लिम जैसे शब्दों से उपर उठ कर मानवीय मूल्यों का पालन करें. आश्चर्य के साथ चिट्ठाकरों में एक मत किसी नये धर्म का प्रवर्तन करने का भी सामने आया हैं. […]