क्या छोटे दूकानदार भारत में ईबे से पैसा कमा सकते हैं
२००३ में शादी के बाद मेरा प्रोजेक्ट सैन डिऐगो में था, नवविवाहितों के लिए सैन डिऐगो वैसे भी खूबसूरत जगह है। उन्हीं दिनों मैंने हिन्दी चिट्ठाकरी भी शुरु की थी (शादी और हिन्दी ब्लॉगिंग का कोई रिश्ता नहीं है, नारद जी व शुक्ला जी नोट करें) हम लोग मीरा मेसा नामक जगह पर रहते थे व घर के लिए सुन्दर सुन्दर चीजें देखते हुए अपने घर में सजाने के सपने लेते थे। वहीं एक दुकान थी कोहैबीटैट, दूकान की खासियत थी कि वह घर सजाने का समान, भारत से मंगवाकर अमरीकी मार्किट में डालरों के भाव बेचते थे। सामान तो वाकई सुन्दर था पर मिर्ची सेठ का दिमाग यह सोचता था कि इस वाला आइटिम का दाम दिल्ली में कनाट प्लेस में बसे नेहरू मार्किट में कितना होगा। आप भी साथ दी गई छवि पर क्लिक कर के देखें भाई कितने दामों में अपना सामान बेचते हैं।
दरअसल बाजारों में सामान की कीमत में इजाफे का एक बड़ा कारण होते हैं बिचौलिए। जैसे कि दक्षिण की सुंदर साड़ियों की बात कीजिए। साड़ी बनती है मद्रास के पास में पर पहनना चाहती है दिल्ली की नई नवेली दुल्हन अपने पहले करवा चौथ पर। अब या तो वह चेन्नई में जाकर खरीदे या फिर पास के एम्पोरियम से। एम्पोरियम वाले ने भी दिल्ली के किसी बड़े डीलर से खरीदी होगी जो कि चेन्नई से खूब सारी साड़ियाँ इक्कट्ठी मंगवाता है। बिचौलिए अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा अंग हैं क्यूंकि वे उत्पादक व खरीदार के बीच की दूरी मिटाते हैं। पर इस दूरी मिटाने की सहूलियत की भी एक कीमत जोकी सामान की बढ़ी हुई कीमत के रूप में अवतरित होती हैं।
नब्बे के मध्य दशक के बाद अंतर्जाल से आई अंतर्वाणिज्य (ईकामर्स) की क्रांति में यह दूरी केवल कुछ क्लिकों की बन कर रह गई है। विकसित देशों में आप अंतर्वाणिज्य से जुड़ी कम्पनियों की अरबों डालर की आमदनी से इसका अंदाजा लगा सकते हैं। परन्तु इस नए माध्यम के फायदे केवल बड़ी कम्पनियों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि छोटे खिलाड़ी पहली बार बड़े से बड़े उद्योग के बराबर अपने उत्पाद बेच सकते हैं। इस क्रांति में सबसे बड़ा हाथ है ईबे का। ईबे सजाल के द्वारा यदि आप के पास कुछ सामान है जो आप बेचना चाहते हैं तो आप उनके सजाल पर जाकर उसे बेचने के लिए लगा सकते हैं, इसे आप बोली पर लगा सकते हैं या फिर एक स्थापित मूल्य पर। यदि कोई खरीदार आपके मूल्य से खुश है व खरीदना चाहता है तो आप उसे उस कीमत व डाक का मूल्य लगा कर डाक से भेज सकते हैं। ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों में ऐसे हजारों छोटे व्यापारी हैं जिनके धंधे का एक बड़ा भाग केवल इसी माध्यम से ही चलता है।
बिज़नेस वीक का यह लेख पढ़ने के बाद ख्याल आया कि यह तो भारतीय व्यापारियों के लिए बहुत ही काम की चीज़ है। अपने देश की विविधता की वजह से इतनी सुंदर व विविध चीजें देश भर में पाई जाती हैं। भारत की बढ़ती समृद्धि से खरीदारों की संख्या में भयंकर वृद्धि हो रही है। जरुरत है तो बस बेचने वालों को खरीदने वालों से जोड़ने की। अंतर्जाल द्वारा सामान बेचना छोटे व्यापारी के लिए बहुत ही कारगार तकनीक है। ऐसा नहीं है कि यह काम एकदम आसान है। विश्वसनीय डाक व्यवस्था, पैसे का लेन देन जैसी बातें तो सुलझानी पड़ेंगी। पर इन का इलाज संभव है। क्या मजा हो कि गुड़गाँव रोड पर महरौली के पास बैठे प्लास्टर ऑफ पेरिस कि मूर्तियाँ बेचने वाले वहीं एक छोटा सा कम्पयूटर लगा कर भी बैठे हों और देख रहें हो कि अंतर्जाल से कितने ऑडर आए।
चाहुँगा कि रवि कामदार, युगल मेहरा सरीखे बंधू अपने आस पास ऐसे दूकानदार ढूँढें व देखें कि अंतर्जाल कैसे उन दूकानदारों की मदद कर सकता है।
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




[…] चिट्ठों की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है उनका अनौपचारिकता का लेखन। लिखते हुए भाई लोगों को इस बात की चिन्ता नहीं रहती कि सुन्दर लिख रहा हूँ कि नहीं। कहीं कुछ नियमों के बाहिर तो नहीं लिख दिया। कहीं संपादक की कैंची ज्यादा तो नहीं चल जाएगी मेरे लेख पर। लेख छपेगा भी नहीं। अपने मन के मालिक हम खुद। जब छपास पीड़ा हुई, चाहे अमित की २४x७ की रूटीन हो या कालीचरण गॉड के बारह बजे, बस कभी भी ब्लॉगर या फिर वर्डप्रैस पर जाकर कीबोर्ड की चटक चटक चटाकाई और एक ठौ बढ़िया वाला लेख अंतर्जाल पर आपके नाम से आपकी दूकान में प्रकाशित हो गया। ब्लॉगविधा के बिना नारद कुवैत में बैठे बैठे अपनी नई किताब कहाँ छापते। वैश्विक गणतंत्र का इसे बड़ा उदाहरण क्या होगा। पर इससे हटकर कभी कभी फॉरमल लेखन का प्रयास किया तो पाया कि ससुरा बहुतै ही मुश्किल है। निरंतर के समय इस का अहसास हुआ था व समझ में आया था कि भाई चिट्ठे लिख कर ज्यादा मत उछलो लिखनें के अभी और भी मूकाम बाकी हैं। यदि आप चिट्ठाकार बंधूओं में अच्छे लेखन के उदाहरण देखना चाहते हैं तो देश दुनिया मेरा सबसे प्रिय ब्लॉग है। रमण जी कि गज़ल का सिर पैर ब्लॉग व फॉरमल लेखन के सुरुचिपूर्ण मिश्रण का सुंदर प्रयास है। यह सब मैं क्यूँ लिख रहा हूँ। अरे यार पिछले दो घंटे से में अक्षरग्राम पर एक प्रविष्टि लिखी काफी अच्छा लगा पर टाईम ज्यादा लगता है। दुःखता है। और इस वाली की लिखने में पंद्रह मिनट लगे। […]
पंकज भाई,
ख्याल अच्छा है, कुछ बाहर रहने वाले भारतीय भी लिंक का काम कर सकते हैं, पेमेंट गेटवे और डिलेवरी चैनेल के लिये.सफलता की संभावनायें असीम है और मुद्दा सटीक.
समीर लाल
बिल्कुल सही कहा आपने।
ईबे एक ऐसी जगह है जहां बेरोजगार को रोजगार मिल सकता है। मै पिछले दो सालों से ईबे का युजर हूँ अभी मेने एक ओर नया अकाउंट बनाया है। एक समय मेरे जेब खर्च की व्यवस्था ईबे से ही होती थी।
मेरी दुकान पर जरूर आएं।
वैसे आपका कहना बहुत सही है कि भारतीयों को इसमे आना चाहिये । बेरोजगारी दूर हो सकती है कुछ लोगों की इससे।
मै हमेशा अपने जानने वालों को इसके लिये प्रोत्साहित करता हूँ एवं अब आपके कहे अनुसार और करुगा।
युगल भैया,
बहुत ही अच्छे। आपकी ईबे परसफलता के लिए शुभ कामनाएं। अभी आपके चिट्ठे से पता चला कि आप कोटा से हैं। मेरे ननिहाल कोटा, बारां, व अंता में फैले हुए हैँ। कभी आना हुआ तो आप से मुलाकात का सिलसिला भी निकलेगा।
पंकज
पंकज भाई, लिखे तो बढ़िया हो। ईबे वाकई छोटे दुकानदारों के लिए एक सशक्त साधन है, पर बात है कि भारतीय खरीददारों के विश्वास की। कहने का अर्थ यह है कि आमतौर पर अभी भी भारतीय उपभोक्ता आनलाईन खरीदने में हिचकता है। इसके कई कारण भी हैं, security से लेकर दाम और विश्वास तक। यदि security वाली हिचक को overcome भी कर लिया जाए तो भी दाम और विश्वास की बहुत बड़ी समस्या है। यहाँ पर rediff, indiatimes तथा भारतीय ईबे पर जितने भी भारतीय विक्रेता हैं, वे अधिकतर चीज़े औने-पौने दाम पर बेचते हैं जो कि दुकानों आदि में बहुत सस्ती मिल जाती हैं। तो खरीदने वाला यह सोचता है कि वो क्यों किसी चीज़ के 200 रूपये दे जब वह 50 रूपये में दुकान में उपलब्ध है!! और बात विश्वास की भी आती है। आनलाईन खरीदने में एक समस्या खरीददार के सामने यह है कि वह जिस चीज़ को खरीद रहा है उसे देख नहीं सकता, विक्रेता जिस तस्वीर को दिखाएगा उसी पर विश्वास करना होगा। तो इसलिए यहाँ यह बात अधिक महत्वपूर्ण है कि विक्रेता ईमानदारी से पेश आए और वास्तविक तस्वीर आदि ही दिखाए। पर अधिकतर खरीददार इस बात का फ़ायदा इस तरह से उठाने की सोचते हैं कि वे दिखाते तो कुछ और हैं और बेचते कुछ और हैं, यह खरीददार को तब पता चलता है जब उसकी खरीद उसके पास पहुँच जाती है और उसे एहसास होता है कि उसे मूर्ख बनाया गया है। अधिकतर मामलों में कोई वापसी भी नहीं होती।
इन्हीं सब कारणों के चलते भारतीय उपभोक्ता आनलाईन खरीदने से हिचकता है। और ये समझदार विक्रेता क्षणिक लाभ के लिए अपनी और दूसरे विक्रेताओं की मार्किट खराब कर रहे हैं और उपभोक्ता की हिचक को जन्म दे उसे मज़बूत कर रहे हैं।
पंकज भाई साब
अमित जी ने बिल्कुल सही कहा ओनलाईन खरीद में विक्रेता पर आसानी से विश्वास नही किया जा सकता, कुछ दिनों पहले मैनें एक यु.एस. बी . एक्स्टेन्शन वायर ईबे पर ओर्डर किया कम्पनी ने वह उत्पाद 150/- रुपये में दिया, उत्पाद का मुल्य 1/- ओर शीपींग चार्ज 149/- …….??? विज्ञापन में उत्पाद की लम्बाई वगैरह कुछ नही दिया.
यही उत्पाद हमारे हैदराबाद में 30/- में फ़ुटकर विक्रेता बेचते है., अब कैसे विश्वास किया जाय इन लोगो का.
अरे वाह पंकज भाई आप तो घर के ही निकले। भई मजा आगया जानकर।
और दुसरी बात आनलाईन शॉपिंग में धोखेबाजी की तो, बात यह है समझदार उपभोक्ता कभी भी ठगा नहीं जा सकता है।
जितने भी युजर ईबे के होते हैं सारे एड्रेस वेरीफाईड होते हैं।
यदी किसी प्रोडक्ट पर आपको शक है तो आपको सेलर(दुकानदार) से संपर्क करना चाहिये, आपको देखना चाहिये कि इसमें रिटर्न पॉलिसी है या नहीं, ईत्यादी कई बाते हैं जिससे सतर्क रहकर उपभोक्ता शापिंग कर सकता है, क्योंकि धोखा तो हम स्थानीय दुकानदारों से भी खाते हैं(मेरे ख्याल से ज्यादा धोखा हम यहीं खाते हैं।)
और कई चीजें ऐसी है जो दुकानों पर मंहगी है तथा ईबे पर सस्ती। और फिर हम यह क्यूं भूलें कि यहा कुछ भी बेचा जा सकता है।
अभी हाल ही में एक व्यक्ति ने अपनी अंतर्आत्मा को करोडों में ईबे पर बेच दिया।
इसलिये सार यही है कि सावधानी का प्रयोग करें शापिंग के समय।
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