हिन्दुस्तानी स्लॅश्डॉट - हिन्दी में
पङ्कज ने पहले ही बता दिया है, पर मैं शुरुआत इतिहास से करता हूँ क्योंकि अतीत सुहाना लगता है।
स्लॅश्डॉट के बारे में तो आप लोग जानते ही होंगे। तकनीकी लोगों - फ़च्चों और धुरन्धरों - दोनो का जमघट। कुछ भी तकनीकी दुनिया में हो रहा हो उसकी चर्चा यहाँ तो होती है। यह वह चिट्ठा है जो चिट्ठा या ब्लॉग शब्द का आविष्कार होने से पहले पैदा हुआ था। अग़र किसी स्थल की कड़ी यहाँ किसी लेख में आ गई तो स्थल बैठ ही जाता है आवागमन की वजह से - ज़्यादा भार की वजह से स्थल बैठ जाने का तो नाम ही स्लॅश्डॉटिङ्ग या स्लॅश्डॉट इफ़ेक्ट पड़ गया है।
स्लॅश्डॉट अङ्ग्रेज़ी में है, और अमरीका में केन्द्रित है। इसके बारे में लोगों ने सवाल भी पूछे हैं - कि क्या वे दूसरे इलाकों से सम्बन्धित लेख छापेंगे?, और, क्या वे दूसरी भाषाओं के लेख छापेंगे? दोनों सवालों का जवाब या तो नहीं है या शायद, फिर कभी, बाद में।
उनकी मजबूरी भी समझी जा सकती है, स्थल सम्भालना बच्चों का खेल नहीं है। सो, स्लॅश्डॉट जापान एक है, इसी तरह का एक स्थल स्पेनिश में भी है। पर इनका खालिस स्लॅश्डॉट से कोई सम्बन्ध नहीं है।
अब बात करते हैं शून्य के जालराज, कुलप्रीत सिंह की, जिन्होंने स्लॅश्डॉट पर एक लेख भेजा जो कि रद्दी की टोकरी में गया। मेरे भी एक दो लेख रद्दी में गए हैं, और स्वीकृत तो एक भी नहीं हुआ - पर कुलप्रीत को चढ़ा गुस्सा और उन्होंने लिख मारा शून्य का कूट, रूबी ऑन रेल्स पर।
फिर इसकी घोषणा की गई, लोगों से सुझाव लिए गए, बदलाव किए गए, और अभी तक लगातार किए जा रहे हैं।
मेरा वास्ता शून्य से तब पड़ा जब एक स्कूल के दोस्त ने इसके बारे में बताया कि यहाँ पर गूगल ऐडसेंस का नायब इस्तेमाल हुआ है।
तो शून्य स्लॅश्डॉट से अलग किस तरह से है?
एक तो यह भारतोन्मुख लेख छापता है।
दूसरा इसमें हिन्दी विभाग भी है। तमिल आदि भी आराम से जोड़े जा सकते हैं, सम्भवतः जल्द ही जुड़ जाएँगे।
तीसरा इसमें लेख लिखने वाले लोग अपना गूगल ऐडसेंस कूट प्रदान कर सकते हैं, ताकि उनके लेख के निकट मौजूद विज्ञापनों पर चटका लगाने पर पैसा लेखक को मिले। वैसे फ़िलहाल हिन्दी लेखों के जरिए ऐडसेंस से पैसे बनाना थोड़ा दूर की कौड़ी है, लेकिन अच्छे लेखकों को प्रोत्साहित करने का अच्छा तरीका है।
मई 2006 के तीसरे हफ़्ते में हिन्दी शून्य का उद्घाटन हुआ। अब आप यहाँ पर सत्रारम्भ कर सकते हैं, या फिर सत्रारम्भ किए बिना भी लेख भेज सकते हैं, जो कि सूत्रधारों द्वारा स्वीकृत होने पर छापे जाएँगे। स्लॅश्डॉट में भी यही होता है, ताकि कोई खबर दोहराई न जाए, और अप्रासङ्गिक खबरें न छपें। फिर छपने के बाद, आप लेखों को मत दे सकते हैं, ताकि वे अधिक समय तक पन्ने पर बने रहें, अथवा हटा दिए जाएँ। इस प्रकार यदि सूत्रधार के हाथ से कुछ छूट भी गया हो तो प्रयोक्ता उसे बराबर सकते हैं। और टिप्पणियाँ तो कर ही सकते हैं।
तो इन्तज़ार किस बात का है, शुरू हो जाएँ: http://hi.shunya.in/।
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




अब तो लगातार शून्य से वास्ता जोड़े रखना होगा ऐसा लगता है
लिखते रह कर भी और पढ़ते रह कर भी
बहुत अच्छा प्रयास। शुभकामनाएँ।
बहुत खूब। बधाई हिंदी के आदि चिट्ठाकार को।
भाई सारे नम्बर शून्य नाम का चुनाव करने पर। प्राचीन भारतीय संस्कृति की तकनीकी ऊंचाईयों का यदि सबसे बड़ा प्रमाण है तो वह है शून्य। वाह वाह… आलोक जी आप मोहाली में हैं मैं तो समझा था कि आप बैंगलोर में हैं।
पङ्कज जी अभी दिसम्बर में ही यहाँ आया हूँ। बताया था, पर थोड़ी देर से। पुरानी यादें ताज़ा हो रही हैं।
आलोक, ढेरों बधाईयाँ! आप जाल पर हिन्दी के प्रयोग के नये मार्ग खोजने वाले अन्वेषी हैं तो यह जान कर खास अचरज नहीं हुआ। आपके ब्लॉग से जाना कि आपने टैग के लिये भी नया शब्द ईजाद कर लिया है, चिप्पी। बड़ा क्यूट सा नाम है!
आलोक बस फिर वहीं बने रहना। दिसम्बर में अम्बाला आने का प्रोग्राम बन रहा है। आज कल हिन्दी ब्लॉगमंडल में ब्लॉगर - मीट मीट खेलने का रिवाज है दद्दू मेरा भी मन करे है।।
ठीक है। मुलाकात होती है अम्बाला कैण्ट के सामने बण्टे वाले के यहाँ। निम्बू सोडा खींचेंगे और पञ्जाबी में गालियाँ बकेंगे।