लॉयन अनुगूंज संवाद

लॉ.: क्या बात है अनुगूंज डार्लिंग आज तुमने बहुत देर कर दी.
अ.: बॉस, क्या करूं तमाम चिट्ठों के चक्कर लगा रही थी कि स्मगल किए, चुराए हुए, नकल मारे कुछ चुटकुले चिट्ठाकारों ने लिखे हैं भी या नहीं.

लॉ.: तो क्या खबर है.
अ.: क्या बताऊं बॉस, मुझे तो शर्म आ रही है. खबर बहुत बुरी है.

लॉ.: हम भी तो सुनें.
अ.: कुल जमा आंकड़ा पाँच सौ तक जा रहा है, जबकि चुटकुले 1001 जमा करने हैं और अंतिम तिथि आज, 15 जुलाई की रात है.

लॉ.: लगता है चिट्ठाकारों का अपरहण करना होगा और फिरौतियों में चुटकुले वसूलने होंगे.
अ.: जी हाँ, बॉस आप सही फरमा रहे हैं.

लॉ.: तो फिर डोडा, शाका को बुलाओ और तैयारी करो. हम किसी भी चिट्ठाकार को नहीं बख्शेंगे.
अ.: परंतु, बॉस, कुछ लोगों ने तीस जुलाई तक की मियाद भी तो मांगी है. उनका क्या करेंगे?

लॉ.: पाँच चुटकुलों के लिए तीस दिन की मियाद? लगता है लोग हंसना हंसाना भूल गए हैं. अपहरण तो करना ही होगा और तगड़ी फिरौती वसूली जाएगी. बिना बहस किए डोडा और शाका को बुलाओ. आगे की पिलानिंग करते हैं
अ.: जी, ठीक कहा बॉस, परंतु कल तो रविवार है और चिट्ठाकार अपने चिट्ठे समेत दुकानें बंद कर यत्र तत्र घूमते हैं. ऐसे में अपहरण और फिरौती की योजना नाकाम हो सकती है.

लॉ.: तो ठीक है, अपनी तैयारी तो पूरी रहने दो. हम अपहरण बिना किसी पूर्व सूचना के करेंगे. सोमवार, 17 जुलाई को. इस बीच किसी को कोई चुटकुला याद आ गया और अपना हफ़्ता लिख मारा तो उसे छूट मिल जाएगी, अन्यथा नहीं. परंतु ये बात चिट्ठाकारों को मालूम नहीं होनी चाहिए.
अ.: आपने ठीक फरमाया बॉस.

3 Responses to “लॉयन अनुगूंज संवाद”

  1. [...] गुंडो से दुनिया डरती है। हम भी डरे या न डरें लेकिन डरने का बहाना जरूर करते हैं। लिहाजा रवि रतलामी से डर कर कुछ चुटकुले टाइप कर रहे हैं। खुदा झूठ न बुलाये जितने चुटकुले टाइप किये उससे कहीं ज्यादा जब्त करने पड़े काहे से कि वे सारे हास्टल बिरादरी के हैं। बहरहाल यहां जो चुटकुले हैं उनमें से पहले २० चुटकुले हमने भारतेंन्दु हरिशचन्द्र रचनावली से लिये हैं। खासकर यह बताने के लिये कि आज से १०० साल से भी कुछ पहले किस तरह के चुटकुले चलते थे। उनमें से कुछ आज भी चलते हैं-अंदाज बदलकर। [...]

  2. हम भी डर गये

  3. [...] 21 वें आयोजन के रूप में चुटकुलों के संग्रह के बारे में जब यह सोचा गया था तब उम्मीद थी कि हर चिट्ठाकार हँसता-हँसाता होगा. परंतु दो-दो दफ़ा डराने व धमकाने के बावजूद लोग कम ही हँसे. इस दौर में शायद लोग हँसना भूल गए हैं. [...]

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