वागर्थ में प्रत्यक्षा की कहानी
Posted on अगस्त 17th, 2006 द्वारा अनूप
वागर्थ के अगस्त ,२००६ अंक में हमारे ब्लागजगत की जानी-पहचानी लेखिका तथा निरंतर की संपादक मंडली की सदस्या प्रत्यक्षा की कहानी छपी है। प्रत्यक्षा जी को बधाई देते हुये यह अनुरोध है कि अपनी कहानी को कालर ऊँचा करके अपने ब्लाग में भी पोस्ट कर दें ताकि वह जनता भी जनार्दन इसे पढ़ सके जिसके पास तक वागर्थ पहुँचना मुश्किल है।
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




भई वाह! प्रत्यक्षा जी को बधाईयाँ!
प्रत्यक्षा जी को हमारी तरफ से भी बधाई - उम्मीद है वोह अपने ब्लॉग पर हमें भी कहानी पढने देंगे
[...] [हमने बताया था कि हिंदी की प्रख्यात साहित्यिक पत्रिका वागर्थ के अगस्त ,२००६ अंक में हमारे ब्लागजगत की जानी-पहचानी लेखिका तथा निरंतर की संपादक मंडली की सदस्या प्रत्यक्षा की कहानी छपी है। कुछ लोगों ने इसे पढ़ना चाहा है। वैसे कहने को तो वागर्थ कहने को तो आनलाइन पत्रिका है लेकिन महीनों से पुराना अंक लगा है वहाँ। बहरहाल यहाँ पेश है प्रत्यक्षा जी कहानी-सीढियों के पास वाला कमरा। जानकारी के लिये बता दें कि कहानी में एक जगह अमलताश के फूल लाल बताये गये हैं जिसे वागर्थ वालों ने लाल ही रहने दिया है। यह नमूना है इस बात का कि प्रूफ की गलतियाँकरने का अधिकार सबको है।] [...]
बधाई प्रत्यक्षा जी आप का लेख छपा और अनूप जी आप जानकारी देने के लिये बधाई पा्त्र है
i want to learn south Indian delicacies. Can u help me