दिन दहाड़े लुटेरों का मजाक !

यह क्या मजाक है भाई. हमने तो शाहरुख़ के क्लिष्ट हिन्दी सम्बन्धी टिप्पणी से दुखी हो कर सीधे-सीधे कह दिया था की ‘शाहरुख़ यह बेहूदा मजाक है’. पर इसी प्रेविष्टी को चुरा कर किसी ने हमारे साथ ही मजाक कर लिया.
 जब देखा चोरी केवल हमारे घर के चलताऊ सामान की ही नहीं हुई है, अच्छे-अच्छे घरो से कीमती सामान चुरा कर किसी ने अपना घर सज्जाया है.
कैफेहिन्दी तथा लेयस्पीक नामक संजाल रविजी , अनूपजी, सुनीलजी, अफ्लातुनजी, नीरजजी… ओह! सूची लम्बी है, इन सब के चिट्ठो से सामग्री चुरा कर सज्जा-संवार कर बनाए गए है.
बिना पूछे सामग्री उड़ा लेना चुरा लेने समान ही माना जाएगा. अभी हाल ही में रविजी ने ब्लोग-चोर के बारे में लिखा था. लगता है, यह दिन-दहाड़े लुटने का काम दिन-दुनी रात-चौगुनी फैल रहा है.

39 Responses to “दिन दहाड़े लुटेरों का मजाक !”

  1. बहुत गज़ब है ये! हमने तो इस पर एक लेख भी लिख मारा।
    मेरा अभी भी मानना है कि इन जनाब मे अन्दर कुछ तो शराफत बाकी है, इनका काम करने का तरीका ठीक नही था, लेकिन शायद इरादा व्यवसायिक नही था। लेकिन फिर भी सम्बंधित चिट्ठाकारों से पूर्वानुमति आवश्यक थी। कम से कम साइट का लिंक ही दे देते।

  2. Yeh dono sites ek hi jaisi hein aur ek hi bande ki hein. Whois se ye pata chala:

    http://www.lyspick.com/ ke karta dharta hein:
    Maithily Saran Gupta HUF (cyril@maithily.com)
    Address: A-22 Sector 34, NOIDA - 201301. (UP)
    Tel No. 011 - 26486289

    http://www.cafehindi.com/ ke karta dharta hein:
    Maithily S Gupta
    Indian CompuTrade News (psl@nde.vsnl.net.in)
    AddressL 263, Sant Nagar, East of Kailash, New Delhi 110065.
    Tel No. 11- 26486289

  3. Bachav ka ek tarika to yeh hei ki inko email likhein agar aapko apna content inki site per nahi dikhana hai aur doosra apni Feed mein “Full” ki jagah “Summary” posts publish karein, halanki isse aapke anya pathakon ko asuvidha hogi.

    In dodno sites mein ek antar yeh hai ki ek mein summary post kar post ki kadi di gayi hai aur doosre mein puri post “sabhar” ke nam per chaapi gayi hai. Bina anumati liye ye karna galat hai. Aflatoon ji ka kehna hai ki unko mail likh kar permission maangi gayi hai per weh izazat nahi dene waale.

  4. हे राम ! इसने तो मेरी भी अंतरिक्ष वाले चिठ्ठे से लेख उडा लिया है ।

  5. मैं आप से सहमत हूँ और मैथिल गुप्त जी के इस कार्य का विरोध करता हूँ, गुप्त जी ने यह कार्य पूछ कर किया होता तो कितना अच्छा होता।

  6. सर्वप्रथम नमस्कार एवं अभिनन्दन. मैंने अधिकांश चिट्ठाकारों को ई-मेल पर अनुमति मांगी है. कई बन्धुओं की अनुमति मुझे मिल चुकी है. अनेकों ने मेरे इस प्रयास को सराहा है. मै इस वेबसाईट को बिना किसी व्यावसायिक उद्देश्य के चलाना चाहता हूं. क्यों ?

    संजय बेंगाणी जी, ये मेरा घर नहीं है, हिन्दी का घर है. आपको बुरा लगा, माफ़ी चाहता हूं एव आपका लेख तुरन्त हटा रहा हूं.

    जीतू जी, मैनें हर लेख में साईट का लिंक एव आभार प्रगट किया है. आपके लेख के लिये भी आभारी हूं.

    शेष वन्धुओं के उत्तर का इन्तजार है.
    मैथिली

  7. मैथिली गुप्त जी ने मेरी अनुमति लेकर मेरी रचनाएँ छापी हैं. वैसे भी उन्होंने साभार कड़ी में मेरी साइट का पता दिया है, जो उचित है.

    वैसे, यह नारद का एक पूरक साइट बहुत अच्छा हो सकता है. कुछ चुनिंदा चिट्ठों को संकलित कर पुनःप्रकाशन करने से रीडरशिप ही बढ़ेगी.

  8. हम चिट्ठाकार लोग जब अपने-अपने चिट्ठों पर लिखते हैं तो मूल मकसद होता है संसार के दूसरे ऑनलाइन लोगों के साथ संवाद कायम करना। हमारा पारितोषिक होता है उनकी मूल्यवान टिप्पणियाँ। कुछ लोग व्यावसायिक ब्लॉगिंग की दिशा में भी कदम बढ़ा रहे हैं, जिसके लिए सबसे जरूरी है कि चिट्ठों पर हिट संख्या बढ़े और खासकर गूगल एड पर क्लिक हो।

    यदि हम मैथिली गुप्त की साइटों को अपने-अपने लेख पूर्ण रूप से प्रकाशित करने की अनुमति देंगे तो उनकी साइट तो लोकप्रिय हो जाएगी, क्योंकि सारे अच्छे लेख एक स्थान पर उपलब्ध होंगे। लेकिन हम चिट्ठाकारों के चिट्ठे वीरान हो जाएंगे। हम दूसरे समानधर्मा साथियों के साथ संवाद नहीं कर सकेंगे। हमारे पास टिप्पणियाँ कम आएंगी, जो हमारी धरोहर हैं।
    कैफेहिन्दी नारद का विकल्प नहीं है, रवि जी। नारद हमें मूल चिट्ठे पर भेजता है, न कि पूरे लेख प्रकाशित करता है।
    मैथिली गुप्त जी को इसके लिए हमारे साथ अनुबंध करना चाहिए। यह कोई दो-एक लेख की बात नहीं है। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वह कभी इसका व्यावसायिक दोहन नहीं करेंगे। मैं नहीं मान सकता कि ये केवल सेवाभाव से इसमें लगे हैं। यह निरंतर, नारद या सर्वज्ञ जैसा प्रयास नहीं लगता। इन्हें अपनी साइट पर अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए।

  9. मेरा भी यही मानना है कि, मैथिलि जी चिट्ठों का सार ही छापें और पाठकों को मूल चिट्ठे पर भेजें, अन्यथा ये चोरी ही है। वो अलग बात है कि मेरा चिट्ठा इस लायक नहीं समझा गया :P

  10. सर्वप्रथम पुर्वानुमति के आपका लेख पोस्ट (चोरी) किया, इसके लिये माफ़ी मांगता हूं. यह प्रायोगिक स्वरूप था पूरी साईट तो मैं मार्च के दूसरे सप्ताह तक पूरा करने वाला था.
    सृजन शिल्पी जी, क्या आपके लेख केवल समानधर्मा साथियों के लिये हैं, हम जैसे आम आदमियों के लिये नहीं? कैफ़ेहिन्दी लेखकों के लिये न होकर मेरे जैसे आम आदमियों के लिये है.
    अरे बाप रे, इतना बडा आंक लिया मुझे कि चिट्ठाकारों के चिट्ठे वीरान हो जाएंगे ?

    हम कहां के दाना थे, किस हुनर मैं यकता थे
    बेसबब हुआ गालिब, दुश्मन आसमां अपना.

    मेरा कसूर यही है कि इस 26 जनवरी को घर में कैद रहने के कारण पिछले दो वर्षों की आंच कैफ़ेहिन्दी का स्वरूप तय करने की कोशिश की.

    मुझे जो भी भाई अनुमति देगें सिर्फ़ उन्ही की रचना साभार सहित लिंक सहित उप्योग में ली जायेगी.

    पुन: माफ़ी चाहता हूं

    मैथिली

  11. अच्छी बात है कि मैथिली जी यहां आकर संवाद कर रहे हैं।
    आप अपना परिचय दे कर अपना उद्देश्य एवम योजना के बारे में स्पष्ट करें।
    आपको चीट्ठाकारों को विश्वास में लेना चाहिये था।

  12. मैथिली जी अपनी योजना विस्तार से बताएँ।

  13. “Debashish :Aflatoon ji ka kehna hai ki unko mail likh kar permission maangi gayi hai per weh izazat nahi dene waale. ”
    देबाशीषजी को मैंने चिट्ठाकरिता में तजुर्बेकार साथी के नाते मैथिली का पत्र भेजा था।उन्हें थोड़ी-सी गलतफ़हमी हो गयी कि लगा कि मुझसे अनुमति माँगी गयी है और मैं नहीं दूँगा।मैथिलीजी ने मेरी जो प्रविष्टियाँ छापीं हैं उनकि अनुमति या सूचना नहीं दी थी,एक लम्बे व्याख्यान की मेरी प्रविष्टियों को ‘ई-बुक’ की शक्ल में देने की अनुमति आज जरूर चाही थी।
    मैथिलीजी के उत्तर के बाद मुझे शिकवा नहीं है । मैंने मैथिलीजी का पत्र पाने और उनकी वेबसाइट देखने के बाद देबाशीष,जीतूजी,अनूप शुक्ला,समी्र लाल तथा सृजन शिल्पी से इस प्रसंग में राय-बात की।
    मैथिलीजी का पत्र मैंने सार्वजनिक कर दिया है ( http://samatavadi.wordpress.com/2007/01/31/online-journalism-plagiarism/ ) ।उन्होंने वहाँ भी अपनी टिप्पणी कर दी है ।
    मैथिलीजी मौलिक लेखन द्वारा भी आते रहेंगे,पूरी उम्मीद है ।

  14. जगदीश जी मेरा परिचय? मै एक आम आदमी हूं. कोई लेखक नहीं. बारह वर्ष बैंक में काम किया फ़िर बारह बरस काम किया. अब आराम करना चाहता हूं. मेरा सपना हिन्दुस्तान में डिजिटल मूवीज बनाने का है. पर सपने तो सपने ही होते हैं.

    पच्चीस साल पहले दिनमान पढता था. इन चिट्ठों के कुछ लेखों में मुझे दिनमान की झलक दिखायी दी. इसलिये कैफ़ेहिन्दी शुरू कर दी. वैसे इसे बनाना तो पिछले दो साल से चाहता था. हां मुझे चिट्ठाकारों को विश्वास में लेना चाहिये था. पर मेरे पास सभी का सम्पर्क ई-मेल नही था. जितने भी थे, सभी पर मैंने ई-मेल भेजे थे.

    कैफ़ेहिन्दी किसी योजना के लिये नहीं बल्कि अतिरेक में बनी है.

    मैथिली

  15. मैथिली जी,
    हो सकता है आपके विचार अव्यवसायिक हो, लेकिन आपको इस बात को तो मानना ही पड़ेगा, कि आपके किए गए कार्य को गलत ही मानना जाएगा। आप उम्र मे हमसे बड़े है, हमसे ज्यादा दुनिया देखी होगी आपने, इसलिए आपको कुछ भी समझाना, मेरे विचार से गलत होगा। मेरी कुछ प्वाइन्ट है, आप इस बारे मे सिलसिलेवार जवाब देंगे तो मुझे खुशी होगी।

    १) क्या आप हमे इस बात की गारंटी दे सकते है कि भविष्य मे भी आपकी इस साइट की गतिविधिया अव्यवसायिक ही रहेंगी।
    २) आप अपनी साइट पर एक सूचना चस्पा करेंगे कि, ये सभी चिट्ठाकारों के स्थलों से लिया गया है।
    ३) प्रत्येक लेख के लिए, हर चिट्ठाकार से अलग से अनुमति ली जाएगी।
    ४) लेख के मूल स्वरुप से कोई छेड़छाड़ नही की जाएगी, ना कन्टेन्ट मे और ना ही किसी लिंक में।
    ५) लेख के शुरु और अन्त मे लेखक के ब्लॉग का लिंक दिया जाएगा।
    ६) आप ब्लॉग लेखकों के ही कन्टेन्ट काहे लेना चाहते है?
    ७) यदि आपके उद्देश्य व्यवसायिक है तो अभी स्पष्ट करिए, मै व्यवसायिक उद्देश्य को भी गलत नही मानता बशर्ते मुझे पता हो कि आपकी मंजिल क्या है। यदि व्यवसायिक उद्देश्य है तो आप अपना व्यवसायिक योजना सभी चिट्ठाकारों अथवा उनके प्रतिनिधियों से डिसकस करना चाहेंगे?

    बाकी यदि किसी और साथी को कोई आपत्ति हो तो बेहतर होगा, आमने सामने बात कर ली जाए।

    नोट: इन सवालों के उत्तर पाने के बावजूद भी यह चिट्ठाकार की मर्जी पर निर्भर करेगा कि वह आपको प्रकाशन की अनुमति देता है अथवा नही।

  16. एक चीज और रह गयी थी,
    इन सभी पर जवाब देने से पहले यदि पूर्वानुमति प्राप्त लेखो के अतिरिक्त बाकी सारे लेखों को अपने साइट से हटा लेंगे तो इसे भरोसा बढ़ाने वाले क़दम यानि “गुड गेस्चर” माना जाएगा और बातचीत के लिए अच्छा माहौल तैयार होगा।

  17. व्यवसायिक हो या अव्यसायिक

    माननीय मैथिली गुप्त जी, हर चिठ्ठाकार की मेल आपको पता न हो पर कमेन्ट के जरिये तो पूछ ही सकते थे? पिछले छः महीनो में छः पत्रकार मुझसे लेख छापने की अनुमति माँग चुके हैं और मैने उन्हे सहर्ष दी है। पर आपको नही दे रहा। कृपया मेरा लेख (शराफत अली वाला) हटा ले अपनी आरामगाह से।

  18. भाई मैथली जी

    आप विचलित न हों, यही हमारे परिवार का दस्तूर है. आपने अपना काम किया बाकि सबने अपना. मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं क्योंकि आपने मुझे इस लायक छोड़ा ही नहीं.

    सब आपसे तरह तरह के प्रश्न कर रहे हैं मगर मुझे उससे कोई आपत्ति नहीं और न ही मैं आपसे उस तरह के कोई प्रश्न करुँगा, मैं अलग टाईप का हूँ जैसा कि आपने सही पहचाना और सबके साथ सम्मलित नहीं किया.

    मन विचलित है, बस मेरे अलग धारा में कुछ प्रश्न हैं:

    १. क्या सच में आपको मेरा लिखा पसंद नहीं आया, जो आपने इसे नहीं लूटा और मेरी हालत उस सुंदरी सी कर दी जो इसलिये परेशान है कि मोहल्ले में उसे कोई छेड़ता नहीं है.

    २. मेरा चिठ्ठा पूर्णतः व्यवसायिक है, (ऐसी मेरी सोच है, बाकि जो भी सोचें) क्या आप उसे खरीदेंगे. यह अलग बात है कि जैसा हर व्यापार के साथ होता है कि कोई चलता है कोई नहीं. हमारा नहीं चलता. मगर अंतर्जाल पर एक बार देखा था २८००० डालर कीमत आंकी गई थी,और उसके बाद तो हमने बहुत लिखा है, यहां तक की तस्कर, अरे नहीं, तरकश पुरुस्कार भी मिल चुका है फिर भी as is आधे दाम में बेचने को तैयार हूँ मय साज सज्जा माईनस पुरुस्कार के…तरकश पुरुस्कार मैं नहीं बेचूंगा..क्योंकि वो चिट्ठाकारों का प्यार है और अगर आप हिन्दी सिनेमा देखते है तो आप जानते होंगे कि प्यार बिकता नहीं.

    ३. गुगल रेंकिंग मे भी मेरा ब्लाग ४ पर है १० मे से. मतलब ४०%… गुड थर्ड डिविजन मगर पास विदाउट ग्रेस..ऐसे कठिन परीक्षा में जहां हिन्दी का वरिष्ठ ब्लागर ५०% लेकर सांसे भर रहा है…ऐसी स्थिती में आपने २०% प्राप्त प्योर फेल को लूटा मगर हमको छोड़ दिया.

    उपरोक्त को देख आपको नहीं लगता कि कि लूट से ज्यादा गहन और जटिल मुद्दा आप पर हमारी मानहानि का बनता है, कृप्या जवाब देवें या हमें भी लूटें और इस भीड़ में हमें भी अपने विचार रखने का मौका दें.

    इस लूट के संदर्भ मे एक लेख लिखा है http://udantashtari.blogspot.com/2007/01/blog-post_31.html जरा नजर मार लें मगर बुरा न मानें, हम मौज मस्ती में जीने वाले आआईटम हैं कोई विवाद नहीं चाहते हैं, आप ऊठायेंगे तो भी जवाब नहीं देंगे.. अगर वो विवाद हुआ तो :)

    अब तो आपकी टी आर पी बहुत बढ़ गई है, वहीं से ब्लाग शुरु करो यार. कई पोस्ट तो हिन्दी ब्लाग जगत से परिचय पर ही लिख सकते हो. मैने कई विवादितों को स्थापित होते देखा है फिर आप तो अत्य रहे हैं जरुर स्थापित हो जाओगे. :)

    आप की लूट नजर का आकांक्षी,

    समीर लाल
    http://udantashtari.blogspot.com/

  19. अरे ये चोरी का मामला है क्या हम कुछ दिनों पहले देखे थे इस साईट से कोई आया था अपने ब्लोग पे तो देखने गये कि ये लयस्पीक क्या बला है। वहाँ अपनी साईट के साथ साथ कुछ और भाईयों की साईट देखी साइड बार में। हमें लगा ब्लोग रोल होगा माऊस होवर करके देखना रह गया नही तो हम आपको ये चोरी काफी पहले बता देते। अब हमें क्या पता था हमारे जैसे सच्चे लोग तो बहुत ही कम रह गये हैं ;)

  20. कैफे हिन्दी क्यों - इसमें लिखा है कि ये कही और से लिये गये हैं और अनुमति लेने का दौर जारी है। साथ ही साथ मुझे हर लेख के अंत में लिकं भी दिखा। अब मालूम नही कि ये इस चर्चा के बाद में किया गया या पहले से था। ऐसा भी दिख रहा है कि मि मैथली जी को अपनी गलती का ऐहसास भी हो रहा है। अब जीतू ने सवाल तो दाग ही दिये है देखो क्या जवाब आते हैं।

  21. सब सही है, मान लेता हूँ मैथलीजी अज्ञानताकश यह कार्य कर गए. हम से बड़े है, हम कुछ कहेंगे नहीं. मगर कैफेहिन्दी तथा लेयस्पीक क्या दोनो ही इन्होने बनाए है? अगर हाँ तो, ऐसा भी हिन्दी सेवा की क्या तम्मना जो एक जैसे दो-दो संजाल बनाए.
    आगे हम तो सभी चिट्ठाकार बन्धूओं के साथ है. जो सर्वसहमती से निर्णय होगा वह सर आँखो पर.

  22. मैथिली जी,

    कृपया अपनी निम्नलिखित टिप्पणी का संदर्भ लें:
    “सृजन शिल्पी जी, क्या आपके लेख केवल समानधर्मा साथियों के लिये हैं, हम जैसे आम आदमियों के लिये नहीं? कैफ़ेहिन्दी लेखकों के लिये न होकर मेरे जैसे आम आदमियों के लिये है.
    अरे बाप रे, इतना बडा आंक लिया मुझे कि चिट्ठाकारों के चिट्ठे वीरान हो जाएंगे ? ”

    मैथिली जी, मेरा ब्लॉग इंटरनेट पर सर्वजनसुलभ है और आप जैसे ‘आम आदमियों’ के लिए ही है। सर्च इंजन के जरिए या नारद जैसे एग्रीगेटर जैसे माध्यमों से प्रत्येक ऑनलाइन व्यक्ति वहाँ तक पहुँच सकता है। मैं ऐसे ऑनलाइन आम पाठकों को समानधर्मा समझता हूँ जो मेरे लेखों को पढ़ते हैं और उनपर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं।

    ब्लॉग की अवधारणा व्यक्तिगत विचारों को इंटरनेट पर सहज रूप से प्रकाशित कर सकने की सुविधा के कारण लोकप्रिय हुई थी। ब्लॉगिंग एक तरह से प्रकाशन के क्षेत्र में लघु-कुटीर उद्योग की तरह है। जबकि आपकी साइट किसी बड़े उद्योग अथवा मल्टीनेशनल टाइप के प्रकाशन की तरह है। हर ब्लॉगर अपनी स्वतंत्र पहचान और अस्तित्व को कायम रखना चाहता है। लेकिन जैसे बड़े उद्योग लघु-कुटीर उद्योगों को निगल लेते हैं, ठीक उसी तरह आपकी तरह के साइट कालातंर में छोटे-छोटे ब्लॉग को अपने में धीरे-धीरे समाहित कर लें तो कोई आश्चर्य नहीं। हालाँकि मैं आपकी सदाशयता औऱ सदभावना पर संदेह नहीं कर रहा और आपके इस अभिनव प्रयास की सराहना करता हूँ। आपत्तियों के बाद आपने बगैर अनुमति वाले लेख अपनी साइट से हटा लिया है, यह इस बात का परिचायक है कि आप वर्चस्ववादी नहीं हैं।

    आपका लिस्पिक.कॉम वाला प्रयोग हमलोगों को अधिक जँच रहा है, जहाँ ब्लॉग पोस्टों की केवल समरी प्रकाशित होती है। क्योंकि वहाँ से पाठक मूल ब्लॉग पर आने के लिए प्रेरित होता है।

    आपकी कैफेहिन्दी से ब्लॉगर्स को क्या लाभ होने वाला है? ऊपर जीतू जी ने जो सवाल और शर्तें आपके समक्ष रखे हैं उसके बारे में अपने विचार स्पष्ट करने की कृपा करें।

    आप कृपया अपनी नीति को अपनी साइट पर घोषित करें और संबंधित ब्लॉगर्स के साथ अनुबंध करने की दिशा में सोचें। इस तरह का उद्यम बगैर अनुबंध के लंबे समय तक चलाना उपयुक्त नहीं होगा।

    उपर्युक्त बातें मैंने कई वरिष्ठ ब्लॉगर्स से विचार-विमर्श के बाद रखी हैं और उसे आप हिन्दी ब्लॉगर्स का बहुमत समझ सकते हैं।

  23. मेरी समझ से मैथिलीजी का जिन चिट्ठाकारों से संपर्क ना हो पा रहा हो या जो पूरे लेख न देना चाह रहे हों, उनके चिट्ठों को आंशिक रुप से ही प्रकाशित करना चाहिये। प्रविष्टियों के साथ लिखकों के नाम, चिट्ठे और लिंक्स प्रारम्भ तथा अन्त में दिने चाहिये।

  24. na to mera koi lekh liya gaya hai na hi mai itana achchha likhata hun ki liya jaye. mai uprokt sabhi logo ki baaton ko padha sabhi apni jagh thik hai. apne lekh ko kisi ko dene mae koi aapati nahi honi chahiye agar yah prayas vayvsaik n ho. ek baat aur kisi ke blog par koi lekh aane ke 30 dino ke baad hi maithili Ji le. isse palale nahi. taki main lekhak ke blog par koi kami n aaye.
    jitu ji ki baat uchit hai .
    inke blog par us lekh ke liye koi tippni ki vyavstha n ho. aur tippni ke liye lekhk ke hi blog ka lik diya jaye.

    aur jisko jo uchit lagata ho. :)

  25. हालांकि मेरा कोई लेख कैफ़ेहिन्दी पर नहीं लिया गया है, और मैं लिखता भी बहुत कम हूँ, फिर भी अपना इतना अधिकार समझता हूँ कि इस विषय पर कुछ विचार रख सकूँ.

    यह स्वीकार्य हो सकता है कि मैथिली जी भविष्य में अपनी दोंनों साइटों को अव्यवसायिक रखेंगें. जैसा कि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है, उनका उद्देश्य है स्वान्त: सुखाय - एक आत्म संतुष्टि. अधिकांश चिट्ठाकारों का भी अपने चिट्ठे लिखने का यही उद्देश्य होता है (कोई भी यह सोचकर नहीं लिखता कि उसके विचारों से विश्व में एक नयी वैचारिक क्रांति आयेगी या वो भाषा/साहित्य को समृद्ध करेगा). पर यदि मैथिली जी को उनकी आत्म-संतुष्टि उनकी साइट के मूल लेखकों की आत्म संतुष्टि की कीमत पर मिलेगी तो संभवत: वे स्वयं ही इसे नहीं स्वीकार पायेंगे.

    मैथिली जी, कैफ़ेहिन्दी देखकर इतना तो स्पष्ट है कि आप साज-सज्जा में माहिर हैं और अच्छे-बुरे लेख की खासी समझ रखते हैं [इसीलिये मेरे लेखों को स्थान नहीं मिला होगा :) ], तो बाकी चिट्ठाकारों के साथ मिलकर समवेत स्वर (http://narad.akshargram.com/akshargramnetwork/) के अन्तर्गत अपनी ऊर्जा-क्षमता का सदुपयोग स्वान्त: सुखाय से भी व्यापक उद्देशय सर्वे भवन्तु सुखनि: के लिये भी कर सकते हैं. इससे चिट्ठाकारों में भी यह भावना आयेगी कि आप अंदरवाले हैं, कोई बाहरवाले नहीं. विशेषकर निरंतर (http://www.nirantar.org/) की टीम यदि उचित समझे तो मैथिली जी को अपनी विशिष्ट टोली में शामिल कर सकती है. अगर ऐसा होना संभव नहीं है या मैथिली जी इसके इच्छुक नहीं हैं, तो भी उनमें इतनी क्षमता तो अवश्य है कि वे अपने बलबूते पर ऐसी हिन्दी पत्रिका निकाल सकेंगे जिसमें प्रकाशित लेख विशेषकर उनकी पत्रिका के लिये ही लिखे होंगे. मेरी समझ से कैफ़ेहिन्दी का वर्तमान स्वरूप मैथिली जी के अलावा शायद ही किसी और के लिये उद्देश्यपूर्ण हो.

    मैथिली जी किराने की छोटी-छोटी दुकानों के सामने एक सुपरमार्केट खोलें तो कोई आपत्ति नहीं, पर उसमें बिकने वाला माल सौ फ़ीसदी असली हो, ऐसी अपेक्षा शायद हम दुकान वाले भी रखें और शायद खरीदार भी.

  26. जिस किसी चिट्ठाकार भाई का लेख हिन्दी कैफे पर अभी भी पूर्वानुमति के बिना लगा हुआ हो, तो यहाँ पर रिपोर्ट करिए, रिपोर्ट सम्बंधित चिट्ठाकार को स्वयं ही करनी होगी।

    मैथिली जी, आपके जवाबों का बेसब्री से इन्तज़ार है।

  27. आदरणीय मैथिली जी,
    ब्लॉगजगत के मित्रों से प्राप्त सूचना के बाद मैने आपकी साइट देखी. वहां मेरे लिखे लेख आपने बिना मेरी अनुमति के प्रकाशित किए हैं. सादर निवेदन है कि आप उन्हें वहां से हटा दें. मैं आपका आभारी रहूंगा.
    यदि मेरे लेख में आपको गुणवत्ता दिखाई पड़ती है और आप उसे प्रकाशित करना चाहते हैं तो इसके लिए आपको मुझे पारिश्रमिक देना चाहिए. आप इसका व्यवसायिक या अव्यवसायिक चाहें जिस तरह का इस्तेमाल करें.. किंतु पारिश्रमिक के बारे में अवश्य विचार करें.

    भवदीय
    नीरज दीवान (कीबोर्ड का सिपाही)

  28. आदरणीय मैथिली गुप्त जी!

    आपके जैसे हिंदी प्रेमी के तकनीकी कौशल की हमारे समूह को बहुत आवश्यकता है. आप निश्चित रूप से अच्छे वेब-डिज़ाईनर हैं और वेब पर हिंदी के प्रसार में यह बहुत उपयोगी है.

    हिंदिनी पर प्रकाशित सामग्री का बिना अनुमति पुन:प्रकाशन निष्विद्ध है - सो उन्हें cafehindi आदी से हटा दें- मेरे और फुरसतियाजी के लेख भी!

    हां सामूहिक प्रोजेक्ट्स में आप हमारा कैसे सहयोग कर सकते हैं जरूर बताएं!

    धन्यवाद
    ई-स्वामी

  29. पूरा दिन गुजर गया, मैथली जी का कोई जवाब नहीं आया!! न जाने क्या बात है?
    बड़ी चिंता सी हो रही है.
    सृजन शिल्पी जी, थोड़ा फोन लगा कर देखना, सब ठीकठाक तो है?

    :)

  30. सर्वश्री चिट्ठाकर बन्धुगण;
    सादर नमस्कार एवं अभिवादन.
    कैफ़ेहिन्दी के दौरान मेरे पास काफ़ी ई-मेल आये. ढेरों मै मेरे इस प्रयास को सराहा गया. कई जबरदस्त सुझाव मिले. कई एसे ई-मेल भी मिले जिनमें ‘संसदीय’ भाषा का इस्तेमाल भी किया गया था. आश्चर्यजनक रूप से आपके चिट्ठों मेरी इतनी चर्चा भी हुई. सभी के लिये धन्यवाद.

    ई-स्वामीजी, आपको जहां भी मेरी आवश्यकता है, मैं हाजिर हूं. (आपके और फ़ुरसतियाजी के लेख कैफ़ेहिन्दी से हटा दिये गये हैं.)

    नीरजजी, मैंने आपके लेख हटादिये हैं. कैफ़ेहिन्दी भविष्य में आपके सहयोग का इन्तजार रहेगा.

    अमितजी, प्रेरित करने के लिये धन्यवाद, लेकिन मैं इतना सक्षम नहीं हूं कि सिर्फ़ अपने बूते पर ये पत्रिका निकाल सकूं. कैफ़ेहिन्दी एक छोटे आदमी का अच्छी बात को आगे बढाने का छोटा सा प्रयास है. ये सुपर मार्केट नहीं है.
    संजय बेगाणी जी, लिजपिक सार्वजनिक संजाल नहीं था, ये तो केवल मेरे लिये मेरे पसंददीदा ब्लोग्स की फ़ीड एकत्र करके मेरे लिये निर्देशिका बना रहा था. बहरहाल इसे बन्द कर दिया गया है. आपने पूछा है कि एसी भी हिन्दी की सेवा की क्या तमन्ना, हिन्दी के लिये मेरे योगदान पर चर्चा कभी ऒर सही.
    तरुण जी, हर लेख मैं लिंक पहले दिन से ही था. हां कैफ़ेहिन्दी क्यों वाला हिस्सा बाद मैं जोडा गया.
    समीर लाल जी, आपके व्यंग्य काफ़ी अच्छे हैं. जबलपुर ने हमें परसाई जैसा महान व्यंग्यकार दिया हैं. शायद ये जबलपुर के पानी का ही असर है. मुझे आपकी रचनाओं का इन्तजार है.
    अतुल जी, हां मैं कमेन्ट के जरिये पूछ सकता था, लेकिन लोग कमेन्ट के जरिये अपनी वेबसाईट को लोकप्रिय कराने के लिये कमेन्ट फ़ीड करते हैं जिसे अच्छा नही मना जाता. धन्यवाद. आपके सुझाव के बाद मैने कमेन्ट के जरिये अनुमति के लिये पूछा है.
    जीतू जी आपके प्रश्नों के उत्तर.
    1. हां मेरी ताजिन्दगी भविष्य में भी इस साईट की सारी गतिविधियां अव्यावसायिक ही रहेंगी.
    2.हर लेख के अन्त में चिट्ठे का लिंक है. अमितजी से प्रेरित होकर में वेबसाईट मैं मौलिक भी देने की सोच रहा हूं
    3.अब मैं हर चिट्ठाकार साथी की इच्छानुसार अलग से अनुमति ही ले रहा हूं
    4.लेख के कैसे भी स्वरूप या कन्टेन्ट यथावत रहेंगे. चिट्ठों में लिक कभी कभी डाउनलोड के लिये भी होता है, जिसे रचनाकार की सहमति से काटा जा सकता है.
    5.लेख के अन्त में ब्लाग का लिक दिया जायेगा. लेख के शुरू में ब्लाग का मोनो लिंक सहित देने की योजना है.
    6.क्योंकि ये मुझे पसन्द हैं लेकिन कैफ़ेहिन्दी में आगे विशेष रूप से तैयार किये लेख भी रखने का सपना है.
    7. उद्देश्य एकदम अव्यवसायिक है. किसी भी तरह की आमने सामने परिचर्चा में आपका स्वागत है.
    इसके अतिरिक्त ई-पडिंत श्रीश जी ने अपने चिट्ठें मैं मेरा स्वागत किया इसका भी धन्यवाद.
    कुछ पारअवारिक आयोजन के कारण देरी के हुई इसके लिये माफ़ी,
    आपका
    मैथिली

  31. मुझे तो अमित का सुझाव पसंद आया था। मैंने बिना विस्तार में सोचे-समझे कल की चिट्ठाचर्चा में अपनी राय जाहिर की थी कि मुझे किसी किसिम का कोई एतराज नहीं है अगर कोई मेरे लेख कहीं भी छापे। अभी भी मेरा यही मानना है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा था कि मैं हिंदिनी पर लिखता हूं और वह साइट स्वामीजी की है लिहाजा उनकी बात ही इस मामले में अंतिम होगी। मैथिलीजी, आप जैसे व्यक्ति की हिन्दी प्रसार में महती भूमिका हो सकती है। आइये, हमारे साथियों के साथ ये सब आपको भी सहायता देंगे और आपके सहयोग से हम सब मिलकर बहुत कुछ कर सकते हैं। आप जिस सक्रिय अन्दाज में जवाब दे रहे हैं इससे मुझे आपके इरादों में कोई कपट या छल या बुरी नीयत बिल्कुल नजर नहीं आती। हमारे कुछ साथियों ने तात्कालिक प्रतिक्रियायें दी होंगी उनमें से कुछ ‘संसदीय’ भी होंगी लेकिन आपसे अनुरोध है कि आप उनके पीछे की भावना ग्रहण करें ,शब्द नहीं। आप आयें हम सब साथ चलें-
    अपने प्रिय कवि विनोद श्रीवास्तव की लाइनें दोहराते हुये और आपको किसी भी नेक काम में व्यक्तिगत सहयोग का आश्वासन देता हूं:-
    आओ भी साथ चलें हम-तुम
    मिल जुल ढ़ूंढ़े राह नयी,
    संघर्ष भरा पथ है तो क्या
    है संग हमारे चाह नयी।

    आपके लिये मेरा शुभकामनायें।

  32. आदरणीय मैथिलीजी,

    मैं आपका स्वागत करता हूं!

    आप शायद समूह से परिचित आप पहले ऐसे व्यक्ति होंगे जिनके ब्लाग की कडी अभी भी एक खोज का विषय हो. अपना ब्लाग बनाएं फ़िर गूगल ग्रूप्स में चिट्ठाकार समूह की औपचारिक सदस्यता लें, नारद से फ़ीड जुडवाएं. ताकी आप ज़रा और ‘अपने वाले’ महसूस होने लगें!

    वैब एक बहुत स्वतंत्र माध्यम है. हमेशा की तरह आप अपने समय में जैसे भी चाहें हिंदी की सेवा करें, इस समूह में सभी खुश ही होंगे.

    विचारणीय रहा है, की हम विकल्पों की उपलब्धता के लिये किस हद तक प्रयत्नों का दोहराव चाहते हैं? उदाहरण: हमारे पास पहले ही नारद, हिंदीब्लाग्स और चिट्ठा-चर्चा जैसी साईट्स हैं. कैफ़ेहिंदी आपका सपना है ये मानता हूं और इसका सम्मान करता हूं, साईट अच्छी है. वहीं वो समूह के लिये सही माईनें में क्या वैल्यू-एडिशन करती है, आप खुद आंकें! जहां तक वैब पत्रिका की बात है nirantar.org हमारी सामूहिक वैब पत्रिका है उसे भी देखें.

    आप तो अपनी रचनाधर्मिता और सृजनशीलता से कुछ अलग कुछ नया दे सकते हैं - कुछ नया बनाने में औरों का सहयोग कर सकते हैं. इस विषय में विचार करें - निवेदन है. और अगर किसी भी प्रोजेक्ट से सीधे जुडना हो तो जानकारी के लिए जीतू उर्फ़ नारदजी से संपर्क करें.

    धन्यवाद,
    ई-स्वामी

  33. मैथिली जी,
    आपके जवाब हमे मिल गए है, सभी चिट्ठाकार साथियों को इसे पढने मे थोड़ा समय लग सकता है। तब तक आपसे निवेदन है कि बिना अनुमति के लेखों को अपनी साइट से हटा दें।

    आप चिट्ठाकार ग्रुप की सदस्यता ग्रहण करें। देबू भाई, मैथिली जी को न्योता भेजिए।

    बाकी चिट्ठाकारों से भी निवेदन है कि संयत भाषा का प्रयोग करके, इस मसले को सुलझाने का प्रयत्न करे। संसदीय भाषा की हमारी कोई परम्परा नही है, और ना ही हम इसमे विश्वास करते है। आशा है जिन चिट्ठाकारों ने इस भाषा का प्रयोग किया है वे इस बारे मे जरुर विचारे करेंगे।

  34. मैथिली जी, आपने मेरे भी कुछ लेख वहाँ प्रकाशित किये हैं, जो मेरे लिये आश्चर्य मिश्रीत प्रसन्नता की बात थी,ठीक उसी तर्ज पर जैसे समीर जी के लिये, उनके लेख नही लिये जाने पर आश्चर्य मिश्रीत दुख की बात थी!!
    इन सब मामलों के लिये मै इन लोगों की कमजोर साथी चिट्ठाकार हूँ! अत: इन लोगों की राय मे ही मेरी सहमति मान लें.

  35. ye hui na baat :)

  36. […] हमने देखा कि सबसे ज्यादा हल्ला मचाने वाले लोग वे लोग थे जिनकी पोस्ट मैथिलीजी ने अपनी साइट पर नहीं लगाईं। जीतेंद्र के सारे जुगाड़ धरे के धरे रह गये, ई-पंडित का पोथा छुआ तक नहीं गया और ऊड़नतश्तरीं ऐसे ही चक्कर मारती रही-दोनों में से किसी साइट पर लैंड नहीं की। संजय को भी लोगों ने यही समझाया जो जोगलिखी वही होगी। उनको निराशा ने इतना घेरा कि वे आकर चौपाल में अपना रोना रोने लगे- लुटेरे दिन में भी मजाक करते हैं। […]

  37. मेरे भी कुछ लेख कैफे हिन्दी में छपे हैं मुझे खुशी है कि किसी ने मेरे लेखों के इस लायक समझा कि इनहें अपने चिट्ठे पर छापे।
    मेरी चिट्ठियां कौपीलेफ्टेड हैं न केवल उनका पर आप सब का स्वागत है। आप इन्हें प्रयोग कर सकते हैं।
    मेरी समझ में, इस समय जरूरत है कि हिन्दी चिट्ठे तथा अन्तरजाल में हिन्दी बढ़ें, यह भी एक तरीका है। यदि लिंक दी है तो कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये। कुछ और लोग इसी बहाने पढ़ेंगे।

  38. उन्मुक्त जी धन्यवाद;
    अभी फ़िलहाल आप लोग मुझे अपरिचित समझें पर मेरा कोई गलत उद्देश्य नहीं है. जीवन में हम सभी को न चाहते हुये भी कई बार अप्रिय फ़ैसले लेने पडते हैं. कैफ़ेहिन्दी आज आपकी कसौटी पर खरी न उतर सकी. भविष्य में ये शायद आप सभी के मानकों के अनुकूल बन सकेगी.

    जीतू जी के सलाह पर मैं भी इस रविवार को अपना चिट्ठा शुरू करने की कोशिश करूंगा, भले ही आप जितना अच्छा न लिख सकूं.

  39. अंततः मुझे लगता है कि चिट्ठाकार साथियों को कुछ चीजें साफ हो गईं. चोरी करना और साभार सहित, रचनाकार के नाम सहित, कड़ी सहित रचना छापने में कुछ तो अंतर है.

    मैंने पहले भी कहा था और अब भी कहूंगा कि कैफ़े हिन्दी जैसा आयोजन “मानव-द्वारा संपादित नारद का एक बढ़िया और असरकारी पूरक रूप” हो सकता है (विकल्प की बात नहीं की जा रही) जिसमें कुछ चुनिंदा चिट्ठों को पूरा का पूरा पुनः प्रकाशित किया जाए (पूर्वानुमति से ही सही). अभी तो 400 चिट्ठे हैं. जब 4000 या चार लाख होंगे तो आप हिन्दी के एक पाठक से उम्मीद नहीं कर सकते कि वह सबको और सभी को खोज खोज कर पढ़ेगा. ऐसे में चर्चित, चुनिंदा चिट्ठों को कैफ़े हिन्दी द्वारा पढ़ा जा सकेगा. चिट्ठा चर्चा का स्वरूप दूसरा है, वह न तो नारद का न कैफ़े हिन्दी जैसे किसी आयोजन का विकल्प हो सकता है.

    और, यह तो एक शुरूआत है. कैफ़ेहिन्दी जैसे विचार अब हिन्दी में आने लगे हैं तो आगे देखियेगा - और भी दर्जनों नए प्रयोग दिखेंगे.

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