अनुगूँज 23: आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुड

आजकल चिट्ठे नही पढ पा रहा हूँ लेकिन कुछ दिनों पहले तक देखा लगभग सभी चिट्ठाकार बडे उत्साहित Akshargram Anugunj ( या किसी और कारणवश, पता चलते ही सरेआम बता दिया जायेगा) होकर टैग होने के बाद पांच सवालों के जवाब दे रहे थे। क्या नये क्या पुराने सभी चिट्ठाकारों ने इन सवालों के जवाब दिये। मुझे एक बार फिर से अनुगूँज का कुछ भविष्य नजर आया, सोचा क्यों ना एक बार और कोशिश करके देखी जाय। तो साथियों पेश है अनुगूँज 23 अपने विषय के साथ - आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुड ( या आखिर भारतीय फिल्मों के आस्कॅर में असफल होने की वजह क्या है) । आप इन दोनों में से कोई भी विषय रख सकते हैं।

अभी अभी फिल्मों के मशहूर अवार्ड आस्कॅर समारोह का समापन हुआ, इस बार भी इस समारोह में विदेशी फिल्मो की श्रेणी में एक हिन्दी फिल्म शामिल थी। ये अलग अफसोस की बात है कि ये कनाडा का प्रतिनिधित्व कर रही थी। अंत में ये फिल्म भी अन्य हिंदी फिल्मों की तरह अंत में मात खा गयी, इस बार मात दी जर्मनी की फिल्म ने। वहीं इस बार के आस्कॅर की एक खास बात ये थी कि इसमें मैक्सिको की काफी फिल्में (स्पेनिश भाषा) अलग अलग श्रेणियों में शामिल थी। आखिर क्या वजह है कि हिन्दी को छोड के लगभग सभी अन्य भाषाओं (मुख्य) की फिल्में आस्कॅर में अपने पहुँच बडाती जा रही है। भारतीय फिल्म उधोग विश्व में दूसरे नंबर पर तो आता ही है फिर क्या वजह है कि ये आस्कॅर में कहीं नही टिकता। इन भारतीय फिल्मी हस्तियों का आस्कॅर में भारतीय फिल्में ना आने, इस समारोह को नकार देना कहीं “दिल को बहलाने के लिये गालिब ये ख्याल अच्छा है” जैसी प्रवृति तो नही। जिस समारोह में अन्य देश अपनी फिल्मों को भेजने में ही नही बल्कि उनके जिताने के लिये भी उत्साहित रहते हैं वहीं हमारे असफल रहने की वजह क्या है। क्या हम सिर्फ फिल्में भेज एक खानापूर्ति कर रहे हैं? या ये विचारों का अंतर है कि हमारी पसंद औरों की पसंद से कुछ अलग है? और या ये भारतीय फिल्मकारों की आपसी जलन है जो किसी दूसरे फिल्मकार की फिल्म भेजे जाने में अंदर से शायद उसकी असफलता की ही कामना करते हैं? क्यों ये फिल्मकार “अंधों में काने राजा” की तरह विभिन्न भारतीय उधोग घरानों या मीडिया द्वारा चलाये या दिये जाने वाले पुरस्कारों में ही अपनी जीत देखते हैं?

मुझे तो लगता है कि इसकी मुख्य वजह उस भाषा की इज्जत नही करना है जिस भाषा में वो फिल्म बनी है। अगर हिन्दी फिल्मों के कलाकार ही फिल्म के डायलॉग भर बोल के इति समझ लेंगे तो हम कैसे दूसरे विदेशियों से ये आशा करें की वो इन फिल्मो को देखेंगे ही। आप लोगों के विचार आमंत्रित हैं कि आखिर क्या वजह है कि हम आस्कॅर तो एक भी नही जीत पाये लेकिन फैशन की गुडियों की दौड में बहुत कुछ हासिल कर लिया। क्या आस्कॅर का फैशन प्रतियोगिताओं से कम व्यवसायिक पहुँच होना मुख्य वजह हैं? आप अपने विचार मार्च की 31 तारीख तक अपने चिट्ठों में अनुगूँज का लोगो लगा के पोस्ट कर सकते हैं। अनुगूँज के नियम आप यहाँ पर पढ सकते हैं, अगर नवोदित चिट्ठाकार इस असमंजस में हैं कि ये अनुगूँज क्या बला है तो संक्षेप में इसे समझाऊँ तो कहूँगा कि ये भी एक तरह का टैग ही है जिसमें अलग अलग पांच चिट्ठाकारों को टैग करने के बजाय खुला आफॅर दिया जाता है (यानि की टैग किया जाता है), बजाय पांच सवालों के एक ही विषय दिया जाता है। ज्यादा जानकारी के लिये आप पुरानी अनुगूँज की प्रविष्टियां भी देख सकते हैं। आशा है आप सभी इस अनुगूँज को भी “पांच सवाल पांच जवाब” वाले टैग की तरह सफल बनायेंगे।

प्रविष्टि पोस्‍ट करने की अंतिम तिथी है मार्च 31, 2007

नोटः ये जरूरी नही कि पहली या अंतिम पोस्ट, आयोजित करने वाला सदस्य ही लिखे कोई भी कभी भी लेकिन अंतिम तारीख से पहले लिख सकता है। शुभस्य शीघ्रम् (अंतिम शब्द मुझको गलत लग रहा है)

14 Responses to “अनुगूँज 23: आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुड”

  1. […] साथियों, काफी समय के अन्तराल के बाद अनुगूँज फिर से आपके सामने प्रस्तुत है। इस बार अनुगूँज का आयोजन कर रहे है, तरुण भाई, जो निठल्ला चिंतन करते है। इस बार का विषय है, हम काहे बताएं, आप खुद ही यहाँ जाकर देखो ना। […]

  2. मेरी शुभकमनाएं यह अनुगूँज सुपर-सफल रहे.

    समय आपने ज्यादा दे दिया है. जो उत्साह को कम करने वाला है.
    लिख देंगे अभी तो समय है, देख लें दुसरे क्या लिखते है… वगेरे भाव जगते है.

  3. बहुत अच्छा जी जब से में आया था चिट्ठाजगत में अनुगूंज का आयोजन नहीं हुआ था। मैं सोच भी रहा था कि ये इतिहास बन गई क्या अब। आपने पुनः इसे चालू किया, बधाई !

  4. पिछले साल इन्हीं दिनों संजय भाई आयोजित मेरे जीवन में धर्म का महत्व और उसके बाद रतलामी जी द्वारा आयोजित चुटकुले के बाद वैसे खास मजा नहीं आ रहा था अनूगूंज में। और बहुत दिनों से इन्तजार भी था मैं आजकल में इस विषय पर अपने चिट्ठे में बात करना चाह ही रहा था कि आपने खुश खबरी सुना दी, धन्यवाद।

  5. ये अनुगूँज बहुत अच्छा लगा मुझे। कोशिश करूंगा कि मैं भी इसमे हिस्सा लेकर कुछ विचार व्यक्त करूँ।

  6. @संजय, शुक्रिया :) आप सही कह रहे हैं लेकिन क्रिकेट विश्वकप के चलते थोडा ज्यादा वक्त दिया है अन्यथा इसके लिये भी १५ दिन काफी थे।

    @श्रीश, सागर, सोमेश, पहले आप लिखिये फिर औरों को पकड के लिखवाईये ;)

  7. तरुण भाई,

    धन्यवाद अनुगूंज को पुनर्जिवीत करने के लिये ! विषय भी अच्छा चुना है आपने ! काफी सारी प्रविष्टीयो की उम्मीद है।
    हम तो लिखेंगे ही :)

  8. तरुण भाई,
    नमस्ते!
    विषय अच्छा चुना है आपने -
    सवाल भी सही दिशा खोजने मेँ उपयोगी साबित होगा -
    ये मेरा मँतव्य है -
    मैँ अपना चिठ्ठा किस तरह” अनुगूं ” मेँ शामिल करूँ ?
    मेरा तकनीकि ज्ञान बहोत ही कम है -
    क्या यहीँ पर मेरे विचार लिखूँ ?
    सुझायेँ ..
    उत्तर की प्रतीक्शा मेँ,
    –लावण्या

  9. […] चलते चलतेः अनुँगूज में अभी तक शायद एक ही एंट्री आयी है और १३ दिन शेष, कहीं ऐसा ना हो कि अनुँगूज का डिब्बा भी पाकिस्तानी टीम की तरह वक्त से पहले ही गोल ना हो जाये। ये घटनायें भी ना चैन से अपना काम नही करने देती सोचा था कुछ दिन गायब रहेंगे लेकिन रहने नही देती। […]

  10. ये लिजीये हमारी प्रविष्टी

    आशीष

  11. […] सबसे पहले तो मै तरुण भाई को २३वें अनुगूँज को आयोजित करने के लिए बधाई देना चाहूंगा। इस बार का विषय है ऑस्कर, हिन्दी और बॉलीवुड। आइए आगे बढने से पहले ऑस्कर अवार्ड के बारे मे जाने। […]

  12. तरुण भाई
    मेरी प्रविष्टि को भी देख लीजिए

    http://www.jitu.info/merapanna/?p=693

    (कुछ व्यक्तिगत कारणो से जल्दी समेटी है, कारण आपको अकेले मे बताऊंगा)

  13. […] अनुगूँज 23: आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुडअनुगूँज 22 :हिन्दी के शब्द-संग्रह का आग्रहअवलोकन: अनुगूँज 20 - नेतागिरी, राजनीति और नेताअनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेताअनुगूँज १९ - “संस्कृतियाँ दो और आदमी एक” […]

  14. […] दोनों के चेहरे पर मुस्कुराहट के सवाल थे और जानने की जिज्ञासा..पर हम चालू थे सत्यनाराय़ण कथा बाचने वाले पंडित जी की तरह.. अब हिन्दुस्तान अमरीका बने इसमें किस को क्या एतराज है आज नहीं तो कल बन ही जायेगा शायद 90 साल का इंतजार भी ना करना पड़े पर तब अमरीका तब क्या होगा इस पर तो कोई चर्चा ही नहीं है… अब हम हिन्दुस्तानी बड़े आशावादी है जब कोई कहता है “हिन्दुस्तान अमरीका बन जाये” तो यह मान ही लेते हैं कि इसका मतलब “अमरीका हिन्दुस्तान हो जायेगा”.. हो सकता है जब तक हिन्दुस्तान अमरीका बने तक अमरीका “सुपर-अमरीका” बन जाये… 40 रुपये का डालर 400 रुपये का हो जाये .. लेकिन ऎसा मानना हमारे देश के प्रति अन्याय होगा वो भी साठोत्तर स्वातंत्र्य वाले वर्ष में.. इसलिये हम अपनी पसंद के हिसाब से जो भी हो माने जाते हैं….माने भी क्यों ना जब अनुगुंज 22 दूसरी बार होगी तो ऎसा ही तो होगा ना … संजय भाई भी चुप हैं जो पहले भी अनुगूंज 22 करवा चुके हैं…या फिर तरुण जी अमरीका में अपने कंट्रोल पैनल के पेंच खुलवा रहे होंगे समीर जी के स्क्रूड्राइवर से कि ये क्या हो गया 23 के बाद 22 कैसे आ गया..खैर ये तो अक्षरग्राम चौपाल के पंच जाने ..हम तो अभी पांच जबर्दस्त पंच तलाश रहे है कि इस बार कि अनुगूंज (नम्बर में क्या जी..) में क्या लिखें…   […]

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