अवलोकन अनुगूँज 23: आस्कॅर, हिन्दी और बॉलीवुड
इस बार के अनुगूँज की प्रविष्टियां देख कर हमें यही कहना पड़ेगा कि बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। कुल जमा तीन प्रविष्टियां, वो तो भला हो आशीष और जीतू का जिन्होंने क्रिकेट की अंतिम जोडी की तरह कुछ तो खाता आगे बढाया वरना अपने कागज के शेर (धूरंधर पूराने शातिर हिन्दी चिट्ठाकार) भारतीय क्रिकेट टीम के शेरों की ही कहानी एक बार फिर दोहरा गये। इनकी तुलना आप भारतीय क्रिकेट टीम के शेरों से अक्षरशः कर सकते हैं,
उनके भी पर्सनल रिकार्ड धांसू और इनके भी पर्सनल रिकार्ड धांसू, वो भी बडे (ग्रुप) आयोजन में टांय टांय फुस्स और ये भी ऐसे आयोजन से नदारद। मध्यम क्रम के चिट्ठाकार एक दूसरे की पीठ खुजाने में व्यस्त थे तो यहाँ खाता कहाँ से खोलते। हमने गलती करी की अपनी आधी से ज्यादा बात उदघोषणा के वक्त कह दी और थोडी अवलोकन के लिये बचा के रख दी। हमें अगर पता होता कि कोई मैदान में ही नही उतरेगा तो बजाय घोषणा में कहने के अलग से चेप देते। मोहल्ले की टीम के कप्तान ने भी हमारी किसी पोस्ट में टिप्पणी करके पूछा था घरेलू श्रृखंला (धर्म की बहस) के अलावा भी कोई टूर्नामेंट होता है तो हमें बताओ हम भी खेलेंगे, हमने भी तुरंत मौका लपकने की गरज से इस आस्कर वाले आयोजन का पता बता दिया लेकिन वो अपनी कथनी को करनी में बदल नही पाये और घरेलू श्रखंला में ही व्यस्त हो कर रह गये। यानि कि कुल मिलाकर इस आयोजन का भी कुछ कुछ वैसा ही हाल हो गया जैसा कि इस बार के क्रिकेट महाकुंभ का। चलिये अब अनुगूँज नामक इस आयोजन को अपना आखिर सलाम कहने से पहले अब तक की कहासुनी (या बतकही) का कुछ अवलोकन कर दें।
इस अनुगूँज की घोषणा करते ही सबसे पहले बाउंड्री मारी लावण्या जी ने, एक एक सवाल का कुशलता से जवाब देती गयीं। उन्होने शुरूआत करी कुछ ऐसे - ” उत्तर अमरीका मेँ रहती अवश्य हूँ परँतु, फिर भी मेरा अवलोकन व मत सर्वथा, “निष्पक्ष ” है”, उनका आगे कहना था कि “अगर भारतीय फिल्म ऐसी हो, जो भारत को दकियानूसी, रुढीवादी , पुरातनपँथी बता रही हो, जैसे दीपा मेहता जी की,”वोटर” या (सत्यजीत रे की पुरानी फील्म, ” पाथेर पँचाली” तो, उसे अवश्य “तेज केँद्र मेँ चुँधियाती रोशनी ” = मतलब ” लाइम लाईट” मेँ खडा कर के ऐवोर्ड से नवाजा जाता रहा है”। अब ये अलग बात है कि ये वाटर भारत में तुरंत नही बरसा या यूँ कहें कि उसे गंदगी बहा ले जाने के डर से बहने नही दिया गया।
उनका ये भी मानना है कि “अमरीकन ” छाया चित्रोँ ” = ( फिल्मोँ ) पर यहूदी कौम की गहरी पकड है — दूसरी यूरोप की कई नस्लेँ, जातियाँ भी प्रतिनिधित्व रखतीँ हैँ -ज्यादातर, वे जुडाओ, क्रिस्चीयन, ऐँग्लो ~ सेक्सकन, प्रोटेस्टेँट प्रणाली से सँबँधित होते हैँ -और उन्हीँ का वर्चस्व रहे, उनके विचारोँ का बाहुल्य, व बहुमत रहे उस बारे मेँ वे सजग व, प्रयत्नशील रहते हैँ -इस दशा मेँ ” भारत को बहोत ज्यादा ऊँचाई मिले ” = ग्लैमरस ” वैसी छवि दीखलाने मेँ उन्हेँ क्यूँ रस रहेगा? ” साथ ही सवाल भी उठाया, “इन सरी बातॉम मेँ ” होलीवुड” सिध्ध हस्त” है — बिलकुल उसी तरह जैसे - भारत , सदीयोँ से, कई सारे शुध्ध इत्तर का निकास करता आया है परँतु, जो वित्तीय व व्यापारीक सफलता फ्रान्स ने हासिल की है, पर्फुम बन्नने व उन्हेँ बेचकर अबजोँ की तादाद मेँ नफा कमाने की, वो भारत क्यूँ हासिल नहीँ कर पाया आज तक? पेरिस मेँ बनी इत्र की शीशीयोँ मेँ नकली इत्र भरकर बेचने से मुनाफा कमाने की नकलची बँदर वाली हमारी सोच हम क्यूँ नहीँ बदल सके ??”
इतना सब कुछ कहने के बाद इनको आश्चर्य इस बात का हो रहा था कि
“मुझे अचरज इसी बात का है कि, भारत का हर क्षेत्र क्यूँ “अमरीकन समाज प्रणाली ” का अँधा अनुकरण कर, अपने को ” आधुनिक” कहलवाने की कोशिश मेँ लगा, ये भूल रहा है कि, भारत दुनिया के पूर्वी गोलार्ध मेँ है जहाँ से सूर्य पस्चिम गोलार्ध को प्रकाशित करता है।”
इनकी कही उन तमाम बातों को विस्तार से आप यहाँ पढ सकते हैं।
आशीष ने तो शुरूआत ही आंकड़े देते हुए करी, उन्होने बताया “भारतीय फिल्म उद्योग विश्व फिल्म उद्योग मे हॉलीवुड के बाद दूसरे नम्बर पर आता है”। उन्होंने पहले सवाल उठाया, “लेकिन क्या आपको अपनी श्रेष्ठता का प्रचार करना आता है ? लगान, जब ऑस्कर के अंतिम चरण तक पहुंची थी, उसमे फिल्म की श्रेष्ठता के अलावा ,उसके प्रचार का भी योगदान था।”
आशीष का ये भी मानना है कि हम “भारतीय फ़िल्मो को दो श्रेणीयो मे रख सकते है, व्यावसायिक और कला फ़िल्मे।” और ये काफी हद तक माना भी जा सकता है लेकिन इसमें क्षेत्रीय फिल्में छूट ही जाती हैं। क्षेत्रीय फिल्मों की बात चली है तो पहले आशीष की कही एक बात कहूँ फिर आगे बात करता हूँ, आशीष का कहना था कि “इस वजह से यह पुरस्कार विदेशी भाषा श्रेणी को छोड़कर अन्य श्रेणीयो मे अंग्रेजी फिल्मों के लिये ऑस्कर पुरस्कार बन कर रह गया है।”। अब सवाल ये है कि भारत में भी तो ज्यादातर फिल्म समारोह हिन्दी सिनेमा के लिये पुरस्कार बनकर रह गये हैं, क्षेत्रीय फिल्मों को सिर्फ राष्ट्रीय पुरस्कारों में जगह मिल पाती है और वहाँ हिन्दी फिल्मों को पुरस्कार पाने के लिये संघर्ष करना पड़ता है।
आशीष ने अभिनय, तकनीक और निर्देशकों की क्षमता जहाँ सवाल उठाये वहीं संगीत की थोडी तारीफ भी करी लेकिन ये भी पीछे से जोडते गये कि यही संगीत पुरस्कार पाने की राह का एक रोडा भी है। कला फिल्मों से पूरी तरह प्रभावित आशीष का कहना था,
“कला फ़िल्मो के साथ सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इन्हे देखने के लिये भारत मे ही दर्शक नही मिलते है। जब दर्शक नही तो पैसे नही, पैसा नही तो ऑस्कर के लिये फिल्म नामित कैसे हो। नामित हो भी गयी तो प्रसार प्रचार के लिये पैसा कंहा से आयेगा ? भारतीय कला फ़िल्मे अभिनय, निर्देशन और संगीत के क्षेत्र मे किसी से कम नही है।”
बात में वजन भी था क्योंकि ये बात वाकई में सत्य भी थी।
वैसे आशीष ने तो इसे वर्ष की त्रासदी कहा लेकिन हमें लगता है ये अब तक की त्रासदी है, “इस वर्ष की त्रासदी यह रही कि एक बेहतरीन फिल्म ‘वाटर’ को अपने ही देश से नामित नही किया गया, उसे एक दूसरे देश ‘कनाडा’ से नामित होना पड़ा।” आशीष ने समापन किया यह कह कर “यदि भारतीय फ़िल्मो को ऑस्कर जितने की उम्मीद रखना है तो इस उद्योग मे आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। मौजूदा परिस्थिति मे ऑस्कर जितना एक दिवास्वप्न से ज्यादा और कुछ नही है।” इनकी कही उन तमाम बातों को विस्तार से आप यहाँ पढ सकते हैं।
जीतू की कही बातों पर कुछ कहने से पहले तो मैं उनका शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्होंने पारिवारिक समस्या के चलते भी समय निकाल के अपना योगदान दिया। जीतू ने भी शुरूआत आस्कर की भूमिका देने से करी, “ऑस्कर अवार्ड जिन्हे एकाडमी अवार्ड भी कहा जाता है विश्व मे फिल्मी दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है। १९२९ मे शुरु हुए इन पुरस्कारों मे सर्वश्रेष्ठ चलचित्र (फिल्म) को पुरस्कार दिया जाता है। शुरु शुरु मे विजेता फिल्मों की घोषणा सार्वजनिक रुप से की जाती थी, लेकिन १९४० के बाद से बाकायदा नामांकन प्रक्रिया को अपनाया जाता है, तो विजेताओं की घोषणा आखिरी वक्त में मंच पर की जाती है।”
जीतू का मानना यही है कि पश्चिम अभी भी भारत को लेकर अपने पूर्वाग्रहों से ग्रसित है, “मेरे विचार से अव्वल तो ये फिल्में सिर्फ़ एक वर्ग विश्व सिनेमा वाले वर्ग मे नामित होती है, जहाँ पर सिनेमा के कई पहलुओं को ध्यान मे रखकर फिल्म चयनित की जाती है। और दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पश्चिमी लोगों का भारत के प्रति रवैया।
उन्हे भारतीय फिल्मों मे गरीब किसान, फटेहाल नायक, साधू, मदारी ज्यादा पसन्द आते है। उनकी नज़रों मे तो भारत अभी भी साधू और मदारियों का देश है।
यदि हम अपने सिनेमा मे भारत की खुशहाली को दिखाते है तो वे शायद इसे कल्पना की उड़ान मानते है। अब थोड़ा बहुत तो बदलाव आया है, लेकिन अभी भी पूर्वाग्रह तो है ही।” इनकी कही उन तमाम बातों को विस्तार से आप यहाँ पढ सकते हैं।
सारांश यही है कि तीनों का मानना था कि पुरस्कार पाने के लिये कुछ परिवर्तन तो करने ही पड़ेंगे। ये तो हर क्षेत्र में करना पड़ता है अब देखिये आउटसोर्सिंग को भारत में पनपने देने के लिये भी कुछ बदलाव किये। ये तो भारतीय फिल्म उधोग को सोचना ही होगा कि कहानी के बीच में बिन बुलाय मेहमान से टपकते गीत भारत को छोड कही नही चलने वाले, वैसे भी आस्कर को भेजे जाने वाले प्रिंट में से अगर गाने काट दिये जायें तो फिल्म की कहानी में कोई फर्क नही पड़ने वाला। अब अपने भारतीये उधोग के ये लोग चाहें कितना भी कह लें कि इनका आस्कर के लिये कोई लालच नही लेकिन सभी अपनी फिल्मों को आस्कर की दौड़ में भेजने के लिये तत्पर रहते हैं। मेरा तो यही मानना है कि अगर हम क्षेत्रीय फिल्मों को आस्कर में भेज उसके प्रचार के लिये मिलकर आयें तो उन फिल्मों के पुरस्कार प्राप्त करने की ज्यादा संभावनायें हैं।
आस्कर और बालीवुड को लेकर ही ज्यादा कहा गया, हिन्दी का फिल्मों से लिंक को लेकर बहुत कम कहा गया। हिंदी के विश्व में योगदान के लिये भी आस्कर महत्वपूर्ण हो जाता है। कोई माने या ना माने, लेकिन स्पेनिश और इटेलियन भाषा के प्रचार में थोडा बहुत सहयोग उन भाषा पर बनी फिल्मों का आस्कर में सफल होना भी है। मैने ४-५ आस्कर में सम्मानित दूसरी भाषाओं की फिल्में देखी हैं और ये दावे के साथ कह सकता हूँ कि उन फिल्मों को समझने के लिये भाषा का जानकार होना बिल्कुल भी जरूरी नही। लेकिन बार बार उस भाषा की फिल्में देखने से थोडी बहुत समझ में आने भी लगती है।
अब चलते चलते दो फिल्मों का उल्लेख कर दूँ, अगर कभी आपको मौका मिले तो देखियेगा जरूर - पहली है इटेलियन फिल्म “लाइफ एज ब्यूटिफूल” और दूसरी है “नो मैनस लैंड“।
नोटः वैसे तो हमें उम्मीद नही है लेकिन फिर भी अगर किसी की प्रविष्टी रह गयी हो तो सूचित करे उसके खाते के रन भी टीम के स्कोर में जोड दिये जायेंगे

अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




तरुण जी, हिन्दी चिट्ठाजगत से जब परिचय हुआ तो ये उपक्रम “अनुगूँज” मुझे बहुत पसँद आया था..इससे जुडी कुछ पुरानी प्रविष्ट्याँ मैने पढी भी थी..मन था इसमे भाग लेने का लेकिन जो विषय आपने रखा था उसके बारे मे मुझे उतना ही ज्ञान है, जितना शायद हिलेरी क्लिन्टन को करवा चौथ का होगा! और थोडा बहुत लिखने की कोशिश करते भी तो वो आपने पहले ही लिख दिया था..हाँ इस पर अन्य लोगों का लिखा पढने की उम्मीद जरूर थी..
बहुत बढ़िया. इस यज्ञ में आहूति न दे पाने के लिये क्षमा चाहता हूँ.
भईया, मेरी ओर से भी खेद टिका लो और मुझे अपनी क्षमा टिकवा दो। मैं रचना जी जैसी स्थिति में नहीं था इसलिए थोड़ा बहुत तो लिख सकता था परन्तु लिख नहीं पाया।
मैने लेख लिखा था पर आलस्यवश पोस्ट नहीं पर पाया, क्षमा चाहता हूँ।