ब्लागर साथी छापे की दुनिया में
हमारे ब्लागर साथी अपने ब्लाग पर लिखने के अलावा अब पत्र-पत्रिकाऒं में भी स्थान बना रहे हैं। अप्रैल माह की कादम्बिनी में प्रतीक का लेख छपा है जिसका शीर्षक है मोबाइल की दुनिया में फोर-जी। इसमें चौथी पीढ़ी के मोबाइल के बारे में बड़ी सहज, सरल भाषा में जानकारी दी गयी है। भारत में अभी दूसरी-तीसरी पीढ़ी के मोबाइल चलन में हैं। प्रतीक अपने इस लेख में पूरी जानकारी देते हुये बताते हैं कि चीन इस दिशा में बहुत तेजी से प्रगति कर रहा है और आने वाले समय में मोबाइल के क्षेत्र में चीन का वर्चश्व होगा। कादम्बिनी के इसी अंक में गौरी पालीवाल का विकी पीडिया पर संक्षेप में लेख छपा है जिसका शीर्षक है आनलाइन विश्वकोश। बेहतर होता कि गौरी पालीवाल जी निरंतर पर मुतुल का लिखा लेख देख लेतीं। इससे सामग्री विस्तार के साथ-साथ विकिपीडिया के बारे में और अच्छी जानकारी दी जा सकती थी।
बहरहाल दोनों लेख कादम्बिनी में देख कर जी खुश हो गया। प्रख्यात कथा पत्रिका हंस के अप्रैल अंक में जानी-पहचानी कथाकार,चिट्ठाकार प्रत्यक्षाजी की कहानी पिकनिक छपी है। पढ़िये और बताइये कैसी लगी आपको कहानी। नया ज्ञानोदय में पिछले कुछ अंको से ब्लाग आदि के बारे में मनीषा कुलश्रेष्ठ के लेख छप रहे थे। उन पर कुछ आपात्ति जताते हुये पिछले अंक में हसन जमाल जी ने टिप्पणी की थी। यह काहते हुये कि इंटरनेट की बात करना ऐसा ही है जैसा रोटी न होने पर भूखे लोगों को केक खाने की सलाह देना।रवि रतलामी ने नया ज्ञानोदय के अप्रैल अंक में अपनी संतुलित प्रतिक्रिया देते हुये जानकारी देने का प्रयास किया है उनका पत्र नया ज्ञानोदय के अप्रैल अंक में छपा है। यह सूचनार्थ है। आशा है कि हिंदी ब्लागजगत के साथियों की भागेदारी आगे भी प्रिंट मीडिया में उल्लेखनीय प्रगति करेगी।
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अनुगूँज यानि सभी चिट्ठाकारों की किसी भी विषय पर सम्मिलित आवाज। अनुगूँज के पाक्षिक आयोजन में आयोजक चिट्ठाकार एक विषय देता है जिस पर सभी भाग लेने वाले चिट्ठाकार अपनी प्रविष्टि लिखते है। जी हाँ कुछ कुछ निबन्ध प्रतियोगिता की तरह, बस इसमे आपको अपनी कलात्मकता (जो नि:सन्देह आपके पास है) का मिश्रण करते हुए अपनी पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखनी है।
अनुगूँज की समाप्ति के अवसर पर आयोजक चिट्ठाकार, सभी प्रविष्टियों का उल्लेख करते हुए एक लेख अक्षरग्राम पर लिखता है। अनुगूँज सम्बंधित नियम 




गौरी पालीवाल ‘आईटी नुक्कड़’ नामक शीर्षक से कादम्बिनी के पिछले कई अंकों में अंतरजाल पर हिन्दी की दुनिया के बारे में बताती रही हैं। मगर लगता है कि उन्हें खुद ही नहीं पता है। मैंने हर बार पढ़ा है। मैं समझता हूँ कि अगर वो मेहनत नहीं भी करना चाहती हैं तो बस नारद, अक्षरग्राम, सर्वज्ञ आदि देखती रहें, वहाँ से अगर मात्र कॉपी भी कर लें तो एक बेहतर लेख तैयार होगा। अगर बात पृष्ठसीमा की है तो मेरे भाई संक्षेपण भी नहीं आता और रिपोर्टर और पत्रकार कहलाना चाहते हो? बरबाद करके ही छोड़ोगे क्या? इससे नुकसान यह है कि हम जो कर रहे हैं, उसकी ज़रूरी सूचना प्रिंट तक नहीं पहुँच पाती है।
खैर हमारे लिए तो शायद इतना ही बहुत है कि हम प्रिंट में छप रहे हैं।
जिन साथियों के लेख छपे उन सब को बधाई!
शैलेष जी से सहमत हूँ, ऐसे लेख नहीं छपने चाहिए जो अधूरी अथवा गलत जानकारी देते हों। सभी साथियों से अनुरोध है कि थोड़ा मेहनत करके संतुलित और सटीक लेख लिखें।
नमस्कार !
मैं उन bloggers में से हूँ जो छापा जगत से गुज़रकर ब्लॉग जगत में पधारे हैं। फाइन आर्टस में डिग्री के बाद जब लिखने के लिए सृजनात्मकता कि कलम उछलने लगी तो पत्रकारिता व जन संचार में मास्टर डिग्री भी ली। कोर्स कि पढायी में तो कुछ लिखना नहीं सिखाया गया, पर कोर्स करते करते jaipur, राजस्थान में पहले राजस्थान पत्रिका व फिर हिंदुस्तान टाइम्स में लिखना शुरू कर दिया। जैसे जैसे लेख छापते गए, लिखने की और छपवाने कि भूख़ और बढ़ती गयी। कई बार कवर स्टोरी पर अपनी बेटी के नाम कि ‘बाय-लाइन ‘ को देखकर नाना-दादी कि आंखों कि चमक ने उत्साह बढाया तो कई बार अपने लिखे पुराने लेख के स्तर से उपजी असंतुष्टी ने ऊर्जा भरी। कहा कि “और लिख - और अच्छा लिख!”
जनाब 2-3 साल यही सिलसिला चला, पर जब नौकरी करनी शुरू की तो ग़लतफहमी पाल ली कि भई अब समय कहॉ, अब नही लिख पाएंगे। और उसके बाद बस ६ महिने ही और लिखा-छपवाया । 4 साल तक नौकरी में किताबें डिज़ाइन कीं, अनगिनत प्रेस विज्ञप्तियां लिखीं, कई कार्यक्रमों को शब्दों में पिरोकर खबरें बनाईं। लेकिन सृजनात्मक लेखन कि भूख़ शांत नही हो पायी।
अब विवाह के उपरांत आस्ट्रेलिया आकर जब आत्मसात का समय मिला, तो सोचा देखें ये ब्लॉग क्या बला है, दुनिया भर में बड़ा शोर है, इसी की चर्चा चहूँ ओर है, हम भी तो देखें इसमे कितना ज़ोर है!
बस चले आये चिट्ठा जगत में बोलने बतियाने! अपने भी दिल का हाल सुनाने!
तो क्या इसे उल्टी गंगा कहेंगे? पहले छापे कि दुनिया से ब्लॉग कि दुनिया में आये तो क्या हुआ, हमारी कलम तो अब छिलेगी, और धारदार होती जायेगी, इसी विशवास से आये हैं।
क्यों? कुछ गलत कहा बंधु??
congratulations to alll!!
जो साथी कागजो पर छपे हैं, उन्हे बधाई. जानकारी पाकर प्रसन्नता होती है.
हमारी ढेरों शुभकामनाएं.
सभी को बधाई। हमीं में से कोई प्रिंट मीडिया को इंटरनेट पर हिन्दी के बारे में बेहतर रूप से बता सकता है।
“…गौरी पालीवाल ‘आईटी नुक्कड़’ नामक शीर्षक से कादम्बिनी के पिछले कई अंकों में अंतरजाल पर हिन्दी की दुनिया के बारे में बताती रही हैं। मगर लगता है कि उन्हें खुद ही नहीं पता है। …”
ये बात सही है. नया ज्ञानोदय में मनीषा कुलश्रेष्ठ ने भी हिन्दी ब्लॉगों के बारे में सही जानकारी नहीं दी है. आधी अधूरी अधकचरी जानकारी से जनता का कोई भला नहीं होने वाला. अकसर पत्र-पत्रिकाएँ फिलर के रूप में ऐसी सामग्री प्रकाशित करते हैं, सारगर्भित, शोध-परक सामग्री नहीं.
जी, यह तो स्वागतयोग्य है कि दो माध्यमों के बीच संवाद बढ़ रहा है और अंतराल कम हो रहा है। हॉं इन सेतुलेखकों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है क्योंकि जहॉं अधूरा लेखन दिक्कत पैदा करता है वहीं माध्यम की प्रकृति को जाने बिना दी गई जानकारी एक प्रकार के माध्यम को दूसरे का मातहत भी बना सकती है।
प्रतीक भाई सहित सभी लेखकों को हार्दिक बधाई।
congrats to all
सभी को बधाई!
ब्लॉगर्स को कागज़ी पत्रिकाओं के लिए लिखने के लिए थोड़ी सी अड़चन जरूर आती है।पत्रिकाओं के कॉपीराइट के कारण ब्लॉग और पत्रिकाओं की रचनाओं को अलग अलग रखना पड़ता है। लेखक के लिए यह समस्या है कि दिलपसंद रचना ब्लॉग पर पोस्ट करें या पत्रिका को भेजें। मैं भी कादम्बिनी, सरिता, गृहशोभा आदि में कहानी,पर्यटन और अन्य लेख लिखता रहता हूं किंतु यह समस्या आड़े आ ही जाती है।
यह सम्स्या और भी जटिल हो जाती है जब संपादक आपको कुछ लिखने को आमंत्रित करें।
“…गौरी पालीवाल ‘आईटी नुक्कड़’ नामक शीर्षक से कादम्बिनी के पिछले कई अंकों में अंतरजाल पर हिन्दी की दुनिया के बारे में बताती रही हैं। मगर लगता है कि उन्हें खुद ही नहीं पता है। …”
शैलेश भारतवासी और रवि की इस बात से मैं सहमत नहीं हूं। शायद, इन्होंने कादम्बिनी में प्रकाशित गौरी पालीवाल जी का हर लेख नहीं पढ़ा है। मैं पिछले सात साल से पत्रिका पढ़ रही हूं। पहले यह कॉलम कोई और लिखता था।मैंने इसी पत्रिका में पहली बार ब्लॉग के बारे में जाना। इंटरनेट पत्रिका “निरंतर ” के बारे में भी इसी कॉलम से जाना। ब्लॉग से आय के बारे में भी लेख कादम्बिनी में पढ़ा-रुचिकर लगा। इसके अलावा, हैकिंग, चैटिंग जैसे शब्दों के बारे में भी मैंने इसी पत्रिका से जाना। मुमकिन है-तकनीकी जानकारी रखने वालों को कॉलम में ज्यादा कुछ न मिलता हो पर छोटे शहर के लोगों को तो कई जानकारियां इसी कॉलम से मिली हैं।
और..शैलेश भारतवासी का यह वक्तव्य “बरबाद करके छोड़ोगे क्या ” आपत्तिजनक है। अगर आपमें इतनी काबलियत है,तो खुद पत्र-पत्रकाओं में लेख लिखकर हिन्दी पाठकों पर अहसान क्यों नहीं करते ? शायद लेख लिखना इतना आसान नहीं है?
नेहा, इटावा
करिपया इस माह की ‘विगयान परगति’ देखें और नचीज़ की कहनी पे भी गौर फ़रमयें।
करिपया इस माह की विगयान परगति देखें और नचीज़ की कहनी पे भी गौर फ़रमायें।
आपको जानकर खुशी होगी कि इस नचीज़ के लेखन पर केनद्रित कानपुर से परकाशित पत्रिका ‘बाल साहितया समीछा, ने अपना मैई अंक निकाला है। क्रिपया अपना डाक का पता देने की करिपा करें, जिस्से आपको परती भेज सकूं।