हिन्दी जालस्थलों की सङ्ख्या 700 पार, सम्भवतः 800 भी

इस बात की पुष्टि होने पर, कि हिन्दी के जालस्थलों की सङ्ख्या 700 पार हो चुकी है, मैंने यह याद करने की कोशिश की कि 600 पार कब हुए थे, और आश्चर्य हुआ कि 600 पार हुए थे सितम्बर 2005 में यानी करीब दो साल में दो महीने कम पहले और सौ जालस्थल चटकाने में बाईस महीने लगे - यानी औसतन हर हफ़्ते एक या डेढ़ जालस्थल पैदा हुआ।

पर ऐसा प्रतीत होता है कि जालस्थलों की सङ्ख्या 800 पार या 900 पार होने में इतना समय नहीं लगेगा, बल्कि हो सकता है कि अभी तक 800 भी पार हो चुका हो।

इस अधिक तेज़ गति से बढ़ोतरी के कई कारण दिखते हैं -

            

  • एक तो हिन्दी में लेखन के अलग अलग तन्त्रों का विकास,
  • दूसरा विण्डोज़ ऍक्स पी का अधिक प्रयोग, जिसमें हिन्दी लागू करना विण्डोज़ 98 की अपेक्षा अधिक सरल है,
  •  और तीसरा चिट्ठों की सङ्ख्या में बढ़ोतरी, ब्लॉगर में मौजूद हिन्दी सुविधाओं की वजह से, 
  • और चौथा, कागज़ी पत्रिकाओं में अन्तर्जाल के प्रयोग के बारे में लेख।

यह चारों चीज़ें पिछले दो साल में ही हुई है, और जिन लोगों ने भी प्रचार में योगदान दिया है, जाने या अनजाने ही सही - बधाई के पात्र हैं।

हर्ष का विषय यह भी है कि केवल निजी चिट्ठों के रूप में ही स्थलों की बढ़ोतरी नहीं हुई है, पारम्परिक स्थलों में भी बढ़ोतरी आई है, हालाँकि उतनी ज़्यादा नहीं जितनी चिट्ठों में। ऍमऍसऍन, याहू इनमें उल्लेखनीय है, और साथ ही कई मौजूदा स्थल यूनिकोडित हुए हैं। 

ध्यान दें - लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि एक ओर तो नेट्स्केप की खुली निर्देशिका कुछ सात सौ स्थल दिखा रही है, जिसमें चिट्ठे व अन्य स्थल - सभी शामिल हैं, लेकिन चिट्ठा सङ्कलकों से एकत्रित आँकड़ों से यह प्रकट होता है कि केवलमात्र चिट्ठों की सङ्ख्या ही 700 से अधिक होगी। लग रहा है कि यह निर्देशिका कुछ पीछे चल रही है, और इसके चिट्ठों के वर्ग को सम्पादकों की सख्त ज़रूरत है

बहरहाल चूँकि चिट्ठों में बढ़ोतरी अधिक हुई है, उनपर थोड़ी और पैनी नज़र डालना उचित होगा। चिट्ठाजगत सङ्कलक पर 13 मई 2007 से आँकड़े एकत्रित किए जा रहे हैं, - और चिट्ठाजगत सभी सम्भव देवनागरी लिखित हिन्दी के चिट्ठों के आँकड़े रखता है, सामग्री जो भी हो, अतः इनके सही होने की काफ़ी अधिक सम्भावना है - और इन आँकड़ों से तो काफ़ी आश्चर्यजनक तथ्य सामने आते हैं। पहले आँकड़े यहाँ पेश हैं -चिट्ठों की सङ्ख्या

1 जुलाई 2007 693
1 अगस्त 2007 859

प्रविष्टियों की सङ्ख्या

मई 2007 2552
जून 2007 2638
जुलाई 2007 3878

सक्रिय चिट्ठे

मई 2007 358
जून 2007 355
जुलाई 2007 409

सक्रिय चिट्ठाकार

मई 2007 321
जून 2007 340
जुलाई 2007 406

 

यदि हम मान लें कि मई के आँकड़े ठीक नहीं हैं, क्योंकि ये 17 मई से लिए गए हैं, और केवल जून - जुलाई के आँकड़ें देखें तो जून और जुलाई के बीच सक्रिय चिट्ठाकारों में उन्नीस फ़ीसदी की बढ़ोतरी है। एक महीने में उन्नीस फ़ीसदी की बढ़ोतरी बहुत ज़्यादा है, सालाना तौर पर। हो सकता है कि ये मात्र संयोग हो। अधिकाधिक आँकड़े प्रदर्शित करने का प्रयास किया है क्योंकि हिन्दी जाल जगत् में इस प्रकार की बढ़ोतरी पहले कभी नहीं दिखी है, हो सकता है कि आँकड़े एकत्र करने में या उनके विश्लेषण में कोई भूल हुई हो, या फिर हो सकता है कि आँकड़े एकत्र करने कि विधि अब बेहतर हो गई हो?

हिन्दी जाल जगत शनैः शनैः ऐसी स्थिति में आता जा रहा है कि जालराजों को अच्छे विश्लेषण के लिए सटीक आँकड़ो की ज़रूरत होगी।

अन्ततः उम्मीद है कि हममें से कोई जल्द ही 800 स्थल पार होने की खबर छापेगा।

आपके क्या विचार हैं?

13 Responses to “हिन्दी जालस्थलों की सङ्ख्या 700 पार, सम्भवतः 800 भी”

  1. जब छः सौ स्थल थे, तब लगातार अनुगूँज होती थी। अब सात सौ स्थल है और कई महीनों से अनुगूँज नहीं है।
    क्यों न शुरू की जाए?

  2. अच्छी खबर है. एक बात समझ में नहीं आ रही है. ऊपर आपने जालस्थानों से बात शुरू की है. और नीचे आप चिट्ठाकारों का विवरण दे रहे हैं. क्या जालस्थानों मे चिट्ठाकारो के अलावा दूसरे हिन्दी वेब-पेज भी शामिल हैं. या केवल चिट्ठाकारों की बात हो रही है.

  3. जालस्थलों में चिट्ठे व अन्य स्थल शामिल है। नीचे दिए आँकड़े केवल चिट्ठों के हैं।

  4. आलोक भाई,
    इतने विस्तृत विवरण के लिए धन्यवाद।

    मेरे विचार से आठ सौ का आंकड़ा लगभग पा लिया गया है, नारद पर पंजीकृत चिट्ठे आज की तारीख मे ७३८ हैं, हमारे पास कई चिट्ठे पंजीकृत नही है, जो मेरे अनुमान के हिसाब से पचास के आसपास होंगे। इसके अलावा भी कुछ ऐसे चिट्ठे है, जो अंग्रेजी और हिन्दी दोनो मे मिलाकर लिखते है, वे चिट्ठे भी लगभग २० के आसपास होंगे। आठ सौ का आंकड़ा तो कुछ नही है, इस साल के आखिरी तक हम १२०० के ऊपर होंगे। ऐसा मेरा अनुमान है।

    लेकिन सबसे चिंताजनक बात है, असक्रिय चिट्ठों की। चिट्ठों की लेखन क्वालिटी को अगर अभी दरकिनार भी किया जाए, तो भी इसमे विषय व्यपकता नही दिखती। हमे विभिन्न विषयों पर लेख चाहिए, जो अभी भी दूर की कौड़ी दिखती है। आस पास मे कुछ विषय आधारित चिट्ठे आएं है, लेकिन अभी भी इस पर बहुत काम किया जाना बाकी है।

    अनूगँज की कमी हम सभी को खलती है, इसे शुरु किया जाना चाहिए। मै तो चाहूंगा कि बुनो कहानी को भी पुनर्जीवित किया जाए। इससे सभी चिट्ठाकारों मे आत्मीयता बढती है।

    अभी चिट्ठाकारी को बहुत आगे तक जाना है, इसमे सभी का सहयोग चाहिए।

  5. यदि आप जालस्थलों में चिट्ठों को भी शामिल करते हैं तो आपके ही द्वारा दिए गए आँकड़ों के अनुसार हिन्दी के कुल जालस्थल (716+859= 1575) हो चुके हैं। पोस्ट की शीर्षक में केवल 700-800 की संख्या देखकर पहली नज़र में हैरानी हुई, बाद में आँकड़ों के ब्यौरे देखे तो स्थिति स्पष्ट हुई।

    शीर्षक में हिन्दी जालस्थलों की संख्या यदि 1500-1600 लिखी गई होती तो शायद यह कंफ्यूज़न पैदा नहीं होता।

    कुछ अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में ऑनलाइन जगत में हिन्दी की स्थिति बहुत उत्साहवर्धक नहीं है। फिर भी, तकनीकी संसाधनों के सुगम होते जाने और जागरूकता बढ़ने से हिन्दी में भी अब गति आ रही है।

  6. 700 का आँकड़ा नेट्स्केप की मुक्त निर्देशिका से लिया गया है।
    अब तक मैं इसी को जालस्थल की सङ्ख्याओं का आधार मान रहा था, लेकिन ज़ाहिर है किन इस निर्देशिका के सम्पादकों को अब अधिक काम आ गया है - वे पीछे चल रहे हैं। एक तरह से यह खुशी की बात है, लेकिन निश्चय ही इस निर्देशिका को और सम्पादकों की आवश्यकता है।

  7. यह काफ़िला हो या कारवां पर अब तेजी से बढ रहा है . नए नए मील के पत्थर कायम किए जा रहे हैं और नए-नए कीर्तिमान बन रहे हैं .

  8. उत्साहवर्धक आंकड़े हैं. भविष्य सुंदर लगता है.

  9. साइटें तो बढ़ती जा रही हैं लेकिन उस हिसाब स‌े गुणवता नहीं।

    खैर अभी तो स‌ंख्या भी बढ़े तो भी अच्छी बात है।

  10. मुझे अभी हिंदी ब्लॉगिंग संसार से जुड़े कुछ ही महीने हुए हैं। लेकिन, अच्छा है कि हिंदी के ज्ञानीजन नेट पर भी उतनी ही तेजी से सक्रिय हैं। मुझे बहुत अच्छा तब लगेगा जब हिंदी के शब्दों के सर्च मारने पर गूगल में किसी ब्लॉग का लिखा हुआ आएगा।

  11. मुझे बहुत अच्छा तब लगेगा जब हिंदी के शब्दों के सर्च मारने पर गूगल में किसी ब्लॉग का लिखा हुआ आएगा।

    फिर तो आपको तुरन्त अच्छा लग सकता है - आजमाइए -

    गूगल

  12. कड़ी गलत थी। लेकिन गूगल पर हिन्दी के खोज परिणाम चिट्ठों से तो अभी भी आ रहे हैं

  13. [...] आलोक भाई अभी अभी अमरीका से हो कर गए हैं, शायद यहाँ से कुछ खास चीज खाकर गए हैं ( समीर जी व जीतू भाई - अफसोस आलोक अपुन पियक्कड़ो जैसे नहीं हैं, नहीं तो लिखता खा-पीकर गए हैं)। इस लिए की जाते ही फटाक फटाक दो “बड़ी सी” प्रविष्टियां लिख डाली। बड़ी सी पर जोर इस लिए दे रहा हूँ कि आलोक अपनी कम लिखे को ज्यादा समझना – तार को खते समझना जैसी ब्लॉग पोस्टों के लिए बदनाम प्रसिद्ध हैं। खैर अगर ऐसी कोई बात है तो मैं आलोक से इस खाने वाली चीज के बारे में जरुर जानना चाहुंगा। श्रीमती जी कैमिस्ट्री की रिसर्च-स्नातक हैं उनसे कह कर इस चीज के अंदर के विटामिन निकलवाकर – बड़ी पोस्ट लिखने की गोली बना-बना कर बेचेंगे। [...]

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